छत्तीसगढ़ / बस्तर में ‘मोती की खेती’ का पहला प्रयास सफल, अब मुफ्त प्रशिक्षण भी देंगे

करीब 20 महीने पहले सीपों की सर्जरी कर रेत के कण डाले गए। करीब 20 महीने पहले सीपों की सर्जरी कर रेत के कण डाले गए।
जगदलपुर। कण डालने के बाद  सीपों को तालाब में डाला जाता है। जगदलपुर। कण डालने के बाद सीपों को तालाब में डाला जाता है।
मोती तैयार होने के बाद उन्हें सीपों से बाहर निकालतीं मोनिका श्रीधर। मोती तैयार होने के बाद उन्हें सीपों से बाहर निकालतीं मोनिका श्रीधर।
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करीब 20 महीने पहले सीपों की सर्जरी कर रेत के कण डाले गए।करीब 20 महीने पहले सीपों की सर्जरी कर रेत के कण डाले गए।
जगदलपुर। कण डालने के बाद  सीपों को तालाब में डाला जाता है।जगदलपुर। कण डालने के बाद सीपों को तालाब में डाला जाता है।
मोती तैयार होने के बाद उन्हें सीपों से बाहर निकालतीं मोनिका श्रीधर।मोती तैयार होने के बाद उन्हें सीपों से बाहर निकालतीं मोनिका श्रीधर।

  • सीपियों को पालने में सफल सॉफ्टवेयर संस्था ने अब अंचल के आदिवासियों के लिए प्रशिक्षण की रूपरेखा बनाना किया शुरू, अगले कुछ महीनों से शुरू होगा प्रशिक्षण
  • सीपों का पालन कर मोतियां बनाने करने वाली मोनिका ने बताया कि कम निवेश में व्यक्ति आत्मनिर्भर बन सकता है

दैनिक भास्कर

Jan 14, 2020, 07:21 AM IST

ऋषि भटनागर | जगदलपुर . बस्तर की आबोहवा अब सीपों से मोती निकालने के िलए उपयुक्त मानी जाने लगी है। सीपों को पालने के लिए एक संस्था आगे आई है, जो बस्तर के आदिवासियों को सीपों पालने का प्रशिक्षण देने के साथ ही उन्हें आत्मनिर्भर बनाने की दिशा में काम में जुट गई है। बीते करीब 20 महीनों की मेहनत के बाद हाल में सीपों से मोतियों की पहली खेप संस्था ने निकाली है। बताया जाता है कि शहर में आदिवासियों के लिए काम करने वाली संस्था सॉफ्टवेयर (सोसाइटी ऑफ ट्राइबल वेलफेयर एंड रूरल एजुकेशन) ने करीब 20 महीने पहले सीपों को पालना शुरू किया। इसके बाद उन्हें मोतियों की पहली खेप मिली है। संस्था के संचालक मंडल ने आदिवासियों को अब इसका मुफ्त प्रशिक्षण देने की बात कही है। 


20 हजार से शुरुआत, 20 महीनों बाद हर माह 15 हजार आय: बस्तर में सीपों का पालन कर मोतियां बनाने करने वाली मोनिका ने बताया कि कम निवेश में व्यक्ति आत्मनिर्भर बन सकता है। इसके लिए करीब 20 हजार के करीब का निवेश करना होता है, जिससे एक अच्छी शुरुआत की जा सकती है। 20 महीने के इंतजार के बाद मिलने वाले मोतियों से करीब 2 लाख रुपए यानि हर महीने लगभग 15 से 16 हजार की आय की जा सकती है।

2 साल पहले भुवनेश्वर से मंगवाए थे 3 हजार सीप, तालाब में रखे गए

सॉफ्टवेयर संस्था की संचालक मोनिका श्रीधर ने बताया कि उन्होंने भुवनेश्वर से सीप मंगवाए। ये वह सीप हैं, जिनके अंदर मोती पलते हैं। ऐसे करीब 3 हजार सीप मंगवाकर उन्होंने 2 साल पहले अप्रैल-मई में एक टंकी बनाकर उसमें डलवा दिए। टंकी में ऐसी व्यवस्था भी की गई, जिससे सीप हरकत में रहें, जिसके लिए लहर पैदा करने वाली मोटर भी लगाई गई। कुछ समय तक तो सीप जिंदा रहे, लेकिन खारे पानी के सीप मीठे पानी में ज्यादा समय तक जिंदा नहीं रह पा रहे थे। ऐसे में उन्हें निकालकर तालाब में डलवा दिया गया। तालाब में सीप पनपने लगे और फिर परिणाम ये निकला कि आखिर में सीपों से मोती निकालने की प्रक्रिया शुरू कर दी गई। 

जानिए, कैसी होती है मोती बनाने की प्रक्रिया

छोटे स्तर पर मोती बनाने के लिए 500 वर्गफीट के तालाब में 100 सीप पाला जाता है। इसके बाद सीपों की सर्जरी के जरिए उसमें बीज डा़लना होता है। इसके लिए पहले प्रशिक्षण लेना होता है फिर सीपों में सर्जरी की जाती है। सीपों को खुले पानी में 2 दिनों के लिए छोड़ा जाता है। जिसस कवच और मांसपेशियां ढीली हो जाती हैं। फिर सतह पर 2 से 3 एमएम का छेद कर रेत का छाेटा कण डाला जाता है। सीप को जब रेत का कण चुभता है तो पदार्थ छोड़ना शुरू कर देता है। फिर सीपों को नायलॉन के बैग में डालकर पाइप के सहारे तालाब में छोड़ा जाता है। 20 महीनों बाद सीप में मोती तैयार हो जाता है, जिसे कवच तोड़कर निकालते हैं।  

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