सर्खियों से आगे / दुष्कर्म की वारदाताें में लंबी कानूनी जंग, एक और दुष्कर्म

ओम गौड़

ओम गौड़

Dec 03, 2019, 12:55 AM IST

देश में दुष्कर्म की घटनाएं रुक नहीं रही हैं, चिंता इस बात की है कि वारदातें बढ़ रही हैं। हैदराबाद में वेटनरी डॉक्टर के साथ हुई सामूहिक दुष्कर्म की घटना के बाद उसे जिंदा जला दिए जाने जैसा वहशी कृत्य कोई इंसान तो नहीं कर सकता। रूह कंपाने वाली ऐसी घटना को कोई जानवर ही अंजाम दे सकता है। इस तरह की घटनाओं के पीछे एक ही कारण है कि समाज में पुलिस और कानून-व्यवस्था का भय समाप्त हो गया है। दुष्कर्मों की जितनी घटनाएं प्रकाश में आती हैं, उससे ज्यादा छिपी रह जाती हैं या प्रभाव से दबा दी जाती हैं।


सत्ता का वरदहस्त प्राप्त नेता जब दुष्कर्म जैसी वारदातों में फंसते हैं तो पुलिस उन्हें बचाकर लाने के जतन करती नजर आती है। घटना चाहे कठुआ की, उन्नाव की हो या स्वामी चिन्मयानंद की। पुलिस कैसे एफआईआर से छेड़छाड़ कर देती है और पीड़िता के 164 के बयानों में बदलाव हो जाता है? जिस पीड़ित छात्रा ने स्वामी चिन्मयानंद पर आरोप लगाए, उसे दूसरे मामले में गिरफ्तार कर जेल भेज दिया जाता है और स्वामीजी जेल से अस्पताल में शिफ्ट हो जाते हैं। इस तरह दुष्कर्म के आरोपियों को बचाने के प्रयास क्या बलात्कारियों की हौसला अफज़ाई नहीं करते हैं? देश में अब इस बात पर बहस छिड़ी है कि आखिर दुष्कर्म की वारदात में किस बात का सबूत चाहिए? जब पीड़िता ने दुष्कर्मी की शिनाख्त कर ली हो, आरोपी ने अपना गुनाह कबूल लिया हो और जख्म चीख-चीखकर घटना की गवाही दे रहे हों तो फैसलों में लंबा वक्त क्यों लगना चाहिए? क्यों नहीं एक सप्ताह में सजा का ऐलान हो जाए? इतनी उदार कानून-व्यवस्था और इतनी लाचार सुरक्षा व्यवस्था किस काम की? क्या दुष्कर्म की वारदात की लंबी कानूनी जंग एक और दुष्कर्म नहीं है?


हैदराबाद दुष्कर्म के आरोपी सी चैन्नाकेशबुल की मां के बयान में इस हैवानियत का दर्द भी है और दुष्कर्म के खिलाफ एक मां की हुंकार भी है, जिसने कहा कि ‘लटका दो मेरे बेटे को फांसी पर’ या ‘उस लड़की की तरह जिंदा जला दो’, उसे कोई रियायत नहीं मिलनी चाहिए। वह कहती हैं कि ‘हमारी भी एक बेटी है, इस नाते मैं यह समझ सकती हूं कि पीड़िता का परिवार किस तकलीफ से गुजर रहा होगा’। यह दुष्कर्म के आरोपी की मां का बयान मात्र नहीं है, कानून-व्यवस्था को दिया गया एक मां का चैलेंज है, समझ सको तो समझ लो।


इस मां से भी ज्यादा दर्दनाक है सोशल मीडिया पर वायरल लक्ष्मी लोहारन की कहानी। वह लड़कियों को धारदार हथियार बेचती है। केवल लड़कियों को। क्यों? लड़कियों को ही क्यों? धारदार हथियार बेचना तो कानूनी जुर्म है। फिर भी क्यों? इन तमाम सवालों के जवाब में लंबी सांस लेकर लक्ष्मी कहती है- साब मैं छोटी सी बच्ची थी और मेरा ब्याह कर दिया एक शराबी से। उसने मुझे बेच दिया। आज भी मेरी आत्मा सिहर उठती है, जब याद आता है वह खरीदार खूंसट बूढ़ा। कैसे मेरे शरीर को नोच-नोचकर खा रहा था। तब गांवों में तलाक-वलाक तो होते नहीं थे। और अदालत, कानून, पुलिस... ये सब तो जब तक कुछ करते हैं, हमारे शरीर-आत्मा के साथ वे गिद्ध जाने क्या-क्या कर जाते हैं। मैंने इन हथियारों को ही अपना जीवन बना लिया और इन्हें केवल लड़कियों को बेचने लगी। ताकि, जब भी वे मेरी जैसे स्थिति में हों तो अपनी रक्षा खुद कर सकें। मैं कोई दूसरी लक्ष्मी लोहारन पैदा नहीं होने देना चाहती। इस कहानी में छिपा है समाज का दर्द और फैसलों में देरी की पीड़ा।

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