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समाज में परिवर्तन इतिहास की शक्तियों के अधीन होता है और समाज विज्ञान उसे मानवीय कर्तृत्व की परिधि में समझने-समझाने की कोशिश में लगा रहता है। इसके लिए आज भी जिन मुहावरों का उपयोग किया जाता है, वे उपनिवेश की छाया में गढ़े गए और आधुनिकतावादी यूरो-अमेरिकी समझ को सार्वभौमिक मानते हुए अपनाए गए। इसको उत्कृष्ट जीवन का खाका मानकर लागू किया गया। औपनिवेशिक काल में अंग्रेज ‘आधुनिक’ और भारतीय ‘पिछड़े’ व ‘परंपरावादी’ ठहराए गए। जबकि, तर्क और ज्ञान पश्चिम का जन्मजात अधिकार नहीं था। लेकिन, भारतीय सभ्यता का समस्त संचित ज्ञान अप्रासंगिक हो गया। इस नई दृष्टि में एक यांत्रिक दुनिया की अवधारणा स्वीकार की गई और सृष्टि के विकास में बलशाली को जीने का अधिकार माना गया। इसके परिणामस्वरूप भीषण नरसंहार भी हुए। इस सोच की परिणति समाज को एक उद्योग मानने में हुई और लोभ तथा भोग हावी होते गए। काल क्रम में आधुनिक भारतीय बौद्धिकता का उदय 19वीं सदी के आरम्भ में सांस्कृतिक जागरण, मध्य वर्ग के उदय और साक्षरता की वृद्धि के साथ हुआ। भारत के विभिन्न क्षेत्रों के जननेता जिन्होंने स्वतंत्रता की महत्वाकांक्षा को आगे बढ़ाया, उन्होंने भविष्य के भारत की छवि गढ़ी और गांधीजी के नेतृत्व में स्वतंत्रता आंदोलन द्वारा 1947 में देश को आजाद किया। तब विचार में भी स्वराज की बात उठी थी, परंतु अनसुनी ही रह गई। गणतंत्र की स्थापना के साथ संविधान ने सामाजिक जीवन में ढांचागत बदलाव शुरू किया। सभी नागरिकों को मताधिकार देने के साथ ही बहुत सी पुरानी संस्थाओं को आधिकारिक तौर पर समाप्त कर राज्य द्वारा नियोजित विकास का दौर शुरू हुआ। नेहरू के नेतृत्व में समाजवादी नजरिये को तरजीह मिली। भारी उद्योग लगाने, आधार संरचना का विकास, विज्ञान और प्रौद्यौगिकी की संस्थाओं को बढ़ावा, कृषि और ग्रामीण अर्थव्यवस्था पर बल दिया गया। कुल मिलाकर अविकसित देश के लिए राजमार्ग के रूप में विकास के तर्क और विमर्श ने अधिकार जमाया। हरित क्रांति भी आई और खाद्यान्न उत्पादन बढ़ा, शिक्षा संस्थाओं का विस्तार हुआ और औद्योगिक विकास ने गति पकड़ी। स्वतंत्रता मिलने के बाद दो दशकों तक राज्य और समाज के अध्येताओं के बीच विकास को लेकर सहमति बनी थी। आधुनिकीकरण और प्रगति को समाज के उज्ज्वल भविष्य के द्वार खोलने वाला स्वीकार करते हुए सतत तीव्र परिवर्तन को असंदिग्ध रूप से श्रेयस्कर ठहरा दिया गया। परंतु सत्तर के दशक के बाद विकास के साथ उसके अंतर्विरोध भी प्रकट होने लगे। सांस्कृतिक तनाव भी दिखने लगा। कृषि के क्षेत्र में छोटे किसान समाज के हाशिये पर जाने लगे। उनकी उपेक्षा के चलते जातीय अस्मिता ने नया कलेवर धारण करना शुरू किया। जाति के आधार पर समाज का ध्रुवीकरण शुरू हुआ। गरीबी, स्वास्थ और शिक्षा को लेकर संरचनात्मक सवाल भी खड़े होने लगे। जेंडर और दलित चेतना भी आंदोलित होनी शुरू हुई। धर्म, समुदाय, भाषा और क्षेत्र की अस्मिताएं भी सिर उठाने लगीं। संशय और अविश्वास की खाई को सतही नारों से पाटने की कोशिशें हुईं पर समाज के लिए जरूरी संरचनात्मक बदलाव नहीं आ सका। नब्बे के दशक में उदारीकरण ने अर्थनीति में नया आयाम जोड़ा। सोवियत संघ के टूटने के साथ पूंजीवाद ही राजनीति का एकल आधार बनता गया। सूचना और संचार की प्रौद्योगिकी के विस्तार और विदेशी निवेश के साथ कई ‘सुधार’ भी आने लगे। औद्योगिकीकरण, नगरीकरण और वैश्वीकरण के रिश्ते भी जटिल होने लगे। वैश्वीकरण एक नए किस्म के उपनिवेशीकरण की तरह पांव पसारने लगा और विकास अपना वादा पूरा करता नहीं दिखता। वह गरीबी, विस्थापन, सामाजिक-आर्थिक भेद, कूड़ा उत्पादन, और प्रदूषण आदि के लिए जिम्मेदार ठहराया जा रहा है। आधुनिकता की परियोजना भी वैयक्तिकता, निजीकरण और पूंजीवाद के बल पर जो आभिजात्य को ही स्थापित करती है, सफल होती नहीं दिख रही है। विकल्प के रूप में अब’ टिकाऊ विकास’ के बारे सोचा जा रहा है, जिसमें भविष्य की चिंता भी शामिल है। इसी क्रम में यह भी सोचना होगा कि उत्तर आधुनिक क्या ‘आधुनिक’ से भिन्न है या छद्म रूप में उसका ही विस्तार है? विचारणीय यह भी होगा कि उत्तर उपनिवेशवाद और वि-उपनिवेशीकरण के तर्क हमें कहां ले जाएंगे। आज पर्यावरण के बढ़ते खतरे, अकेलेपन, मानसिक अस्वास्थ्य और बढ़ती हिंसा को देखते हुए सिर्फ मानव केंद्रित सोच अधूरी और खतरनाक लग रही है। चूंकि सांस्कृतिक रचनाशीलता में परंपरा का पुनराविष्कार भी आता है, अत: परंपरागत दृष्टि अधिक प्रासंगिक है। सबमें अपने को देखना और अपने में सबको देखना ही देखना होता है। इसी के आधार पर विविधताभरी दुनिया में साझेदारी वाला भविष्य बन सकता है।
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