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स्मार्ट कार्ड से इलाज करने वाली एजेंसी के अफसरों-स्टाफ का रिकाॅर्ड गायब

2 वर्ष पहले
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  • स्वास्थ्य विभाग में सामने आया भर्ती का एक और गोलमाल
  •  पिछली सरकार में बरसों से संविदा नियुक्ति पा रहे हैं अफसर और एक दर्जन स्टाफ
  • मार्च में संविदा बढ़ाने के समय फाइलों की खोजबीन हुई तब सामने आया मामला
  • मूल सर्विस रिकॉर्ड के बजाय ऑफिस में रखा हुआ है फोटो-कॉपी किया हुआ रिकॉर्ड

मोहम्मद निजाम, रायपुर . स्वास्थ्य विभाग में भर्ती के गोलमाल का नया कांड फूटा है। स्मार्ट कार्ड से फ्री इलाज करने वाली स्टेट नोडल एजेंसी के अफसरों और एक दर्जन स्टाफ का सर्विस रिकाॅर्ड गायब है। हेल्थ मुख्यालय से एजेंसी के नोडल अफसर सहित पूरे स्टाफ की संविदा सेवाओं का रिन्यूअल करने के लिए नियुक्ति की शर्तों वाली फाइलों को मंगवाया गया। तब फाइलों की खोजबीन की गई। दो दिन तक पूरा ऑफिस खंगालने के बाद जब फाइल नहीं मिलीं तब सबके होश उड़े। एजेंसी के नोडल अफसर विजयेंद्र कटरे कई कारणों से जांच के घेरे में है। इस वजह से फाइल गायब होने के कई मायने निकाले जा रहे हैं।

 

हेल्थ अफसरों ने विभागीय स्तर पर जांच कमेटी गठित करने के साथ ही पुलिस में मामला सौंपने की तैयारी की जा रही है। अफसर इस बात से हैरान हैं कि फाइल तो गायब है, लेकिन सभी की फोटो कॉपी को सहेजकर रखा गया है। छानबीन के दौरान फोटो-कॉपी मिलना अफसरों को संदेहास्पद लग रहा है। किसी भी दस्तावेज में फोटो-कॉपी के दौरान छेड़खानी करना आसान है। चूंकि फाइल गायब हो चुकी है, इस वजह से फोटो-कॉपी का वेरीफिकेशन करना संभव नहीं है। 


फोटो कॉपी में नोडल अफसर के अलावा कुछ स्टाफ की नियुक्ति और उनकी योग्यता से संबंधित पूरा ब्योरा है। एजेंसी के नोडल अफसर की भर्ती को लेकर कई बार विवाद खड़े हो चुके हैं। यहां तक कि कोर्ट में भी याचिका दायर की जा चुकी है कि एमबीबीएस डाॅक्टर न होने के बावजूद उन्हें स्मार्ट कार्ड जैसी हेल्थ की सबसे महत्वपूर्ण एजेंसी की जिम्मेदारी सौंपी गई। जबकि नोडल अफसर की भर्ती के लिए डाॅक्टर होना पहली प्राथमिकता थी। पिछली सरकार में ये तर्क देकर उन्हें पोस्टिंग दी गई कि कोई भी एमबीबीएस डाॅक्टर नोडल अफसर बनने केल लिए राजी नहीं है। इस वजह से बाकी योग्यताओं को ध्यान में रखकर विजयेंद्र कटरे को नियुक्ति दी गई।

 

एजेंसी पर 55 लाख स्मार्ट कार्ड धारकों के इलाज का जिम्मा : स्टेट नोडल एजेंसी को 55 लाख हेल्थ स्मार्ट कार्ड से इतने ही परिवारों के फ्री इलाज का जिम्मा है। अस्पतालों की मॉनीटरिंग से लेकर इलाज करने वाली बीमा कंपनी के बीच समन्वय का काम यही एजेंसी करती है। एजेंसी की मंजूरी के बाद ही सरकार करोड़ों का भुगतान बीमा कंपनी को करती है। किसी भी अस्पताल को फ्री इलाज की मान्यता देना न देना इसका फैसला भी एजेंसी ही करती है। यही वजह है कि इसके नोडल अफसर का पद बेहद महत्वपूर्ण माना जाता है।

 

ऑडिट रिपोर्ट की जरूरत बैंकों से बड़े लोन लेने के लिए ट्रस्ट, सार्वजनिक या शासकीय संस्थानों और कंपनियों को अपनी ऑडिट रिपोर्ट भी जमा करनी होती है। इस रिपोर्ट में बताया जाता है कि उनका सालाना टर्नओवर या काम में कितने रुपए की लागत लगती है और खर्चों के बाद कितनी आय होती है। इस ऑडिट रिपोर्ट से संस्थान की वित्तीय क्षमता पता चलती है। इंकम टैक्स रिटर्न दाखिल करने के समय भी ऑडिट रिपोर्ट फाइल की जाती है। इसलिए यह महत्वपूर्ण रिपोर्ट होती है। इसमें संस्थानों या कंपनियों का सालभर का वार्षिक वित्तीय लेखा-जोखा दर्ज होता है।

 

जांच कमेटी बनी :  नोडल अफसर की नियुक्ति की जांच के लिए डिप्टी डायरेक्टर डाॅ. नेतराम बेक की अध्यक्षता में कमेटी बनाई गई है। इसमें ज्वाइंट डायरेक्टर डाॅ. दीपक अग्रवाल समेत 2 टेक्निकल स्टाफ हैं।

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