कॉलम / सिकुड़ते भगवाकरण के साथ फैलता हिंदुत्व

शेखर गुप्ता

शेखर गुप्ता

Dec 03, 2019, 12:55 AM IST

आप ‘आधा भरा या आधा खाली’ की तर्ज पर इंडिया टुडे के उस ग्राफिक को देख सकते हैं, जिसमें उसने देश में भगवा शासन की 2017 और आज की स्थिति को दिखाया है। पहली नजर में इसे देखने पर लगता है कि दो साल में राज्यों में भाजपा का शासन 71% से घटकर 40% ही रह गया है। यह तब है, जब आपको लग रहा होगा कि पार्टी की लोकप्रियता चरम पर है और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में वह बेहद मजबूत स्थिति में है। यद्यपि, यह गिलास के ‘आधा खाली’ होने वाला तर्क है। ‘आधे भरे’ गिलास वाली दलील कहती है कि गत मई के लोकसभा चुनाव के नतीजों के आधार पर एक ऐसा ही ग्राफिक खींचिए। यह क्या दिखाएगा, यह राजनीतिक हकीकत दिखाएगा। उत्तर भारत, अधिकांश तटीय इलाकों तथा पूर्वी और पूर्वोत्तर भारत में भाजपा के सामने कोई चुनौती नहीं है। अगर दोबारा आमचुनाव हों तो भी नतीजे मई 2019 से बहुत अलग नहीं होंगे। तो मोदी के आलोचक किस बात का जश्न मना रहे हैं? 


राजनीतिक हकीकत जटिल व बहुस्तरीय है और इसमें भगवा रंग के भी कई शेड हैं। आइए इन परतों को उघाड़ते हैं- मोदी का व्यक्तित्व अपने आप में बहुत बड़ा है, लेकिन इंदिरा गांधी के समान नहीं है। दूसरी तरह से देखें तो आज का मतदाता इंदिरा युग से अधिक परिपक्व है। लोकसभा और विधानसभा के लिए उसकी पसंद अलग-अलग है। इंदिरा की तरह मोदी भी चाहें तो अपनी पार्टी के टिकट पर एक लैंप पोस्ट तक को जिता सकते हैं, लेकिन केवल लोकसभा में। वह इसे विधानसभा में नहीं दोहरा सकते। लोकसभा चुनाव के पांच महीने के भीतर हरियाणा में भाजपा का मत प्रतिशत करीब 22% गिरा और 58% से घटकर 36% रह गया। पार्टी को बहुमत तक नहीं मिल सका। अब जरा पिछले आंकड़े देखें। हरियाणा, उत्तराखंड, हिमाचल प्रदेश, असम व 2017 में उत्तर प्रदेश को छोड़ दें तो 2014 में स्वीप के बावजूद मोदी को वैसी जीत किसी भी राज्य में नहीं मिल सकी। दिल्ली और उसके बाद पंजाब में उन्हें हार का सामना करना पड़ा। गुजरात में मामला करीबी रहा। कर्नाटक में कांग्रेस के खिलाफ माहौल के बावजूद भाजपा को बहुमत नहीं मिला। मध्य प्रदेश, राजस्थान और छत्तीसगढ़ में भी पार्टी को हार का सामना करना पड़ा। 


अब जरा लोकसभा चुनाव को देखिए, पंजाब के अलावा जिन राज्यों में भाजपा हारी या निर्णायक जीत पाने में नाकाम रही, उन सभी में उसे जबरदस्त जीत मिली। यहां तक कि दिल्ली, राजस्थान, मध्य प्रदेश और छत्तीसगढ़ में भी उसे शानदार जीत मिली। इससे नवीन पटनायक, के. चंद्रशेखर राव व वाई.एस. जगनमोहन रेड्डी जैसे नेताओं का साहस बढ़ता है जो भाजपा के बड़े शत्रु नहीं हैं। इससे केजरीवाल और ममता बनर्जी जैसे भाजपा के प्रतिद्वंद्वियों को भी सुकून मिलता है। इससे जो अन्य क्षेत्रीय नेता प्रसन्न होंगे वे भाजपा के साझीदार हैं। इनमें नीतीश कुमार शीर्ष पर हैं। बिहार में अगले साल चुनाव होने हैं। इस श्रेणी में प्रफुल्ल कुमार महंत और हरियाणा में दुष्यंत चौटाला भी हैं। यहां पर यह दिखाना भी आधा सच है कि देश में 17 राज्यों में भाजपा की सरकार है। इनमें से विशेषकर बिहार और हरियाणा में ऐसे दलों के साथ गठबंधन है, जिनकी विचारधारा एकदम अलग है। मेघालय, नगालैंड और मणिपुर को भाजपा की पहुंच वाले राज्य नहीं माना जा सकता। सिक्किम और मिजोरम राजग के हिस्से हैं, लेकिन भाजपा के नहीं। सच ताे यह है कि भाजपा के पास केवल तीन बड़े राज्य हैं : उत्तर प्रदेश, गुजरात और कर्नाटक। इनमें कर्नाटक अस्थिर है। 


मोदी-शाह के उदय के बाद भाजपा ने यह फॉर्मूला अपनाया कि हिंदी भाषी राज्यों और दो बड़े पश्चिमी प्रदेशों में जीत के साथ कुछ छोटी-मोटी सफलताओं के साथ पूरे भारत पर राज हो सकता है। अगर, इसे राज्यों में नहीं दोहराया जा सकता तो आप संघवाद में फंसेंगे। यानी आपको मुख्यमंत्रियों से बातचीत करनी होगी, कुछ लेन-देन पर सहमति देनी होगी और इस हकीकत के साथ जीना होगा कि विरोधी दलों के शासन वाले राज्यों में पुलिस और कानून व्यवस्था पर उनका राज होगा। कुछ राज्य (ममता बनर्जी की तरह) आयुष्मान भारत जैसी अच्छी योजना तक को लागू करने से मना कर दें। 


महाराष्ट्र में एनसीपी और कांग्रेस शिवेसना के साथ क्यों गए? क्योंकि दोनों दल अस्तित्व और सत्ता की लड़ाई लड़ रहे थे। परंतु शिवसेना क्यों अलग हुई? क्योंकि उसे लग रहा था कि भाजपा के विस्तार के साथ उसकी वैचारिक जमीन खतरे में है। महाराष्ट्र से आ रही आवाजें चिंतित करने वाली हैं। बुलेट ट्रेन का विरोध, मेट्रो के खिलाफ धमकियां। इनमें सबसे बड़ा मुद्दा है एनआरसी। ममता भले ही इसे खारिज करने वाली पहली नेता हों, लेकिन अधिकांश गैर भाजपा शासित राज्य इस विचार को अस्वीकार करेंगे। पूर्वोत्तर के छोटे राज्यों में लोग नागरिकता संशोधन विधेयक के खिलाफ है। ऐसे में देखें तो एनआरसी शुरू होने से पहले ही खत्म हो जाएगा। चुनावी कारणों से यह तीन दशक तक राम मंदिर की ही तरह ध्रुवीकरण करने वाला विचार बना रहेगा। 


आखिर में अगर आपको लग रहा है कि मैं केवल भाजपा की कमियां गिन रहा हूं तो ग्राफ में एक बार पुन: सिमटते भगवा विस्तार को देखिए। यह सीमित चुनावी हकीकत है। वैचारिक तस्वीर को देखिए तो पूरे भारत में आपको ऐसा एक भी मुख्यमंत्री नहीं मिलेगा, जिसने अनुच्छेद 370 हटाने और अयोध्या मामले पर सर्वोच्च न्यायालय के निर्णय की आलोचना करना तो दूर, उसका स्वागत न किया हो। बीते दशकों में भाजपा और आरएसएस के इन पसंदीदा मुद्दों ने भारतीय राजनीति का ध्रुवीकरण किया है। अब कश्मीर और राम मंदिर ही नहीं, बल्कि समान नागरिक संहिता पर भी आम सहमति बनती दिख रही है। यहां तक कि केरल की वाम मोर्चा सरकार भी सबरीमला में सर्वोच्च न्यायालय के आदेश का पालन कराने का साहस न कर सकी। राहुल गांधी भी सार्वजनिक रूप से अपना जनेऊ दिखाते हैं, मंदिर जाते हैं और उच्च ब्राह्मण गोत्र बताते हैं। देश के राजनीतिक रंग अब भाजपा व आरएसएस के भगवा रंग में रंग चुके हैं। भाजपा न सही, आरएसएस अब अपनी जीत की घोषणा कर सकता है। हेडगेवार, गोलवलकर और सावरकर अवश्य इस पर सहमत होते। (ये लेखक के निजी विचार हैं)

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