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महिलाओं को समूह से जोड़ आर्थिक तंगी से दिलाया छुटकारा

एक वर्ष पहले
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बागनदी क्षेत्र के कोठीटोला पंचायत के आश्रित गांव नवागांव की दिव्यांग बेटी ममता चंद्रवंशी उन लोगों के लिए प्रेरणास्रोत बन गई है जो शारीरिक रूप से सक्षम होने के बाद भी समाज के लिए कुछ नहीं कर पाते और जिंदगी भर किस्मत को ही कोसते रहते हैं। धुर नक्सल प्रभावित गांव में रहने वाली इस बेटी ने दिव्यांगता को मात देते हुए आसपास के 15 गांवों में नारी सशक्तिकरण का अलख जगा रखा है। रोज ट्राइसिकल से पांच से छह गांवों का दौरा करती हैं। महिलाओं को जागरूक कर समूह से जोड़ रखा है और आर्थिक तंगी से छुटकारा दिलाया है।

अपनी इस सक्रियता की वजह से 1500 महिलाओं की लीडर बनी हुई हैं। पिछड़े हुए गांवों में सामाजिक क्रांति लाने वाली इस दिव्यांग बेटी के साहस को राज्य शासन ने सम्मानित भी किया है। वर्ष 2013 में ममता को माता कौशिल्या सम्मान बतौर एक लाख रुपए का पुरस्कार दिया गया था। नक्सलगढ़ और पिछड़े हुए गांव की इस बेटी का बचपन से ही संघर्ष से नाता है। ममता जब 8 साल की थीं तभी पिता का निधन हो गया।

महिला दिवस पर िवशेष

अब लोग सम्मान दे रहे

ममता ने बताया कि महिलाएं अब जागरूक हो चुकी हैं। शराबबंदी, स्वच्छता से लेकर जल संरक्षण का अभियान चला रहीं हैं। स्थिति यह है कि अब गांव की महिलाओं को किसी भी काम के लिए बैंक वाले लोन देने से नहीं कतराते। महिलाएं अपने स्तर पर बकरी पालन, जिमीकंद उत्पादन, डेयरी के क्षेत्र में काम करने लगी हैं। अब तो ताने मारने वाले भी सम्मान करने लगे हैं। शासन से सम्मान की जो राशि मिली थी, उसे भी समूह के कार्यों में लगा दिया। 6 ग्राम पंचायत के 12 गांव की लगभग 1500 महिलाएं समूह से जुड़ी हैं।

अपनों ने ताने सुनाए

समूह से जुड़ने के बाद गांव की महिलाओं को जोड़ना शुरू किया। इस तरह गांव में 11 समूह का गठन हुआ। 10-10 रुपए एकत्रित करना शुरू किया। यह राशि जरूरतमंद महिलाओं को देते थे। इसके बाद दूसरे गांव के लोग भी संपर्क करने लगे। ममता ने बताया कि जब दूसरे गांवों में समूह बनाने की बारी आई तो परिवार वालों के ही ताने सुनने पड़े। गांवों में बैठक लेने के लिए जाना पड़ता था। देर रात को आने-जाने के कारण परिवार वाले टोकते थे। इस समूह से जुड़ी महिलाएं अब आर्थिक तंगी से छुटकारा पा चुकी है।

फुलबासन से ली प्रेरणा

आर्थिक तंगी के चलते ममता ने 8 वीं तक पढ़ाई की फिर घर पर ही रहने लगी पर परिवार की स्थिति को देखकर लगा कि अगर दिव्यांगता को मजबूरी बनाकर घर पर बैठी रही तो कुछ नहीं कर पाऊंगी और जीवन भर पछताना पड़ेगा। ममता ने बताया कि एक दिन गांव में पद्मश्री फुलबासन यादव पहुंची थीं, उन्होंने समूह से जुड़ने और आत्मनिर्भर बनने के साथ ही अपने संघर्ष भरे जीवन की कहानी बताई तो यहीं प्रेरित हुई कि मैं भी गांव की महिलाओं के लिए कुछ तो कर सकतीं हूं। अब दूसरी महिलाओं को भी प्रेरित कर रही है।

राजनांदगांव. दिव्यांग ममता ट्राइसिकल से गांवों का दौरा करती हैं ताकि ग्रामीण महिलाओं को जागरूक कर सके।
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