लोकसभा चुनाव / बड़े चेहरे-पैसा-पॉवर... सब गायब; रणनीति ही तय करेगी नांदगांव में कौन करेगा राज



Who will rule in Nandgaon?
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Who will rule in Nandgaon?

राजनांदगांव लोकसभा में पहली बार इतना लो-प्रोफाइल चुनाव, मोदी vs राहुल-भूपेश के नाम पर चुनाव लड़ रहीं भाजपा-कांग्रेस
 

Dainik Bhaskar

Apr 17, 2019, 02:09 AM IST

राजकिशोर भगत.  राजनांदगांव में चुनावी नदी इतनी शांत कभी नहीं बही। कोई शोर नहीं। सब कुछ चुपचाप चल रहा है। भाजपा के अमित शाह के दौरे को छोड़ दें तो अब तक कोई स्टार प्रचारक यहां नजर नहीं आया है। ये स्थिति भाजपा-कांग्रेस दोनों में है। तीसरे धड़े का यहां कोई अस्तित्व दूर-दूर तक नहीं। दरअसल, पूर्व मुख्यमंत्री रमन सिंह का गृहक्षेत्र होने के कारण राजनांदगांव सीट हमेशा हाईप्रोफाइल रही। राजपरिवार से शिवेंद्र बहादुर, देवव्रत सिंह, पद्मावती देवी सिंह सरीखे लोग यहां से चुनाव लड़े। इस लिस्ट में मोतीलाल वोरा, रमन सिंह, अभिषेक सिंह, मधुसूदन यादव जैसे दिग्गज नेताओं के शामिल होने के कारण हमेशा स्टार प्रचारकों का रेला नजर आया। पैसे और पॉवर की होड़ नजर आती थी। पार्टी दफ्तर से लेकर कार्यकर्ताओं के घरों तक चुनाव का शोर सुनाई देता था। इस बार चुनाव में ये सब नदारद हैं। बड़ी सादगी से छोटे-बड़े सब तरह के भाजपाई जवाब दे रहे हैं कि इस बार पार्टी ने कार्यकर्ता को टिकट दिया है। इसलिए शोर का कम होना स्वाभाविक है। कमोबेश यही स्थिति कांग्रेस में है। भोलाराम लो-प्रोफाइल नेता माने जाते हैं। राजनांदगांव में ऐसी स्थिति पहली बार बनी है, जिसे सब महसूस कर रहे हैं। 

 

लोकसभा क्षेत्र में कुल मतदाता 

 

  • 17,10682 कुल वोटर
  • 8557739 पुरुष
  • 854934 महिला

आर्थिक संकट के कारण बंद हुआ मिल दोबारा शुरू करने कोई पहल नहीं : राजनांदगांव के बलदेव बाग में इस बीएनसी मिल के जरिए कभी हजारों लोगों को रोजगार मिलता था। लेकिन आर्थिक संकट होने के कारण प्रबंधन इसका संचालन नहीं कर पाया और 2000 में इसे बंद कर दिया गया। तब से इसके दोबारा संचालन को लेकर कोई ठोस पहल नहीं की गई है।

 

लगभग 5 लाख साहू वोटर्स: 8 विधानसभाओं में साहू समाज का वोटबैंक साढ़े 4 से 5 लाख के बीच है। संख्या बल अधिक होने से ही साहू समाज की ओर से राजनीतिक दलों से लोकसभा टिकट की मांग की गई थी। कांग्रेस ने समाज की मांग पर गौर करते हुए पिछड़ा कार्ड खेल दिया। हालांकि साहू समाज के सभी लोग कांग्रेस से जुड़े हुए नहीं हैं और भाजपा समर्थित सदस्य भी हैं। संख्या बल पर गौर करें तो दोनों ही दलों को मशक्कत करना पड़ेगी। 

 

भाजपा :  लोकसभा चुनाव में भाजपा नरेंद्र मोदी के चेहरे को लेकर मैदान में उतरी है। प्रत्याशी संतोष पांडेय चर्चित चेहरे नहीं रहे है। संगठन तक उनकी मौजूदगी रही। ऐसे में पांडेय के व्यक्तित्व और कार्यों के बजाय भाजपा नरेंद्र मोदी के चेहरे पर चुनाव लड़ रही है। वह मोदी के पांच साल के कार्यों को लेकर वोटर्स के बीच पहुंच रही है।

 

कांग्रेस :  विधानसभा चुनाव में मिली बड़ी जीत और भूपेश बघेल के नेतृत्व को लेकर कांग्रेस चुनावी मैदान में है। विस चुनाव के बाद कांग्रेस ने जिस तरह कर्जमाफी की है, उसे लोकसभा में भी भुनाने का प्रयास किया जा रहा है। कांग्रेस के मेनिफेस्टो में शामिल गरीब परिवार को 72000 रु. सालाना देने की घोषणा को कांग्रेस ने बड़ा चुनावी मुद्दा बनाया है।

 

इन मुद्दों की बात कोई नहीं कर रहा 
 

सिंचाई : जिला कृषि बाहुल्य है। इसके चलते किसानों का मुद्दा यहां हर बार कारगर साबित होता रहा है। सिंचाई जिले की बड़ी समस्या और मांग भी रही। सात प्रमुख जलाशयों के बाद भी जिले का 50 फीसदी कृषि रकबा ही पूर्ण सिंचाई की जद में है। सिंचाई व्यवस्था को लेकर लगातार आंदोलन होते रहे। 

 

उद्योग : राजनांदगांव में एकमात्र बीएनसी मिल के बंद होने के बाद कोई बड़ा उद्योग नहीं लग पाया। इससे इलाके में बेरोजगारी का ग्राफ बढ़ता ही जा रहा है। अकेले राजनांदगांव जिले में ही 1 लाख 75 हजार पंजीकृत बेरोजगार हैं। इसके अलावा उद्योग नहीं होने से किसी भी स्तर के लोगों को रोजगार मुहैया नहीं हो पा रहा है।

 

जातिगत समीकरण: सामान्य बनाम पिछड़ा वर्ग की रोचक लड़ाई 

 

कांग्रेस की ओर से लोकसभा क्षेत्र में पिछड़ा वर्ग की बहुलता को देखते हुए साहू समाज से भोला राम साहू को मैदान में उतारकर पिछड़ा कार्ड खेला है। इधर, भाजपा ने जातिगत समीकरण को नजरअंदाज कर सामान्य वर्ग से कवर्धा के संतोष पांडेय को प्रत्याशी बनाकर सबको चौंका दिया है। कांग्रेस से प्रत्याशी तय होने के बाद से यही माना जा रहा था कि भाजपा भी पिछड़ा वर्ग से ही प्रत्याशी घोषित करेगी, लेकिन ऐसा नहीं किया गया। चर्चा तो यह भी है कि कांग्रेस पिछड़ा वर्ग कार्ड को मुद्दा नहीं मान रही, बल्कि संसदीय क्षेत्र का विकास ही उसका मुख्य मुद्दा है। 

 

जाति हावी नहीं, सामान्य वर्ग को भी मिली है जीत : लोकसभा क्षेत्र में पिछड़ा वर्ग से जुड़े मतदाताओं की संख्या में 8 से 9 लाख के बीच में है। यहां जातिगत समीकरण कभी हावी नहीं रहा है। 1957 और 1962 में वीरेन्द्र बहादुर सांसद रहे। पद्मावती देवी सिंह ये पिछड़ा वर्ग से नहीं थे। वहीं राम सहाय पांडे, मदन तिवारी सामान्य वर्ग से होते सांसद बने थे। शिवेन्द्र बहादुर, अशोक शर्मा, मोतीलाल वोरा, डॉ. रमन सिंह, प्रदीप गांधी, देवव्रत सिंह, मधुसूदन यादव, अभिषेक सिंह सांसद रहे हैं।


 

 

 

 

 

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