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तीन दल-विपरीत विचारधारा और एक सरकार

7 महीने पहलेलेखक: ओम गौड़
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प्रतीकात्मक फोटो।
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महाराष्ट्र में 36 मंत्रियों के चयन में 32 दिन की कसरत एक इशारा यह कर रही है कि विपरीत विचारधारा की तीन पार्टियों का एक साथ चलना इतना भी आसान नहीं है। दूसरी बात यह कि मिलकर फैसले करने की कार्यशैली इस सरकार की परंपरा बन पाई तो ही पांच वर्ष का सफर तय हो पाएगा। राजनीति के जानकारों के सामने महाराष्ट्र को लेकर बड़ी विचित्र स्थिति है। वहीं अजित पवार जिन्होंने महाराष्ट्र के पूर्व मुख्यमंत्री देवेंद्र फडणवीस को एनसीपी के विधायकों के समर्थन की चिट्ठी सौंपकर उप मुख्यमंत्री पद की शपथ ले ली, 80 घंटे में उन पर लगाए गए सारे भ्रष्टाचार के आरोप माफ हो गए। आरोपमुक्त होते ही उन्होंने इस्तीफा दे दिया। आज फिर उप मुख्यमंत्री बन गए हैं। वैसे 36 सदस्यीय इस मंत्रिमंडल में पारिवारिक राजनीति का विस्तार है। पूर्व मुख्यमंत्रियों और कद्दावर नेताओं की दूसरी पीढ़ी को जगह मिली है, खासकर उद्धव ठाकरे मंत्रिमंडल में बेटे आदित्य का मंत्री बनना और आदर्श घाेटाले में इस्तीफा देने वाले मुख्यमंत्री अशाेक चव्हाण को मंत्रिमंडल में जगह मिली है। मंत्रिमंडल में 36 चेहरे हैं। 13-13 शिवसेना-एनसीपी और 10 कांग्रेस विधायकों को जगह मिली है। अब नजर बड़े मंत्रालयों पर है। मंत्रिमंडल में मराठा कम्युनिटी के 20 विधायकों को मंत्री बनाया गया है। खासतौर से प्रदेश के किसान आंदोलन की राजधानी रहे विदर्भ को जगह मिली है। भाजपा ने किसानों के मुद्दों को लेकर आज जिस तरह मंत्रिमंडल विस्तार कार्यक्रम का बहिष्कार किया है, उससे स्पष्ट है कि आने वाले दिनों में प्रदेश में भाजपा और महागठबंधन की इस सरकार में टकराव की स्थिति बनेगी। मंत्रिमंडल विस्तार में जिस तरह एक महीना लगा, अब विभागों के बंटवारे की चुनौती भी कम नहीं है। प्रदेश में एक-दूसरे को अब तक कोसते रहे तीन राजनीतिक दलों के विपरीत दिशा में चलने वाले रास्ते, एक दिशा में कितने दिन साथ चलते हैं? सबसे बड़ा सवाल है कि सरकार अपना कार्यकाल पूरा कर लेगी तो क्या अगला चुनाव एक साथ लड़ेगी? नहीं लड़ेगी तो क्या फिर शिवसेना अपने पुराने एजेंडे हिंदुत्व पर लौट जाएगी और कांग्रेस एनसीपी साम्प्रदायिक सद्भाव की रट लगाते नजर आएंगी? आज पूछने पर ये दोनों दल उद्धव ठाकरे से दोस्ती के तर्क में यह कहते हैं कि हमने शिवसेना की विचारधारा बदली है। महाराष्ट्र में आगे आने वाले निकाय और बीएमसी चुनाव इस गठबंधन की अग्नि परीक्षा की घड़ी होगी। अभी अपने तरह के पहले गठबंधन पर कुछ बोलना जल्दबाजी होगी, हां इस राजनीति की एक दिशा जरूर है जो समय के साथ दिखती जाएगी। महाराष्ट्र में उद्धव पहली बार किसी संवैधानिक, प्रशासनिक जिम्मेदारी के तहत मुख्यमंत्री बने हैं। जबकि कांग्रेस-एनसीपी में शामिल नेता जिन्हें मंत्री बनाया गया है, वे राजनीति के माहिर खिलाड़ी हैं। देखना यह है कि उद्धव इनसे कितनी सलाह लेकर राज्य चलाएंगे। उद्धव के सामने बेटे आदित्य के लिए जगह बनाने की भी जिम्मेदारी है। सरकार कितनी चलेगी, कहां तक जाएगी, यह इस बात पर निर्भर है कि मुख्यमंत्री उद्धव शरद पवार और पृथ्वीराज चव्हाण जैसे नेताओं का कितना सहयोग लेने में कामयाब रहते हैं। वैसे किसी ने कहा है- अब प्रयोग का नाम ही राजनीति है और राजनीति में प्रयोग नहीं है तो वह सिर्फ परंपरा है।

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