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न्यूयॉर्क टाइम्स से:लॉकडाउन से दुनिया में इस साल 26.5 करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हो सकते हैं, लोगों के पास काम और ट्रांसपोर्टेशन न होने से खाने की किल्लत

एक वर्ष पहले
तस्वीर दिल्ली की है। यहां सोशल डिस्टेंसिंग को भूलकर लोग खाने के लिए लाइन में लगे हुए हैं। लॉकडाउन की चलते दिल्ली में बड़ी संख्या में दिहाड़ी मजदूर बेरोजगार हो गए हैं। हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर यहां फंसे हुए हैं। - Dainik Bhaskar
तस्वीर दिल्ली की है। यहां सोशल डिस्टेंसिंग को भूलकर लोग खाने के लिए लाइन में लगे हुए हैं। लॉकडाउन की चलते दिल्ली में बड़ी संख्या में दिहाड़ी मजदूर बेरोजगार हो गए हैं। हजारों की संख्या में प्रवासी मजदूर यहां फंसे हुए हैं।
  • अभी दुनियाभर में 13.5 करोड़ लोग खाने की कमी से जूझ रहे, पर अब 13 करोड़ और इसकी चपेट में आ जाएंगे
  • दिल्ली में लॉकडाउन के बाद फंसे मजदूर कहते हैं कि उनके पास अब भीख मांगने के अलावा कोई चारा नहीं बचा
  • एक्सपर्ट्स कहते हैं- दुनिया में खाने की पर्याप्त व्यवस्था है, पर गरीब देशों के दूसरों पर निर्भरता से परेशानी बढ़ी

आब्दी लतीफ दाहिर. कोरोनावायरस के कारण दुनियाभर के तमाम देशों में लॉकडाउन है। ऐसे में संक्रमण और मौत के बाद सबसे बड़ी परेशानी लोगों को खाने की सामने आ रही है। हालांकि दुनिया इससे पहले भी भूख के संकट से जूझ चुकी है। लेकिन इसका कारण अकाल, मौसम या आर्थिक परेशानी होती रही है। एक्सपर्ट्स के मुताबिक, इस बार दुनियाभर में यह संकट महामारी के कारण है। लॉकडाउन और सोशल डिस्टेंसिंग के कारण करोड़ों लोग काम पर नहीं जा पा रहे। उनकी कमाई पर लगाम लग चुकी है। उन्हें चिंता है कि वे खाना कहां से जुटा पाएंगे। एक अनुमान के मुताबिक, इस साल के अंत तक 26.5 करोड़ लोग भुखमरी का शिकार हो सकते हैं।

यूनाईटेड नेशन एजेंसी के वर्ल्ड फूड प्रोग्राम में चीफ इकोनॉमिस्ट आरिफ हुसैन बताते हैं कि पहले ही दुनिया में 13.5 करोड़ लोग खाने की कमी से जूझ रहे थे, लेकिन 2020 में महामारी के कारण 13 करोड़ लोग और इसकी चपेट में आ जाएंगे। 

खाने की नहीं है कमी
वॉशिंगटन के इंटरनेशनल फूड पॉलिसी रिसर्च इंस्टीट्यूट के डायरेक्टर जनरल जोहान स्विनन के मुताबिक, दुनिया में खाने की कमी या भुखमरी जैसा कुछ नहीं है, लेकिन आने वाले वक्त में ट्रांसपोर्टेशन जैसी समस्याओं के कारण गरीब देश परेशानी में आ जाएंगे। खास तौर पर वो देश जो निर्यात पर निर्भर होते हैं। स्विनन के अनुसार अमीर देशों में खाद्य वितरण और खुदरा बिक्री संगठित और अपने आप चलने वाली होती है। वहीं, विकास कर रहे देशों में सिस्टम श्रम आधारित है। जिसकी वजह से यह सप्लाई चेन कोविड 19 और सोशल डिस्टेंसिग के लिए असुरक्षित हो जाती है। 

तस्वीर किबेरा की है। यह केन्या की राजधानी में स्थित देश का सबसे बड़ा स्लम एरिया है। यहां भुखमरी जैसे हालात हैं।
तस्वीर किबेरा की है। यह केन्या की राजधानी में स्थित देश का सबसे बड़ा स्लम एरिया है। यहां भुखमरी जैसे हालात हैं।

भारत में मजदूरों की हालत बदतर
मार्च में अचानक लॉकडाउन की घोषणा से भारत में हजारों प्रवासी मजदूर जहां थे, वहीं अटक गए थे। देश की राजधानी दिल्ली में यह सभी मजदूर खाने के इंतजार में एक पुल के नीचे रुके हुए हैं। दिल्ली सरकार ने इन सभी को खाना खिलाने के लिए किचन बनाए हैं। लेकिन निहाल सिंह जैसे कई कर्मी भीड़ उमड़ने के कारण भूखे रह जाते हैं। निहाल बताते हैं कि कोरोनावायरस के बजाए भूख हमें मार डालेगी। लॉकडाउन ने हमारी इज्जत को चोट पहुंचाई है। मुझे भीख मांगने में शर्म आती है, लेकिन इसके अलावा और कोई चारा भी नहीं है। 

दिल्ली में जरूरतमंदों को खाना खिलाते लोग। दिल्ली सरकार रोज एक लाख से ज्यादा भूखे लोगों को खाना खिला रही है।
दिल्ली में जरूरतमंदों को खाना खिलाते लोग। दिल्ली सरकार रोज एक लाख से ज्यादा भूखे लोगों को खाना खिला रही है।

कई और देशों में ऐसे हैं हालात
होंडुरास और दक्षिण अफ्रीका से लेकर भारत तक लॉकडाउन से परेशान और भूख को लेकर चिंतित लोग धरने और लूट पर उतर आए हैं। क्लासेज बंद होने से 36.8 करोड़ बच्चों को पोषण आहार नहीं मिल पा रहा है। हालांकि कहीं भी खाने की कीमतें नहीं बढ़ी हैं। लेकिन गरीब वर्ग के लिए खाद्य सुरक्षा की स्थिति दुनिया भर में बिगड़ने की संभावना है। खासतौर से सूडान और जिम्बाब्वे जैसे देशों के लिए जो महामारी से पहले ही खाने के लिए संघर्ष कर रहे थे। या फिर ईरान जैसे देशों के लिए जहां तेल की मदद से खाना और दवा खरीदी जाती है। वेनेजुएला के कारकास में रहने वाले फ्रैडी बास्टार्डो लॉकडाउन के कारण पांच और लोगों के साथ अपनी नौकरी गंवा चुके हैं। फ्रैडी के मुताबिक हम खाना जुटाने के लिए घर की उपयोग में नहीं आने वाली चीजों को बेचने के बारे में सोच रहे हैं। उन्होंने कहा कि मेरे पड़ोसियों के पास भी खाना नहीं है और मुझे चिंता है कि अगर धरना शुरू हो गया तो हम बाहर भी नहीं जा सकेंगे।

पाबंदियों का असर बीमारी से ज्यादा

कोलंबिया के तटीय राज्य ला गुआजिरा के रहवासियों ने भूख दिखाने के लिए सड़कें रोकना शुरू कर दिया है। दक्षिण अफ्रीका में दंगाईयों ने खाना मिलने वाली जगहों को तोड़ दिया है। इसके अलावा रिफ्यूजी या युद्ध क्षेत्रों में रह रहे लोगों के लिए यह दौर ज्यादा परेशानी भरा है। कर्फ्यू और पाबंदियां पहले ही युगांडा और इथियोपिया में विस्थापितों की छोटी आय, साउथ सूडान में बीज, खेती उपकरणों और सेंट्रल अफ्रीकन रिपब्लिक में खाद्य वितरण को खत्म कर रही हैं। इंटरनेशनल रेस्क्यू कमेटी के पूर्व अफ्रीका के उपाध्यक्ष कर्ट जोसेम के मुताबिक पाबंदियों के प्रभाव बीमारी की तुलना में ज्यादा असर कर रहे हैं। 

तस्वीर वेनेजुएला के काराकस शहर की है। यहां मार्च से ही लॉकडाउन है। इससे शहर में भुखमरी जैसे हालात हो गए हैं।
तस्वीर वेनेजुएला के काराकस शहर की है। यहां मार्च से ही लॉकडाउन है। इससे शहर में भुखमरी जैसे हालात हो गए हैं।

कोरोनावायरस से पता चला समाज में कितनी असामनता
कोरोनावायरस ने अमीर और गरीब दोनों को बीमार किया। लेकिन खाने के मामले में हालात अलग हैं। किबेरा के नाइरोबी झुग्गी में खाना पहुंचा रहीं कार्यकर्ता आशा जफर बताती हैं कि कोरोना कुछ भी हो लेकर एक सबकुछ समान करने वाला कारक है। इस वायरस से पता चला है कि दुनिया में कितनी असामनता है।

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