मैनेजमेंट फंडा / बुजुर्गों की देखभाल आशीर्वादों से भरा बिजनेस है!

एन. रघुरामन

एन. रघुरामन

Dec 03, 2019, 01:13 AM IST

अमेरिका में रहने वाले मेरे एक दोस्त ने दो महीने पहले मुंबई में 81 वर्षीय अपनी मां को खो दिया। उनके निधन की खबर पाने वालों में पहला था और इसीलिए अपने सारे बाहरी कामों को रद्द करके उसकी मदद के लिए पहुंच गया। मेरा दोस्त अपने पूरे परिवार के साथ मुंबई पहुंचा और हमने वह सब किया जो शुरू के 13 दिनों तक भारतीय परिवार करते हैं। अपने प्रवास के दौरान उसने यह महसूस किया कि जीवन साथी से 50 साल का साथ छूटने के बाद उसके पिता लगभग बिखर गए हैं और उनका जीवन अस्त-व्यस्त हो गया है। वे भावुक होकर लगातार पत्नी को याद करते रहते और इसी बात ने मेरे दोस्त को बड़ी उलझन में डाल दिया। अब उसके सामने तीन विकल्प थे। पहला- वह अपने पिता को अमेरिका लेकर चला जाए या दूसरा- पत्नी को कुछ समय के लिए भारत छोड़ दे जब तक कि उन्हें कोई मददगार न मिल जाए या फिर तीसरा विकल्प था कि, वह अपनी अमेरिकी नौकरी छोड़ दे और हमेशा के लिए भारत लौट आए।


हालांकि इन तीनों विकल्पों को खारिज कर दिया गया क्योंकि पिता ने 50 वर्षों से उस घर में बसी अपने जीवन साथी की यादों को छोड़कर जाने से साफ मना कर दिया। दोस्त की पत्नी भी स्थायी रूप से भारत में नहीं रह सकती थी क्योंकि उनके दोनों बच्चे अमेरिका में स्कूली पढ़ाई कर रहे थे। और 50 की उम्र के दौर में पहुंचा मेरा दोस्त यह भी सोच रहा था कि उसे इस उम्र में भारत में नौकरी कभी नहीं मिलेगी, जहां उद्यमी उसके वेतन के सिर्फ एक चौथाई पर युवाओं को मौके देते हैं। इसी समय हमने एक चौथा विकल्प देखा - होम हेल्थकेयर कम्यूनिटी- और यह उसके पिता की सम्पूर्ण सेहत का ध्यान रखने के लिए एक उपयुक्त विकल्प था।


मार्केट के इस तरह के नए मौके ने मुझे इसकी फैक्ट फाइल जांचने के लिए और गहराई तक जाने पर प्रेरित किया। लगभग छह करोड़ भारतीय विदेश में रहते हैं। अमेरिका में एच1वीजा की अधिकतम संख्या भारतीयों के लिए जारी की जाती है। दूसरी ओर, वहां जाने वाले मेरे दोस्त जैसे लोगों के परिवारजन भारत में ही रहना पसंद करते हैं। हमारे लगभग 80 से 90% बुजुर्ग अपने दम पर जीवन बिताते हैं, और विदेश में बैठे उनके परिवार के सदस्य यह सुनिश्चित करना चाहते हैं कि उनकी अच्छी देखभाल की जाए।


संयुक्त राष्ट्र की 2019 की रिपोर्ट के अनुसार, 2050 तक भारत की जनसंख्या में 60 वर्ष से अधिक की आबादी वाले वरिष्ठों की हिस्सेदारी 20 प्रतिशत होने वाली है। और वरिष्ठ नागरिकों की देखभाल के लिए एक रिटेल समूह ‘भारतीय उद्योग परिसंघ और सीनियोरिटी', का अनुमान है कि वरिष्ठजनों की शहरी आबादी के लिए जरूरी घरेलू स्वास्थ्य सेवा बाजार लगभग 1,165 करोड़ रुपए का है। भारत में, ऐसा कभी नहीं होता कि माता-पिता और बच्चे एक ही शहर में रहें। जॉब के लिए दूसरे शहरों में बसे बच्चे जब भी वीडियो कॉल पर भी अपने माता-पिता से बात करते हैं, तो वे अपने स्वास्थ्य से संबंधित प्रश्नों को हमेशा टालते नजर आते हैं। इसी वजह से  जब तक कि हालत गंभीर न हो जाए, बच्चों को अपने माता-पिता के बिगड़ते स्वास्थ्य के बारे में कभी पता ही नहीं चलता।


इन बदलते जनसांख्यिकी ने नए बाजार और नई कंपनियों को पनपने का रास्ता दिखाया है जैसे कि कविता और पंकज कोरवार द्वारा स्थापित कम्पनी ‘स्वासमॉस'। इन दोनों के माता-पिता मुंबई और रांची में रहते हैं, जबकि उनका काम विभिन्न शहरों से संचालित होता है। स्वासमॉस आमतौर पर ‘फेलोबोमोमिस्ट' के रूप में सहायता प्रदान करने वाली कम्पनी है जिसमें इनके लोग घर पहुंचकर इन बुजुर्गों  की जांच करते हैं, फिर उसकी रिपोर्ट को अपनी पार्टनर लैब को और फिर अपनी पैनल के डॉक्टरों को भेजते हैं। डॉक्टर एक प्रश्नावली के आधार पर रिपोर्ट की जांच करते हैं जो कि बुजुर्गों की मानसिक, भावनात्मक और सामाजिक रूप से सेहतमंद होने के बारे में बताती है।


इस तरह की कंपनियां न केवल इन बुजुर्गों की आवश्यकता के लिए सभी तत्काल मदद प्रदान करती हैं, बल्कि उनकी शारीरिक गतिविधि, सामाजिक व्यस्तता और विदेश में परिवार को चिकित्सा से जुड़े हर दिन का डेटा प्रदान करती हैं।  ऐसा नहीं है कि इस तरह की सुविधाओं को सिर्फ मेट्रो में रहने वाले परिवार चुन रहे हैं, लखनऊ, पटना, कोयम्बटूर, कोच्चि और मुजफ्फराबाद के लोग भी ऐसी सेवाएं चाहते हैं। चूंकि छोटे भारतीय शहरों के अधिकांश युवा भारत के अन्य राज्यों में या अफ्रीका, रूस और दूर के देशों में नौकरी की तलाश में पहुंचते हैं, और वे हमेशा ही अपने पीछे छूट गए माता-पिता की देखभाल के लिए किसी न किसी मददगार की तलाश में रहते हैं।


फंडा ये है कि, बुजुर्गों की देखभाल करना सिर्फ पैसा कमाने का बिजनेस नहीं है, वास्तव में यदि ठीक ढंग से किया जाए तो यह आशीर्वादों से भरा काम भी है!

COMMENT

आज का राशिफल

पाएं अपना तीनों तरह का राशिफल, रोजाना