भास्कर खास / भगवान सूर्य ही नहीं उनके पुत्र रेवंत भी पूजे जाते रहे हैं छत्तीसगढ़ में

हैहयवंशीय खुद को सूर्य के साथ जोड़ते रहे हैं, इसलिए पूरे प्रदेश में सूर्य उपासना का जोर था। हैहयवंशीय खुद को सूर्य के साथ जोड़ते रहे हैं, इसलिए पूरे प्रदेश में सूर्य उपासना का जोर था।
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हैहयवंशीय खुद को सूर्य के साथ जोड़ते रहे हैं, इसलिए पूरे प्रदेश में सूर्य उपासना का जोर था।हैहयवंशीय खुद को सूर्य के साथ जोड़ते रहे हैं, इसलिए पूरे प्रदेश में सूर्य उपासना का जोर था।

  • सरगुजा जिले के डीपाडीह के बोरजा टीले के नीचे मिली है विशाल सूर्य मंदिर की संरचना

Dainik Bhaskar

Jan 15, 2020, 03:33 AM IST

विश्वेश ठाकरे | रायपुर . छत्तीसगढ़, इतिहास और संस्कृति को लेकर लैंड ऑफ सरप्राइज है। यहां बिखरी पुरातात्विक संपदा चौंकाने वाले राज बताती है। यहां मिले कुछ शिलालेख, मंदिर, मूर्तियां इस बात की गवाह हैं कि क्षेत्र में एक समय सूर्य उपासकों के सौर संप्रदाय का गहरा प्रभाव था। यहां सूर्य मंदिर, सूर्य के पूजन के साथ-साथ उनके पुत्र रेवंत का मंदिर और उनकी पूजा की भी परंपरा थी। पुरातत्व विभाग को सरगुजा से लेकर बस्तर तक उत्खनन के अभियानों में सूर्य की कई प्रतिमाएं मिली हैं, लेकिन सबसे बड़ी खोज हुई सरगुजा के डीपाडीह के बोरजा टीले में।

इस टीले के नीचे से विशाल सूर्य मंदिर के अवशेष मिले। यहीं सूर्य की प्रतिमा मिली है जो खंडित है, लेकिन उसके शरीर का आकार, बचे हुए कुंडल, एक चक्र, घोड़े, सारथी सभी बताते हैं कि यह कभी भव्य रही होगी। प्रदेश में सूर्य की मूर्तियां नारायणपुर के अदिति मंदिर, सरगुजा के देवटिकरा, देवगढ़ से मिली हैं। बिलासपुर के ताला गांव, किरारीगोड़ी, कवर्धा के भोरमदेव, बस्तर के अमरावती, बारसूर, तीरथगढ़, बीजापुर, दंतेवाड़ा के दंतेश्वरी मंदिर में सूर्य की प्रतिमाएं मिली हैं। 

 लेकिन कहीं भी डीपाडीह जैसा अलग सूर्य मंदिर नहीं मिला। इसलिए माना जा रहा है कि 11 वीं सदी में सरगुजा में सौर संप्रदाय का गहरा प्रभाव रहा होगा। इस तथ्य को एक और बात पुष्ट करती है कि 11वीं-12वीं सदी में इस क्षेत्र के कलचुरी शासक हैहयवंशीय रहे हैं। हैहयवंशीय खुद को सूर्य के साथ जोड़ते रहे हैं, इसलिए पूरे प्रदेश में सूर्य उपासना का जोर था। सूर्य मंदिर और प्रतिमाओं के बीच सबसे आश्चर्यजनक खोज हुई सूर्यपुत्र रेवंत के मंदिर की।

रतनपुर में एक शिलालेख मिला। यह शिलालेख रायपुर संग्रहालय में संरक्षित है। राजा पृथ्वीदेव द्वितीय का यह 28 पंक्तियों वाला शिलालेख 1158-1159 ईस्वी का है। इसमें लिखा है कि वल्लभराज नामक सामंत ने विकर्णपुर में अनेक मठ, मंदिर, उद्यान और रेवंत का मंदिर बनाया। विकर्णपुर आज का कोटगढ़ है। कोटगढ़ जांजगीर जिले के अकलतरा से लगा हुआ है। यहां किले के द्वार, प्राचीन मंदिर, तालाब सभी इसे एक प्राचीन नगर के रूप में स्थापित करता है, लेकिन वर्तमान में रेवंत मंदिर के कोई अवशेष नहीं मिलते। पुरातत्व विशेषज्ञ राहुल सिंह कहते हैं कि छत्तीसगढ़ में सूर्य की आराधना, पूजन की परंपरा तो थी ही मकर संक्रांति में दान की परंपरा का उल्लेख भी यहां के कुछ अभिलेखों में आता है। 
 

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