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पं. विजयशंकर मेहता का कॉलम :जीने की राह: इस दौरान पनडुब्बी की तरह हो जाएं

15 दिन पहले
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पं. विजयशंकर मेहता
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इस समय इंसान के भीतर और बाहर दोनों ही वातावरण में एक अजीब-सा घालमेल हो गया है। महामारी के इस  दौर में हमारी जीवनशैली कैसी हो, इस पर खूब समझाया जा रहा है। कुछ लोग सुनते हैं, उसका पालन भी करते हैं। कोई एक कान से सुनता है, दूसरे से निकाल देता है। हालाकि ऐसा होता भी है या नहीं, यह भी तय नहीं है।

डॉ. हेनरी मोजर कहा करते थे- जब इन्सान मुंह से बोलता है तो वे ही शब्द कानों के माध्यम से बाहर निकलते हैं। अजीब बात है कि इन्सान के शब्द न सिर्फ मुंह से, बल्कि कान से भी निकलते हैं। अब ऐसा ही कुछ बाहर का वातावरण हो गया है। नियम-कायदों की बात तो बहुत की जाती है, पर सारे नियम सामान्य लोगों के लिए हैं। विशिष्ट ने तो रास्ते निकालना शुरू कर दिए हैं। इसलिए आम आदमी को सामान्य बातें समझना चाहिए। इस दौरान पनडुब्बी की तरह हो जाएं, जो पानी में रहती है, पर पानी उसके भीतर नहीं जाता। शास्त्रों में भी कहा गया है- ऐसे समय कछुए की तरह हो जाना चाहिए कि कब पैर बाहर निकालना है और कब अपनी मजबूत खोल में भीतर कर लेना है।

कहा जाता है मनुष्य के भीतर तीन गुण होते हैं- तमोगुण, रजोगुण और सतोगुण। जब, जो गुण हावी हो जाता है, मनुष्य पर वैसा प्रभाव पड़ता है। महामारी, लाचारी और समझदारी। इन्हें यूं समझें कि महामारी तमोगुण है, लाचारी रजोगुण और समझदारी सतोगुण। जब, जो गुण हावी होगा, आप वैसे हो जाएंगे। 

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