फर्जी मामलों में घिरे अधिकारी-कर्मचारियों पर हर साल 40 करोड़ फूंक रही सरकार

Raipur News - प्रदेश में फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के एक महीने में निराकरण के ऐलान के बाद फाइलों से धूल झाड़ी जा रही है। प्रकरण...

Bhaskar News Network

Aug 14, 2019, 07:45 AM IST
Raipur News - chhattisgarh news every year the government spends 40 crores on officers and employees surrounded in fake cases
प्रदेश में फर्जी जाति प्रमाण पत्रों के एक महीने में निराकरण के ऐलान के बाद फाइलों से धूल झाड़ी जा रही है। प्रकरण दो-दो दशकों से क्यों नहीं निपटे इसे लेकर नए खुलासे भी हो रहे हैं। यह भी पता चला है कि जितने अधिकारी-कर्मचारी इन मामलों में घिरे हैं या जिनके जाति प्रमाणपत्र जाली साबित हो चुके हैं उन्हें हर साल करीब 40 करोड़ रुपए तनख्वाह बांटी जा रही है। आवास और दूसरी सुविधाओं पर होने वाले खर्च अलग हैं।

सरकार को पता चला है कि 26 से अधिक विभागों में फर्जी जाति के आराेपों से घिरे अधिकारी-कर्मचारी काम कर रहे हैं। नया राज्य बनने के बाद फर्जी जाति के करीब 462 प्रकरण सरकार के समक्ष पंजीबद्ध हुए। बताते हैं कि इनमें से 186 में शिकायतें सही पाईं गईं। करीब 60 केस हाईकोर्ट में ड्यू कोर्स में हैं। हाल ही में 18 केस और उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने डिसाइड किए हैं। जानकार बताते हैं कि अगर सभी मामलों में अधिकारियों कर्मचारियों की सालाना सैलरी जोड़ी जाए तो करीब 40 करोड़ रुपए होती है। सामान्यतया क्लास वन और टू के अधिकारियों को वार्षिक वेतन 12 से 14 लाख रुपए मिलता है।

उच्च स्तरीय छानबीन समिति ने वर्तमान में जांच के लिए लंबित मामलों को तीन कैटेगरी में बांट दिया है। पहला हाईकोर्ट से स्टे वाले प्रकरण, दूसरा छानबीन समिति की मांग पर 15-17 सालों से बायोडाटा व दस्तावेज जमा नहीं करने वाले कर्मचारियों के प्रकरण शामिल हैं। ऐसे करीब 36 अधिकारी-कर्मचारी हैं। तीसरी कैटेगरी में करीब डेढ़ दर्जन अधिकारी-कर्मचारी हैं जिन्होंने बरसों से छानबीन समिति द्वारा तय निर्धारित प्रपत्र में जानकारी नहीं दी है।

अजा संघ ने एजी को लिखा पत्र, 17 सालों से गुहार

इधर, छत्तीसगढ़ अनुसूचित जनजाति शासकीय सेवक विकास संघ ने महाधिवक्ता को पत्र लिखा है। इसमें मांग की गई है कि नवीनतम न्यायिक दृष्टांत के परिप्रेक्ष्य में फर्जी जाति प्रमाण पत्रों वालों द्वारा लिए गए स्थगन पर समुचित विधिक कार्रवाई कर स्थगन खारिज कराया जाए। जो मामले विभागों में लंबित हैं या कोर्ट के आदेश पर पुन: जांच की जा रही है, उनकी जांच जल्द पूरी कर दोषियों को बर्खास्त किया जाए। 17 सालों से आदिवासी संगठन इस विषय पर लंबी लड़ाई लड़ रहे हैं। फर्जी जाति से सरकारी विभागों में नौकरी करना संविधान के खिलाफ है।

क्या कहा है सुप्रीम कोर्ट ने

एक मामले में सुप्रीम कोर्ट ने अपील नंबर 8928 आफ 2015 इत्यादि के लिए 6 जुलाई 2017 को जजमेंट दिया। आदेश में कहा गया है कि फर्जी जाति प्रमाण पत्राें से नौकरी करने वालों को सेवा में रहने का कोई अधिकार नहीं है। मिलिंद वर्सेस महाराष्ट्र सरकार व माधुरी पाटिल बनाम महाराष्ट्र सरकार के केस में भी सुको ने कहा कि जो जिस जाति का ही नहीं उसे उस उस जाति का लाभ नहीं दिया जा सकता। संविधान में एसटी-एसटी को बैकवर्ड कैटेगरी से ऊपर उठाने के लिए ये व्यवस्था की गई थी।

सरकार को खुद करनी पड़ेगी पहल

कानूनविदों की मानें तो केवल मामले निपटाने की घोषणा से काम नहीं चलेगा। अगर सरकार इन प्रकरणों का निराकरण चाहती है तो उसे खुद महाधिवक्ता को निर्देश देने होंगे कि वह कोर्ट में इन प्रकरणों पर पहल करें। बताया जाता है कि जब कोर्ट में ऐसे केसेस की अर्जेंट हियरिंग होती है तब भी ज्यादातर सरकारी वकील उपस्थित नहीं होते। बताते हैं कि इस बार विधानसभा सत्र में फिर यह मामला आया था। ध्यानाकर्षण में इस पर सरकार का ध्यान आकृष्ट कर मंत्री से जवाब मांगा गया था। लिखित जवाब में मंत्री ने कहा था कि मामलों की जांच चल रही है। जल्द ही इन पर फैसले लिए जाएंगे।

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