छत्तीसगढ़ / 23 दफ्तरों में रैंप पर 6 करोड़ फूंककर जड़ दिया ताला, 17 हजार दिव्यांगों का पंजीयन, पर नौकरी हजार को भी नहीं, विकलांगों के बाजार में नहीं हैं उनकी दुकानें... करोड़ों का फंड, सुविधाएं शून्य

6 crore burnt on the ramp in 23 offices
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6 crore burnt on the ramp in 23 offices

  • आज विश्व दिव्यांग दिवस पर भास्कर की खास रिपोर्ट

Dainik Bhaskar

Dec 02, 2019, 11:45 PM IST

असगर खान/राकेश पाण्डेय / अमिताभ अरुण दुबे | रायपुर . समाज कल्याण समेत राज्य शासन के सारे विभागों में दिव्यांगों के नाम पर कुछ न कुछ प्लान है। उसके लिए करोड़ों रुपए का फंड भी है, लेकिन अमल ऐसा है कि करोड़ों रुपए फूंककर भी दिव्यांगों को बड़े लाभ तो दूर, ट्राइसिकिल के अलावा खास फायदा नहीं मिल पाया है। दिव्यांगों के लिए जितनी भी योजनाएं हैं, उनकी हकीकत चौंकाने वाली है। जैसे, पिछले 2 साल में राजधानी के 23 दफ्तरों में 6 करोड़ रुपए से िदव्यांगों के लिए रैंप बनाए गए हैं। लेकिन अधिकांश रैंप वहीं हैं, जहां गेट पर ताला लगा हुअा है यानी प्रवेश निषेध। यही काम 10 और जिलों में करने के लिए केंद्र से 21 करोड़ रुपए और अा गए हैं। इसी तरह, सरकारी एजेंसियों ने खासतौर से दिव्यांगों के लिए 17 हजार से ज्यादा का रोजगार दफ्तर में पंजीयन कर रखा है पर नौकरी हजार को भी नहीं मिली है। राजधानी की प्राइम लोकेशन पर विकलांगों के लिए बाजार खुला है, पर वहां किसी दिव्यांग की दुकान नहीं है। कई योजनाएं तो ऐसी भी हैं कि फंड भरपूर है लेकिन एजेंसियां ऐसा दिव्यांग ही नहीं ढूंढ सकी हैं, जिन्हें इसका लाभ दिया जा सके।


प्रदेश और केंद्र सरकार हर साल समाज कल्याण समेत कई विभागों को दिव्यांगों की सुविधाओं के लिए अलग से फंड दे रही हैं, पर इनका लाभ उन्हें नहीं मिल पा रहा है। कुछ योजनाएं तो ऐसी हैं, जिनमें एक हितग्राही ढूंढा नहीं जा सका है। 

 जो फंड अाया, प्रचार-प्रसार में खत्म हो रहा है। जैसे, दूसरे शहरों में रहकर पढ़ने वाले 40% से ज्यादा नि:शक्त विद्यार्थियों के लिए नि:शुल्क दिव्यांग हाॅस्टल योजना 2016 में शुरू की गई। इस छात्रगृह योजना का 50 लाख का बजट है। 5 विद्यार्थियों के समूह को ए श्रेणी के शहर के लिए 10 हजार, बी श्रेणी के के लिए 7 हजार और सी के लिए 5 हजार किराया मिलना था, पर एक भी नहीं ढूंढा जा सका। शिक्षा के अधिकार अधिनियम (आरटीई) के तहत सभी दिव्यांगों के लिए अलग से शौचालय होना चाहिए। इसमें रैंप भी होना चाहिए। मानसिक दिव्यांगों के लिए स्पेशल एजुकेटर होना चाहिए। लेकिन राजधानी के किसी शिक्षण संस्थान में यह सुविधा नहीं है। इसी तरह, दिव्यांगों को पीएससी/यूपीएससी की प्रारंभिक परीक्षा पास करने पर 20 हजार रुपए, मेंस क्लीयर करने पर 30 हजार और क्वालीफाई होने पर 50 हजार दिए जाते हैं। इस योजना का हाल भी ऐसा है कि 2016 में शुरू हुई इस योजना में मिले 30 लाख रुपए के फंड में अब तक 5.30 लाख ही खर्च किए जा सके हैं। नि:शक्तजनों के प्रमाणीकरण, पंजीयन एवं परिचय पत्र देने के लिए 2005 में पं. दीनदयाल उपाध्याय के नाम से योजना बनी। इसमें 40 प्रतिशत से ऊपर नि:शक्तता वाले लोगों का परीक्षण कर प्रमाणपत्र देना था। योजना में अब तक लगभग 2.77 लाख को ही प्रमाणपत्र दिया जा सका है, जबकि 2011 की जनगणना के अनुसार ही प्रदेश में 6.24 हजार दिव्यांग हैं। 
 
प्रदेश में 21 कैटेगरी में दिव्यांगों की 14 नई श्रेणियों के लिए सर्वे जल्द
छत्तीसगढ़ में 21 तरह की श्रेणियों में दिव्यांगों की पहचान के लिए समाज कल्याण विभाग सर्वे की तैयारी कर रहा है। 2011 की जनगणना के मुताबिक प्रदेश में 6 लाख 42 हजार से दिव्यांग हैं, लेकिन ये सिर्फ 7 कैटेगरी में हैं। हाल में एसिड अटैक समेत 14 और श्रेणियां शामिल की गई हैं, ताकि इन्हें भी दिव्यांगों की योजनाओं का लाभ मिले। 


ये भी नहीं मिला दिव्यांगों को
- हॉस्टल व स्कूलों में दिव्यांग बच्चों को उनकी शक्ति या समझ के अनुसार पढ़ाई की सुविधा मिलनी चाहिए। 
- दिव्यांगों के लिए संचालित सरकारी संस्थाओं हर हफ्ते इनका स्वास्थ्य परीक्षण होना चाहिए, लेकिन नहीं होता। 
- स्कूलों, आंगनबाड़ी भवन, बस स्टैंड, खेल जगहों पर दिव्यांगों के लिए बैरियर-फ्री व्यवस्था नहीं हो सकी है।

दुकान इतनी महंगी, खरीदे कौन? : निगम ने अपने व्यावसायिक परिसरों और दुकानों मंे दिव्यांगों के लिए अारक्षण रखा है। लेकिन यह दुकानें अंत तक इसलिए खाली रह जाती हैं, क्योंकि महंगी इतनी हैं कि दिव्यांग साहस नहीं कर पाते हैं। दिव्यांगों की मांग रही है कि सरकारी एजेंसियां उनके लिए दुकानों की कीमत में छूट दे, पर ऐसा नहीं हुअा। रायपुर में ही प्राइम लोकेशन यानी एकात्म परिसर के पास दिव्यांग बाजार बनाया गया है। भास्कर टीम ने पड़ताल की तो पता चला कि दिव्यांगों को दुकानें अलाट हैं, लेकिन उनमें से एक भी इसे नहीं चला रहे हैं।

ग्राउंड रिपोर्ट | रैंप बने नहीं या काम के नहीं, टाॅयलेट भी नहीं
सरकारी भवनों में दिव्यांगों की सुविधाओं के लिए रैंप बनाने में राजधानी के अलग-अलग विभागों और एजेंसियों ने पिछले 2 साल में 6 करोड़ रुपए से ज्यादा खर्च किए हैं। इनसे 23 जगह रैंप बनाए गए हैं। सबसे बुरा हाल इन्हीं का है। कलेक्टोरेट परिसर में ही जिला पंचायत के प्रवेश द्वार और रजिस्ट्री दफ्तर में रैंप बनाया ही नहीं है। एसपी ऑफिस में एजेंसियों ने उस गेट पर रैंप बनवाया, जिसका ताला बरसों से नहीं खुला है। नगर निगम दफ्तर में दिव्यांगों का अाना-जाना सबसे ज्यादा है। वहां रैंप है, लेकिन कर्मचारियों ने यहीं पार्किंग भी बना डाली है। रैंप के अलावा हर दफ्तर में दिव्यांगों के लायक टाॅयलेट बनाए जाने थे, लेकिन एकाध को छोड़कर किसी में नहीं हैं। अब, शहर के सरकारी भवनों को दिव्यांगों के लिए बाधारहित बनाने केंद्र सरकार ने 21 करोड़ रुपए और मंजूर कर दिए हैं। इनसे प्रदेश के 10 शहरों बिलासपुर, दुर्ग, राजनांदगांव, कवर्धा, मुंगेली, कोरबा, रायगढ़, बस्तर, कोरिया और अंबिकापुर में सरकारी विभागों में रैंप बनेंगे और सुगम्य भारत अभियान तहत बाकी सुविधाओं को मिलाकर करीब 60 करोड़ रुपए खर्च करने की तैयारी है। यह काम भी उसी तरह होगा, जैसा रायपुर में किया गया है।

विकलांगों के फायदे की कई योजनाएं :  विकलांगों की सुविधाओं में कमी और योजनाओं के क्रियान्वयन को लेकर दिव्यांगों के लिए कई योजनाएं चलाई जा रही हैं। उन्हें लाभ भी मिल रहा है। कमियां कहां हैं, इसका पता लगाया जाएगा। -एके टोप्पो, सचिव, समाज कल्याण विभाग

जहां दिक्कत है, ठीक कराएंगे :  कलेक्टोरेट में रैंप काे लेकर जहां भी दिक्कत है, देखकर ठीक कराएंगे।  - डाॅ. एस भारतीदासन, कलेक्टर

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