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राजधानी के वैज्ञानिकों ने चौलाई भाजी की ऐसी किस्म बनाई जो 20 दिन में हो जाएगी तैयार

एक वर्ष पहले
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रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विवि में रिसर्च के लिए लगाई गई चौलाई भाजी को क्रास ब्रीडिंग से बचाने के लिए नेट से कवर किया गया। - Dainik Bhaskar
रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विवि में रिसर्च के लिए लगाई गई चौलाई भाजी को क्रास ब्रीडिंग से बचाने के लिए नेट से कवर किया गया।
  • रायपुर स्थित इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिक कर रहे हैं शोध, कहा-इसमें कई तरह की खूबियां
  • सौ से अधिक स्थानों से एकत्र किए गए चौलाई भाजी के सैंपल, सेहत के लिए भी है बहुत फायदेमंद

सुधीर उपाध्याय। रायपुर. इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय के वैज्ञानिकों ने छत्तीसगढ़ में बहुतायत से खाई जाने वाली चौलाई भाजी की ऐसी किस्म तैयार कर ली है, जो सिर्फ 15 से 20 दिन में तैयार हो जाएगी, उत्पादन भी ज्यादा होगा और कीड़े भी कम लगेंगे। इस किस्म को विकसित कर राष्ट्रीय स्तर पर लाया जा रहा है। विवि प्रशासन का दावा है कि चौलाई में इतनी ज्यादा खूबियां हैं कि यह भाजी देशभर में छत्तीसगढ़ की पहचान बन सकती है। कृषि विवि के कुलपति डॉ. एसके पाटिल का कहना है कि छग में पाई जाने वाली भाजियों पर रिसर्च इसलिए भी क्योंकि इनमें कई तरह की खूबियां हैं।


राजधानी से लेकर छत्तीसगढ़ के गांव-गांव में भाजी हर घर में हर दूसरे दिन की डिश है। इनमें सबसे ज्यादा बिकने वाली चौलाई, लाल और पालक पर कृषि विवि के वैज्ञानिक शोध कर रहे हैं। सबसे बड़ा शोध चौलाई पर चल रहा है, क्योंकि इसकी बिक्री और खपत सबसे ज्यादा है। सब्जी विज्ञान विभाग के प्रोफेसर प्रवीण शर्मा ने बताया कि शुरुआत में सौ से अधिक जगहों से चौलाई भाजी की किस्में कलेक्ट की गईं और उनपर पांच साल काम किया गया। इसके बाद ऐसी किस्म विकसित की गई है, जिसमें कई तरह की खूबियां हैं। 

अाधे समय में होगी तैयार
वैज्ञानिकों ने बताया कि अभी राजधानी और पूरे प्रदेश में चौलाई की जो किस्म उपलब्ध है, वह बीज बोने के 30 से 40 दिन में खाने लायक होती है। जो नई किस्म विकसित की गई है, वह 15 से 20 दिन में खाने लायक हो जाएगी। वैज्ञानिकों ने बताया कि चौलाई भाजी में विटामिन ए और सी के साथ प्रोटीन, आयरन, कैल्शियम प्रचुर मात्रा में रहते हैं। सामान्यतया 100 ग्राम चौलाई भाजी में 4 ग्राम प्रोटीन, 0.5 ग्राम वसा, 397 मिग्रा कैल्शियम मिल सकता है।

भाजी की अलग-अलग किस्मों को नेट से कवर किया
कृषि विवि में भाजी की अलग-अलग किस्मों को नेट (मच्छरदानी का कपड़ा) से पूरी तरह ढंककर रखा गया है। वैज्ञानिकों ने भास्कर को बताया कि हर भाजी की किस्म की शुद्धता के लिए यह कवर जरूरी है। ऐसा नहीं किया गया तो भाजी में पर-परागण यानी क्रास पॉलिनेशन (एक किस्म के पराग कणों की दूसरे में जाकर मिसब्रीडिंग) हो जाएगा और दोनों ही किस्मों की शुद्धता नहीं बचेगी। जैसे, लाल भाजी और बगल में लगी चौलाई भाजी में क्राॅस पाॅलिनेशन की वजह से दोनों के गुण नहीं बचेंगे। वैज्ञानिकों ने बताया कि किसानों ने चौलाई भाजी के जितने भी सैंपल भेजे हैं, पूरी तरह शुद्ध किस्म की नहीं है।

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