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विष पीकर भी अमृत वाणी बोलना चाहिए

6 महीने पहलेलेखक: पं. विजयशंकर मेहता
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प्रतीकात्मक फोटो।
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दुनिया में कुछ पाने के लिए कुछ खोना पड़ता है। यदि सुख चाहते हैं तो दुख भी आएंगे, अमृत चाहेंगे तो विष भी पीना पड़ेगा। जहर पीने का यह मतलब नहीं है कि प्याले में डालकर गटक लें। जीवन में विपरीत परिस्थितियों का आना, संघर्षों से जूझना, कोई आपका अपमान कर दे और फिर भी चुप रहना पड़े तो यह सब जहर पीने जैसा ही है। यह तो तय है कि दुनिया में विष और अमृत एक साथ नहीं रह सकते, लेकिन दो जगह ऐसी हैं जहां ये दोनों साथ रहते हैं। एक मनुष्य की जुबान और दूसरा भगवान शंकर का कंठ। शिवजी नीलकंठ इसलिए कहलाए कि समुद्र मंथन के दौरान उन्होंने जो जहर पीया था, वह गले में अटका लिया था, क्योंकि भीतर उतारते तो उनको नुकसान, बाहर फेंकते तो संसार परेशानी में पड़ जाता। ऐसे ही मनुष्य की जुबान अगर बुरा बोले तो सुनने वाले के लिए जहर और अच्छा बोले तो अमृत है। हमारे पास कंठ भी है, जुबान भी है। तो जब भी इनका उपयोग करें, दोनों बातों का संतुलन रखिएगा। संयम के साथ शब्द वाणी में उतरें और दूसरों को तृप्त करने के साथ-साथ आपको भी संतोष प्रदान करें। दुनिया में कोई भी यह दावा नहीं कर सकता कि उसका जहर से मुकाबला नहीं होगा, पर कम से कम ऐसा तो कर ही सकते हैं, जैसा शिवजी ने किया। शिव कंठ में अमृत रखते हैं और संसार को रामकथा का अमृत दे देते हैं। हमारी भी जुबान और कंठ शिव की तरह हो कि विष तो पी लें, पर दुनिया को अमृत प्रदान कर सकें..। 

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