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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:परदे के पीछे: दुखद है सोशल मीडिया भड़ास और कुंठा का मंच बना दिया गया है, गोयाकि फायर प्लेस पर पानी पड़ गया है और भीतर ही धुंआ फैल रहा है

15 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

वर्तमान काल खंड का नया कुरुक्षेत्र सोशल मीडिया है। इसमें अपने चाहने वालों की सेना को आगे बढ़कर आक्रमण करने का आदेश फील्ड मार्शल की तरह दिया जाता है। इस सेना के कूच करने पर अफवाह के अंधड़ उठ खड़े होते हैं। इसके द्वारा किए गए विस्फोट से शंका व अफवाह का आणविक विकिरण होता है। नतीजतन मानसिक व्याधियों का जन्म होता है।

यह मनुष्य के भीतर का सांय-सांय करता सूनापन है कि वह अजनबियों से भी बतियाना चाहता है। खामोशी को सहेजना व उसको अपनी ताकत बनाना बेहद कठिन है। ज्ञातव्य है कि बोफोर्स घोटाले के समय अमिताभ बच्चन पर निराधार शंका की गई थी। उन दिनों उन्होंने खामोश रहना ही ठीक समझा। अपने मित्र टीनू आनंद के साथ वे आधी रात को कार में बैठकर इधर-उधर घंटों घूमते थे।

इन यात्राओं के दौरान दोनों एक भी शब्द नहीं बोलते थे। इस तरह खामोशी ऊर्जा में बदली जा रही थी। कहते हैं कि एक शब्द बोलने पर 5 कैलोरी खर्च होती है। सप्ताह में एक दिन मौन व्रत से कितना लाभ हो सकता है। खामोशी के इस अनुष्ठान में अहंकार की आहूति दी जा सकती है। संभवत: इसी खामोशी से जन्मी ऊर्जा से अमिताभ बच्चन ने लंदन कोर्ट से स्वयं को निरपराध साबित किया।

कहते हैं कि बोफोर्स कमीशन से श्रीलंका के लिट्‌टे को सशस्त्र किया गया था। जॉन अब्राहम अभिनीत मद्रास कैफे में इसके संकेत हैं। कभी-कभी फिल्में अलिखित इतिहास का दस्तावेज बन जाती हैं, जैसे ऑलिवर स्टोन की फिल्म जे.एफ.के।

तरह-तरह के फितूर अजब-गजब छलावे रचते हैं। अरसे पहले जबलपुर में एक बाबा अपने भक्तों को अपशब्द कहते थे। सबसे अधिक अपशब्द सुनने वाला स्वयं को धन्य मानता था। भक्तों में गालियां सुनने की प्रतिस्पर्धा होती थी। गौरतलब है कि अपशब्द की संख्या सीमित है और उन्हें दोहराया जाता है।

दुर्भाग्यवश अधिकांश अपशब्द महिला से संबंधित हैं। पिता को लेकर ये नहीं रचे गए, सारा फोकस माता पर रखा गया है। उस बाबा के इर्द-गिर्द कुछ लोग गालियों की गणना करते थे और यह व्यापार बन गया। भक्त गणना का लिखित प्रमाण पत्र पाने को धन देता था।

फिल्म सेंसर बोर्ड फिल्मकार से पात्र द्वारा बोले गए अपशब्द म्यूट करने को कहता है। पात्र के होंठ हिलते हैं परंतु शब्द नहीं निकलते। फिल्मकार मनमोहन देसाई की फिल्म ‘नसीब’ में बहुमंजिला में रहने वाले पात्र बातचीत कर रहे हैं।

सकारात्मक शक्तियों की पात्र दूरबीन से उन्हें देखकर व होठों की हरकत से उनकी बात का आशय निकालती है। यूं खलनायक के षडयंत्र की जानकारी नायक को मिलती है। इस विद्या को लिप रीडिंग कहते हैं। पहले बेतार से संदेश भेजने में कम शब्दों का प्रयोग होता था।

भुगतान प्रति शब्द लिया जाता था। सलीम साहब का कहना है कि पटकथा में संवाद गरीब के टेलीग्राम जैसे कम शब्दों में अधिक कहने की तरह होने चाहिए। संस्कार रहा है कि सोने के पहले व उठने के बाद ईश्वर को धन्यवाद दिया जाता है।

सोशल मीडिया लतियड़ सोने से पहले और उठने के बाद व आधी रात के बाद वॉशरूम जाने के पहले अपना मोबाइल देखता है। इस यंत्र को बिस्तर के निकट रखने की मनाही है। मोबाइल से खेलते-खेलते हम उसका खिलौना हो गए हैं।

चर्चा में बने रहने के लिए भी बहुत कुछ किया जाता है। प्रत्येक व्यक्ति का कोई न कोई दुश्मन होता है। सोशल मीडिया के लाभ हैं परंतु इसका दुरुपयोग भी किया जाता है। कुछ संवैधानिक लोग ट्रोलिंग करके धन कमाते हैं। संकीर्णता इस तरह के व्यवसाय चलाती है और व्यापक बेरोजगारी के इल्जाम संदिग्ध हो जाते हैं।

दुखद है सोशल मीडिया भड़ास और कुंठा का मंच बना दिया गया है, गोयाकि फायर प्लेस पर पानी पड़ गया है और भीतर ही धुंआ फैल रहा है। यह अब उलटा लाइटनिंग कंडक्टर बना दिया गया है। दिलजले का गीत है- शाम है धुआं-धुआं, जिस्म का रुआं-रुआं, उलझी-उलझी सांसों से, बहकी-बहकी धड़कन से, कह रहा है आरजू की दास्तां।

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