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  • If you get the family's blessings with medicines, then you can also beat a serious disease like cancer, an assistant professor is a counselor or lecturer.

मंडे पॉजिटिव / दवाओं के साथ परिवार की दुआएं मिलीं तो कैंसर जैसी गंभीर बीमारी को भी हरा दिया, कोई असिस्टेंट प्रोफेसर है कोई काउंसलर या लेक्चरर

साइंस कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर सुनंदा मरावी को वर्ष 2008 में कैंसर ने अपनी चपेट में ले लिया था। साइंस कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर सुनंदा मरावी को वर्ष 2008 में कैंसर ने अपनी चपेट में ले लिया था।
वर्ष 2012 में उन्हें कैंसर हुआ तभी से वह कैंसर पीड़ितों की काउंसलिंग कर रही है। वर्ष 2012 में उन्हें कैंसर हुआ तभी से वह कैंसर पीड़ितों की काउंसलिंग कर रही है।
वर्ष 2017 में कैंसर की पहचान होने पर अपोलो हास्पिटल में इलाज चला। वर्ष 2017 में कैंसर की पहचान होने पर अपोलो हास्पिटल में इलाज चला।
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साइंस कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर सुनंदा मरावी को वर्ष 2008 में कैंसर ने अपनी चपेट में ले लिया था।साइंस कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर सुनंदा मरावी को वर्ष 2008 में कैंसर ने अपनी चपेट में ले लिया था।
वर्ष 2012 में उन्हें कैंसर हुआ तभी से वह कैंसर पीड़ितों की काउंसलिंग कर रही है।वर्ष 2012 में उन्हें कैंसर हुआ तभी से वह कैंसर पीड़ितों की काउंसलिंग कर रही है।
वर्ष 2017 में कैंसर की पहचान होने पर अपोलो हास्पिटल में इलाज चला।वर्ष 2017 में कैंसर की पहचान होने पर अपोलो हास्पिटल में इलाज चला।

  • कहानी तीन महिलाओं की जिन्होंने कैंसर को मात दी और नॉर्मल जीवन में लौटकर परिवार का सहारा बनीं
  • इनमें से एक आराधना त्रिपाठी कीमोथैरेपी चलने के दौरान से ही मरीजों की निशुल्क काउंसलिंग कर रही हैं

दैनिक भास्कर

Jan 20, 2020, 09:45 AM IST

बिलासपुर . परिवार का संबल मिलने से कैंसर जैसी गंभीर बिमारी को भी हराया जा सकता है। वजह मिलने वाले मनोबल से मरीज की बीमारी से लड़ने की इच्छाशक्ति बढ़ जाती है। शहर की कुछ ऐसी महिलाएं भी हैं जिन्होंने यह कर दिखाया जिनमें से आज कोई असिस्टेंट प्रोफेसर है, कोई काउंसलर और कोई लेक्चरर।


 कैंसर का नाम सुनकर ही पीड़ित मरीज डिप्रेशन में चला जाता है। परिवार बिखर जाता है लेकिन यह कहानी उन महिलाओं की है जिन्होंने परिवार की ताकत के बलबूते न केवल गंभीर बिमारी को हराया बल्कि वे इलाज के बाद बाकायदा अपनी पूर्व की जीवनशैली में लौटकर परिवार का आधार बनी हुई हैं। इनमें से एक महिला तो कैंसर पीड़ित मरीजों को निशुल्क काउंसिलिंग भी दे रही है। कैंसर बीमारी में मरीज के अवसाद से घिरने की प्रमुख वजह लंबा चलने वाला इलाज है जिसमें संयम की खासी जरूरत होती है। ऐसे में परिवार से मिलने वाली ताकत उन्हें इन चुनौतियों से निपटने की प्रेरणा देती है। 

सुनंदा साइंस कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर हैं

साइंस कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर सुनंदा मरावी बताती हैं कि वर्ष 2008 में कैंसर ने उन्हें चपेट में ले लिया था। बीमारी की पहचान होने पर मुंबई टाटा मेमोरियल हॉस्पीटल में लंबा इलाज चला। ऐसे वक्त मायके पक्ष और पति का साथ मिला, जिससे वे इलाज करा पाई। वे बताती हैं कि इलाज के दौरान वे अपनी इकलौती बिटिया को मां के पास छोड़कर जाती, जबकि पति इलाज के दौरान उनके साथ रहते थे। इलाज के पांच साल बाद दिसंबर 2013 में एक बार फिर कैंसर की पहचान हुई लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। वे हर साल एक बार टाटा हास्पिटल चेकअप के लिए जाती हैं। वर्तमान में वे साइंस कॉलेज में असिस्टेंट प्रोफेसर के पद पर पदस्थ हैं।
 

आराधना मरीजों की निशुल्क काउंसलिंग कर रही हैं

अपोलो हॉस्पिटल में काउंसलर पद पर पदस्थ आराधना त्रिपाठी कीमोथैरेपी चलने के दौरान से ही मरीजों की निशुल्क काउंसलिंग कर रही हैं। उन्होंने बताया कि वर्ष 2012 में उन्हें कैंसर हुआ था। पति आकाशवाणी में थे। उनके इलाज के दौरान मां और पति के संबल से ही उन्होंने इस चुनौती से निपटा। पति का स्वर्गवास हो चुका है फिर भी वे उसी शिद्दत से मरीजों के मनोबल को बढ़ाने का काम कर रही हैं। उन्होंने बताया कि इलाज के दौरान वे बहुत रोती थीं तब पति ने कहा था कि जिस दिन डाक्टर तुम्हारा नंबर कैंसर मरीज को दे तब समझना तुम मेरे कर्ज से मुक्त हो गई। 

मधुरिमा स्कूल में लेक्चरर के पद पर पदस्थ हैं

वर्ष 2017 में कैंसर की पहचान होने पर अपोलो हास्पिटल में इलाज चला। पति कोरबा में प्राइवेट कंपनी में जॉब करते हैं। प्राइवेट जॉब में लंबी छुट्टी नहीं मिलने की वजह से ससुराल पक्ष ने पूरा साथ दिया। बीमारी की पहचान होने के बाद वे अपोलो के डाॅ. अमित वर्मा से मिलीं और फिर वहां इलाज चला। इसके बावजूद परिवार में सास-ससुर के अलावा देवर ने इलाज के दौरान साथ दिया। इलाज के दौरान उनकी छोटी बच्ची का ख्याल परिवार के लोग रखते थे। उन्होंने कहा कि भगवान से प्रार्थना है कि ऐसा परिवार सबको मिले जो मुसीबत में उनका साथ दे। मधुरिमा श्रीवास्तव वर्तमान में बालक सरकंडा स्कूल में लेक्चरर के पद पर पदस्थ हैं।

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