स्काईवाॅक के पिलरों पर कोई निर्माण संभव नहीं न फ्लाईओवर बना सकते, और न लाइट मेट्रो लाइन

Raipur News - इंफ्रास्ट्रक्चर रिपोर्टर | रायपुर स्काईवाॅक पर चूंकि लगभग 38 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं इसलिए इसे तोड़ने के मूड...

Aug 14, 2019, 07:50 AM IST
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इंफ्रास्ट्रक्चर रिपोर्टर | रायपुर

स्काईवाॅक पर चूंकि लगभग 38 करोड़ रुपए खर्च हो चुके हैं इसलिए इसे तोड़ने के मूड में कोई नहीं है, लेकिन महाराष्ट्र मेट्रो के अाला अफसरों ने ये कहकर मामले में नया मोड़ ला दिया है कि इसके पिलर ऐसे हैं कि इस पर कोई निर्माण संभव ही नहीं है। शासन को स्थानीय तौर पर ये सुझाव अाए हैं कि स्काईवाॅक तोड़ने के बजाय इसका दूसरा इस्तेमाल किया जाना चाहिए, जैसे अतिरिक्त पिलर लगाकर हल्का फ्लाईओवर बनाया जा सकता है। लेकिन सुझाव समिति की बैठक में शामिल होने अाए महाराष्ट्र मेट्रो के अफसरों ने दो-टूक कह दिया कि अगर फ्लाईओवर बनाना है तो सड़क से स्काईवाॅक के ऊपर तक नए पिलर खड़े करने होंगे। उसपर ही कोई प्रोजेक्ट लाया जा सकता है।

शासन ने स्काईवाॅक पर फैसला करने के लिए वरिष्ठ विधायक तथा पूर्व मंत्री सत्यनारायण शर्मा के नेतृत्व में एक सुझाव समिति बनाई है। इस समिति में शहर के विधायकों तथा जनप्रतिनिधियों, ट्रैफिक-निर्माण विशेषज्ञों के अलावा पहली बार महाराष्ट्र मेट्रो के अाला अफसरों को भी बुलाया गया था। बैटक में महाराष्ट्र मेट्रो के कार्यकारी निदेशक एनके सिन्हा व जीएम डॉ. एमपी रामनिवास शामिल हुए। यह टीम अभी नासिक में नियो मेट्रो बना रही है। अफसरों ने कहा कि स्काई वाॅक के पिलरों की ताकत इतनी है कि उस पर केवल वाॅकिंग ओवरब्रिज ही बन सकता है। इसकी ऊंचाई 10 मीटर है। अब एक ही संभावना है कि सड़क पर नए पिलर डालकर उन्हें स्काई वाॅक के ऊपर ले जाया जाएगा। तभी फ्लाईओवर बन पाएगा। उन्होंने बैठक में साफ कह दिया कि इन पिलरों पर लाइट मेट्रो लाइन भी नहीं डाली जा सकती क्योंकि मौजूदा पिलर से नहीं सह सकते।

महाराष्ट्र मेट्रो के अधिकारियों ने बैठक में सुझाव दिया कि रायपुर शहर में ट्रैफिक के लिए समग्र सर्वे की जरूरत है क्योंकि यहां अाबादी और वाहनों की संख्या, दोनों में तेजी से वृद्धि हो रही है। गौरतलब है, राजधानी के घने इलाके की लगभग हर सड़क पर दिन में कई बार जाम लगता है, क्योंकि वाहनों की संख्या के हिसाब से अब से संकरी सिद्ध हो गई हैं। इसलिए राजधानी के लिए अब वर्ष 2040 तक एक नया प्लान बनाने की तुरंत जरूरत है। पुणे में नियो मेट्रो का इंफ्रास्ट्रक्चर तैयार कर रहे महाराष्ट्र मेट्रो के अफसरों ने यह सुझाव भी दिया कि रायपुर में भी नियो मेट्रो पर काम किया जा सकता है, क्योंकि ट्रेनों के मामले में यही सबसे हल्का और सस्ता माध्यम है। अफसरों ने बताया कि नियो मेट्रो बनाने से चलाने तक प्रति किमी का खर्च 60 करोड़ रुपए है। जबकि किसी भी मेट्रो बनाने और शुरू करने में 200 करोड़ रुपए प्रति किमी की लागत आती है। समिति की अध्यक्ष ने कहा कि यह प्रोजेक्ट राज्य शासन को प्रस्तुत किया जा सकता है, क्योंकि विचार वहीं होगा। बैठक में विधायक कुलदीप जुनेजा और विकास उपाध्याय, महापौर प्रमोद दुबे, पूर्व महापौर किरणमयी नायक, पीडब्ल्यूडी के चीफ इंजीनियर डीके अग्रवाल, कलेक्टर एस भारतीदासन, निगम आयुक्त शिव अनंत तायल, चेंबर अध्यक्ष जितेंद्र बरलोटा, दक्षिण के कांग्रेस प्रत्याशी कन्हैया अग्रवाल के अलावा आर्किटेक्ट राजेंद्र जैन, सुबोध बागरेचा, ऋषभ लूनिया, रविंद्र केशरवानी, संदीप श्रीवास्तव, स्वप्निल जग्गी, बिल्डर आनंद सिंघानिया और शैलेष वर्मा, एएसपी ट्रैफिक एमआर मंडावी, इंजीनियर आरके गुप्ता, एनआईटी के प्रो. यूके देवांगन और निगम के इंजीनियर बीआर अग्रवाल अादि मौजूद थे।

ट्रैफिक का नया सर्वे जरूरी, हल्की नियो मेट्रो का सुझाव

टाली गई बैठक, अब 22 को

राजधानी के सर्किट हाउस में सुझाव समिति की बैठक दोपहर करीब 12 बजे शुरू हुई। बैठक में लगभग ढाई घंटे विचार-विमर्श चला, लेकिन महाराष्ट्र मेट्रो के विशेषज्ञों की राय के बाद पूरा मामला फिर फंस गया है। बैठक ढाई बजे स्थगित की गई, लेकिन किसी भी सुझाव पर फैसला नहीं लिया जा सका। अध्यक्ष सत्यनारायण शर्मा ने कहा कि अब स्काईवॉक पर कोई भी फैसला सोच-समझकर लिया जाएगा, क्योंकि इसके दूसरे उपयोग की संभावनाएं ही सवालों के घेरे में अा गई हैं। इसलिए समिति की 22 अगस्त को दोबारा बैठक बुलाई गई है। इस बैठक में पीडब्ल्यूडी के अफसरों के अलावा बाहर के विशेषज्ञ भी शामिल होंगे। बैठक के पहले या बाद में स्काई वाॅक का बारीकी से निरीक्षण किया जाएगा, ताकि कोई फैसला लिया जा सके।

एक्सप्रेस-वे की जांच शुरू नहीं करवा पाए मेयर, कार्रवाई के बजाय जुट गए मरम्मत में

सिटी रिपोर्टर | रायपुर

जिस दिन एक्सप्रेस-वे की सड़क धंसी थी, महापौर प्रमोद दुबे ने तीन सीनियर पार्षदों की टीम से जांच का ऐलान किया था, लेकिन हादसे के पांच दिन बाद भी जांच तो दूर, नगर निगम से इसका अादेश जारी नहीं किया जा सका। महापौर ने गुरुवार को जांच बिठाते हुई इसकी रिपोर्ट तीन दिन यानी सोमवार तक मांगी थी, लेकिन भास्कर ने मंगलवार को इस बारे में पूछताछ की तो जांच टीम के सदस्यों ने बताया कि उन्हें अब तक कोई लिखित अादेश नहीं मिला है। इधर, एक्सप्रेस-वे में अाई बड़ी खामियों के बावजूद निर्माण एजेंसी ने कार्रवाई के बजाय मरम्मत पर फोकस कर लिया है। जहां सड़क धंसी और जहां दीवारें हैं, वहां मरम्मत शुरू कर दी गई है। अफसर यह तर्क देकर लीपापोती कर रहे हैं कि सड़क गारंटी में है और ठेकेदार इसे ठीक करके देगा।

एक्सप्रेस-वे के तेलीबांधा ओवरब्रिज पर किनारे की सड़क धंसकने के एक कार पलट गई थी। हादसे में एक व्यक्ति को मामूली चोटें अाईं, लेकिन शासन स्तर पर खलबली इसलिए मची थी क्योंकि इस सड़क का लोकार्पण अब तक नहीं हो पाया है। मामला सामने अाने के बाद पीडब्ल्यूडी मंत्री ताम्रध्वज साहू ने जांच के अादेश दिए थे। उधर, महापौर प्रमोद दुबे ने भी एमआईसी सदस्यों की एक टीम बनाई। टीम में सीनियर एमआईसी श्रीकुमार मेनन, सतनाम पनाग और समीर अख्तर को शामिल किया गया। मंगलवार को टीम के सदस्यों ने स्पष्ट कह दिया कि उन्हें जांच टीम बनाए जाने की कोई आधिकारिक सूचना नहीं मिली न ही विधिवत आदेश ही मिला है। इस स्थिति में जांच ही नहीं की जा सकती। जांच टीम बनाने के साथ यह तय किया जाता है कि आखिर जांच किन बिंदुओं पर की जानी है। टीम के सदस्य सतनाम पनाग ने कहा कि उन्हें निगम की ओर से कोई आदेश पत्र नहीं मिला है। महापौर ने तीन दिनों के भीतर जांच रिपोर्ट सौंपने का निर्देश दिया है तो तीन दिन का समय आदेश पत्र मिलने के बाद शुरू होगा।

जल्दी लोकार्पण के लिए हड़बड़ी में बनाई सड़क

एक्सप्रेस-वे के 5 फ्लाईओवर ही नहीं बल्कि सड़क की क्वालिटी पर भी गंभीर सवाल उठ रहे हैं। जानकारों का दावा है कि फाफाडीह से अमलीडीह तक करीब सात किमी का पैच अभी से जर्जर हो गया है और फाफाडीह से देवेंद्र नगर तथा तेलीबांधा से फुंडहर मोड़ तक सड़क की हालत कई जगह खराब होने लगी है। एक्सप्रेस-वे का 71 प्रतिशत हिस्सा सड़क का है। लोकार्पण के लिए इसके निर्माण में सबसे ज्यादा हड़बड़ी की गई। निर्माण की गुणवत्ता पर फोकस नहीं किया गया, इस वजह से अभी से गहरी दरारें नजर अा रही हैं और कुछ जगह सड़क के भी धंसकने का खतरा पैदा हो गया है।

कंपनी को नोटिस, नहीं मिला जवाब

स्टेशन से शदाणी दरबार तक बने 12 किमी के एक्सप्रेस-वे की शासन स्तर पर भी जांच शुरू नहीं हो सकी है। इसे बनाने वाली अहमदाबाद की कंपनी आयरन ट्रेंगल लिमिटेड को हादसे के बाद नोटिस जारी कर दिया गया था, लेकिन अब तक उसका जवाब ही नहीं मिला है। अब यह तर्क दिया जा रहा है कि अब तक इसका विधिवत लोकार्पण नहीं हो सका है, सड़क चालू भी नहीं है इसलिए पांच साल की परफार्मेंस गारंटी के अाधार पर इसे बना लिया जाएगा। इस सड़क का निर्माण छत्तीसगढ़ सड़क विकास निगम ने करवाया है। जानकारों का दावा है कि पिछली सरकार अाचार संहिता लागू होने से पहले इसका लोकार्पण करना चाह रही थी। इस वजह से हड़बड़ी में निर्माण किया गया और सड़क विकास निगम के अफसरों ने क्वालिटी पर पोकस ही नहीं किया। अब इसकी जांच में कई अफसर घेरे में अा सकते हैं, इसलिए लीपापोती शुरू कर दी गई है।

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