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  • Why People Are Not Showing Enthusiasm Even After Vaccination Starts; 36 Lakh Vaccination To Be Done In 10 Days, Only 19.50 Lakhs

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भास्कर एक्सप्लेनर:वैक्सीनेशन शुरू होने के 10 दिन बाद भी उत्साह कम ही, 36 लाख वैक्सीनेशन होने थे, हुए सिर्फ 19.50 लाख; जानिए क्यों?

3 महीने पहले
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  • 25 जनवरी तक 54.5% लोगों ने ही वैक्सीनेशन सेंटर पर पहुंचकर वैक्सीन लगवाई

भारत सरकार की लाख कोशिशों के बावजूद कोरोना के खिलाफ वैक्सीनेशन अभियान रफ्तार नहीं पकड़ रहा है। साइड इफेक्ट्स का डर और वैक्सीन की इफेक्टिवनेस पर संदेह की वजह से प्रायोरिटी ग्रुप में शामिल डॉक्टर और अन्य हेल्थकेयर वर्कर भी इससे दूरी बना रहे हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि यह कोई नई बात नहीं है। जब भी कोई नई वैक्सीन आती है, उसे लेकर संदेह रहते ही हैं। इससे पहले भी चेचक से लेकर पोलियो तक हर वैक्सीन को शुरुआत में संदेह से ही देखा जा रहा था।

भारत में वैक्सीनेशन का स्टेटस क्या है?
भारत में कोरोना के खिलाफ वैक्सीनेशन 16 जनवरी को शुरू हुआ था। सरकार वैक्सीनेशन सेंटर पर एक दिन को सेशन मानती है। 25 जनवरी तक 35 हजार 785 सेशन हुए और इसमें 19 लाख 50 हजार 188 लोगों को वैक्सीनेट किया गया है। हर सेशन में कम से कम 100 लोगों को वैक्सीन लगाने की योजना थी। इस हिसाब से करीब 36 लाख लोगों को वैक्सीन लग जानी थी, पर उसमें से सिर्फ 54.5% लोग ही वैक्सीन लगवाने सामने आए हैं। यानी प्रायोरिटी ग्रुप के जिन लोगों को वैक्सीनेट किया जाना था, उसमें से प्रत्येक 100 में से 45.5 लोगों ने वैक्सीन नहीं लगवाई है। अगर 25 जनवरी की बात करें तो सिर्फ 47% लोग ही वैक्सीन लगवाने पहुंचे।

कोवीशील्ड वैक्सीन की शीशी के साथ दिक्कत यह है कि उसे खुला नहीं छोड़ सकते। शीशी खोलने के चार घंटे के भीतर उसका इस्तेमाल करना होता है। ऐसे में ज्यादा लोग न आने से वैक्सीन के डोज भी बर्बाद हो रहे हैं। कुछ राज्यों ने तो स्पॉट रजिस्ट्रेशन कर वैक्सीन लगाने का तरीका अपनाया है ताकि वैक्सीन की बर्बादी रुक सके। पर, यह कोई स्थायी हल नहीं हो सकता। खासकर जब अगले चरण में और अधिक लोगों को वैक्सीन लगने वाली है।

हेल्थकेयर वर्कर वैक्सीन लगवाने आगे क्यों नहीं आ रहे?
भारत सरकार ने सबसे पहले एक करोड़ हेल्थकेयर वर्कर्स और दो करोड़ फ्रंटलाइन वर्कर्स को वैक्सीनेट करने की योजना बनाई है। अब हेल्थकेयर वर्कर्स यानी डॉक्टर और मेडिकल से जुड़ा स्टाफ ही वैक्सीन लगवाने से बचता दिख रहा है। यह वैक्सीन सिर्फ एक साल में बनकर तैयार हुई है। इससे इसकी इफेक्टिवनेस और सेफ्टी को संदेह की नजर से देखा जा रहा है। कोवीशील्ड के फेज-3 ट्रायल्स विदेश में हुए हैं और उसकी इफेक्टिवनेस 62 से 90 प्रतिशत के बीच रही है। वहीं, कोवैक्सिन के तो अब तक बड़े स्तर पर होने वाले फेज-3 क्लीनिकल ट्रायल्स भी पूरे नहीं हुए हैं। इस वजह से उसकी इफेक्टिवनेस का कुछ पता ही नहीं है। इस वजह से मेडिकल फील्ड में काम करने वाले भी वैक्सीन से बचते दिख रहे हैं।

वैक्सीन पर संदेह पहली बार सामने नहीं आया है। जब भी कोई वैक्सीन प्रोग्राम आया है, उसे किसी न किसी तरह की अफवाहों का सामना करना पड़ा है। पोलियो वैक्सीन को लेकर अफवाह थी कि यह बच्चों में फर्टिलिटी को प्रभावित करेगी। यह भी अफवाह थी कि ओरल पोलियो वैक्सीन में सूअर की चर्बी का इस्तेमाल किया है। इस पर तो विश्व स्वास्थ्य संगठन को यह सफाई देनी पड़ी थी कि वैक्सीन में सूअर या उससे निकाले किसी पदार्थ का इस्तेमाल नहीं हुआ है। तब जाकर लोगों ने वैक्सीन लगवाने की तैयारी दिखाई। अब भी कई लोग ऐसे हैं जो वैक्सीन पर भरोसा नहीं करते और पश्चिमी देशों में एंटी-वैक्सीन मुहिम चला रहे हैं।

दुनियाभर में अफवाहें हैं कि कुछ वैक्सीन DNA में भी बदलाव कर सकते हैं। खासकर यह बात फाइजर और मॉडर्ना की mRNA तकनीक से बनी वैक्सीन के लिए कही जा रही है। सबसे ज्यादा चिंता की बात यह है कि भारत में डॉक्टर बिरादरी में ही वैक्सीन पर विश्वास नहीं बन पा रहा। वैक्सीन को अप्रूवल मिलने में आमतौर पर 8-9 साल लग जाते हैं। कोरोना वैक्सीन एक साल से भी कम समय में आई है, इस वजह से डॉक्टरों को जल्द आई वैक्सीन पर भरोसा कम है।

लोगों का डर भगाने के लिए क्या किया जाना चाहिए?
पब्लिक हेल्थ एक्सपर्ट डॉ. गजेंद्र सिंह का कहना है कि इस समय वैज्ञानिकों को नोवल कोरोना वायरस से निपटने का कोई पूर्व अनुभव नहीं है। ऐसे में वैज्ञानिक डेटा के साथ आगे बढ़ना ही बेहतर होगा। इफेक्टिवनेस और सेफ्टी के डेटा पर ही लोगों को भरोसा करना होगा। टीके पर राजनीतिक और आर्थिक दबावों का प्रभाव नहीं होना चाहिए। अन्यथा, कोरोना टीके की पेशकश से महामारी के खिलाफ लड़ाई कम प्रभावी रह जाएगी।

कुछ अन्य हेल्थ एक्सपर्ट्स का कहना है कि एकेडमिक्स को ट्रायल्स से सामने आए डेटा देना चाहिए। इससे वे नतीजों को डीकोड करेंगे और पारदर्शिता आएगी। इफेक्टिव सूचना, एजुकेशन और कम्यूनिकेशन स्ट्रैटजी के लिए स्वास्थ्य मंत्रालय काम कर रही है। वैक्सीन को लेकर जागरूकता बढ़ाने डॉक्टरों, फिल्म और क्रिकेट सेलिब्रिटी की मदद लेने की योजना है। देश का राजनीतिक नेतृत्व भी दूसरे चरण में वैक्सीन लगवा रहा है, इससे लोगों में कहीं न कहीं विश्वास तो जागेगा ही।

प्राइवेट सेक्टर क्या भूमिका निभा सकता है?
टाटा स्टील समेत कई बड़ी कंपनियों ने अपने कर्मचारियों के लिए बड़ी मात्रा में वैक्सीन खरीदने की तैयारी की है। वेे सीधे सप्लायर्स से जुड़ रही हैं। टीकाकरण अनिवार्य नहीं हो सकता। इस वजह से इन कंपनियों को भी उसी विरोध का सामना करना पड़ेगा, जो हेल्थकेयर वर्कर्स के बीच दिख रहा है। अमेरिका में जहां प्रकोप अधिक गंभीर है, कई बड़ी कंपनियों ने किसी विशेष वैक्सीन के साथ स्ट्रैटजी बनानी शुरू कर दी है। कई कंपनियों के लिए यह व्यवसाय की निरंतरता का सवाल है, साथ ही स्टाफ को सुरक्षा प्रदान करना उनकी नैतिक जिम्मेदारी भी है।

क्या वैक्सीन लगाना काफी है?
इस पर डॉ. गजेंद्र सिंह का कहना है कि टीका अकेले किसी रोग की रोकथाम या नियंत्रण का समाधान नहीं हो सकता। हमें यह विश्वास करना होगा कि वैक्सीन कोरोना महामारी को नियंत्रित करने के लिए महत्वपूर्ण है। लेकिन, उसके साथ अपना व्यवहार भी ठीक करना चाहिए, जैसे- हाथ धोना, स्वच्छता, शारीरिक दूरी और मास्क लगाना। जब तक सबको वैक्सीन नहीं लग जाती या सबके शरीर में कोरोना के खिलाफ एंटीबॉडी नहीं बनती, तब तक तो मास्क पहनना ही होगा। सोशल डिस्टेंसिंग का पालन करना ही होगा।

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