कार्यशाला में वैज्ञानिकों ने कहा: नीम और निर्गुणी के औषधीय गुण सर्वविदित हैं, इसका इस्तेमाल करें

Rajnandgaon News - छत्तीसगढ़ कामधेनु विश्वविद्यालय दुर्ग और नेशनल इनोपेशिप फाउंडेशन द्वारा कल यहां जिला पंचायत के सभाकक्ष में...

Bhaskar News Network

Sep 13, 2019, 07:50 AM IST
Rajnandgaon News - chhattisgarh news scientists in the workshop said the medicinal properties of neem and nirguni are well known use them
छत्तीसगढ़ कामधेनु विश्वविद्यालय दुर्ग और नेशनल इनोपेशिप फाउंडेशन द्वारा कल यहां जिला पंचायत के सभाकक्ष में बाह्य परजीवी की रोकथाम के लिए पारंपरिक ज्ञान और सरल उपाय पर एक दिवसीय कार्यशाला का आयोजन किया गया।

कार्यशाला में कामधेनु विश्वविद्यालय के वाईस चांसलर डॉ. एनपी दक्षिणकर समेत अन्य अधिकारी शामिल हुए। कार्यशाला में बताया गया कि नीम और निर्गुणी के औषधि गुण सर्वविदित है। विभिन्न रोगों की रोकथाम में इसका इस्तेमाल होते आ रहा है। बाह्य परजीवी की रोकथाम का उपाय भी वर्णित है। इसके लिए नीम और निर्गुणी की पत्तियों को सही अनुपात में मिलाना जरूरी है। बाह्य परजीवी पर इसका इस्तेमाल करने से तीन दिन में इसकी समस्या खत्म हो जाती है।

कार्यशाला में बताया गया कि ढाई किलो नीम की पत्ती को 4 लीटर पानी तथा एक किलो निर्गुणी की पत्ती को 2 लीटर पानी में डालक कर अच्छी तरह से उबालना चाहिए। ठंडा होने के लगभग 12 घंटे स्थिर अवस्था में रहने देना चाहिए। अगले दिन सुबह इसके पानी को कपड़े से छानकर अलग कर देना चाहिए। इसमें से 300 मिली लीटर नीम पानी तथा 100 मिली लीटर निर्गुणी पानी को एक साथ मिलाकर अच्छी तरह से हिलाना चाहिए। इस घोल में 3 हजार 600 मिली लीटर ताजा पानी मिलाकर 4 लीटर बना लिया जाना चाहिए। पशुओं के शरीर में जहां पर परजीवी का प्रभाव है वहां इस मिश्रण को स्प्रेयर के जरिए दिन में दो बार 6.6 घंटे के अंतराल में छिड़काव करना चाहिए। अगर स्प्रेयर न हो तो कपड़े को इस मिश्रण में भिगोकर लगाना चाहिए। इस छिड़काव के तुरंत बाद बाह्य परजीवी पशुओं के त्वचा से हटने लगते हैं।

कुछ नव प्रवर्तक या किसान इसके लिए पारंपरिक ज्ञान का सहारा लेते हैं और दवा या मिश्रण बनाकर परजीवी नियंत्रण के उपाय करते हैं। छत्तीसगढ़ के कई क्षेत्रों में बाह्य परजीवी की समस्या बहुत होती है। पशुपालक किसान इससे काफी चिंतित रहते हैं। राष्ट्रीय नव प्रवर्तन प्रतिष्ठान भारत तथा छत्तीसगढ़ कामधेनु विश्वविद्यालय दुर्ग ने इसे एक चुनौती के रूप में लिया है और गांव वालों के साथ मिलकर इसका उपाय ढूंढ निकाला है।

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