जयप्रकाश चौकसे का कॉलम / परदे के पीछे : हम सफर, हमजाद अंतरात्मा का बेताल

जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षकजयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

दैनिक भास्कर

Jun 30, 2020, 07:20 AM IST

पहाड़ों से अधिक पुराना किस्सा है कि राजा विक्रमादित्य को उनकी मां ने आज्ञा दी कि वे ज्ञान अर्जन के लिए यात्रा पर जाएं। इसी तरह ग्रीक कथा में मां के आदेश पर यूलीसिस यात्रा पर गए। यूलीसिस की मां ने स्पष्ट कर दिया था कि अपने द्वारा जीते हुए देशों के आम आदमी के सपने व भय समझने के लिए उन्हें एक आम आदमी की तरह यात्रा करनी चाहिए। शाही तामझाम से आम आदमी सहम जाता है।

कथा है कि महान राजा विक्रमादित्य जब यात्रा में गए तब बेताल उनकी पीठ पर बैठ गया। मार्ग में बेताल राजा को एक कथा सुनाता है। राजा विक्रम को कथा सुनने के बाद कथा में निहित अर्थ की व्याख्या करना है। बेताल के मनमाफिक उत्तर मिलने पर, वह राजा की पीठ से उतरने का वादा करता है, इस तरह सही जवाब ही राजा को यात्रा के इस अतिरेक अनचाहे असबाव से मुक्ति दिला सकता है। विक्रम-बेताल के बीच किस्सागोई की एक बानगी प्रस्तुत है। एक देश में एक सुंदर वेश्या की कोठी थी। 

सेविका धोबी को कपड़े देने आती, तो धोबी उससे पूछता कि वेश्या से अंतरंगता के लिए कितनी स्वर्ण मुद्रा देनी होती है। उसने बचत शुरू की। सेविका को वह बचत का ब्यौरा रोज देता था। सेविका सारी बात वेश्या को बता देती है, उस कोठे के सभी सदस्य धोबी के इरादों और प्रयास का खूब मखौल बनाते थे। कुछ समय बाद धोबी ने बचत करना बंद कर दिया। उसने सेविका को बताया कि अब वह वेश्या से अपने स्वप्न में ही अभिसार करता है। वेश्या ने दरबार में शिकायत दर्ज करके स्वप्न में अभिसार का मुआवजा मांगा। राजा को हतप्रभ देखकर रानी ने फैसला देने का निर्णय किया। दरबार में एक आईना मंगवाया गया, जिसके सामने स्वर्ण मुद्रा रख दी गईं और वेश्या से कहा कि स्वप्न में अभिसार का मेहनताना वह आईने में मुद्रा की छवि के रूप में स्वीकार करे। वेश्या मनमसोस कर रह गई। 

दरबार रानी के चातुर्य पर मुग्ध हो गया। बेताल का प्रश्न था कि रानी ने ऐसा न्याय क्यों किया? दरअसल रानी यह जानती थी कि राजा छुपकर वेश्या से मिलने जाता है और वेश्या के सौंदर्य पर मुग्ध है। इसलिए रानी ने सौत से हिसाब बराबर कर दिया। बेताल राजा की पीठ पर सवारी करता रहा। ज्ञातव्य है इस तरह की काल्पनिक कथाओं का यथार्थ से कोई लेना-देना नहीं है। इसका विक्रमादित्य और सिंहासन बत्तीसी से भी संबंध नहीं है। कथा कहने वालों और सुनने वालों के भारत अनंत में किस्सागोई पहाड़ों से भी पुरानी है। अंग्रेजी के पहले कवि माने जाने वाले चौंसर की ‘पिलग्रिम प्रोग्रेस’ भी ऐसी ही रचना है। यूरोप में महामारी प्लेग के फैलने के कारण कुछ सयाने एक कन्दरा में रहने लगे। प्रतिदिन एक सदस्य को एक कथा सुनानी होती थी। 

इन कथाओं का संकलन डेकोमारान के नाम से विख्यात है। कथाएं यात्रा के कष्ट को कम कर देती हैं। कल्पना और यथार्थ गलबहियां करते हैं। आम आदमी  की रुचि काल्पनिक कथाओं में है। उसने कल्पना को यथार्थ मान लिया है और यथार्थ को कल्पना समझ कर सारी फिक्र धुएं में उड़ाता हुआ चलता है। दरअसल कल्पना को अधिक महत्व देना आम आदमी का रक्षा कवच है। डॉर्विन का विश्वास कि मनुष्य वानर प्रजाति से जन्मा है, कबका अस्वीकृत हो चुका है। हमें दुम के लौट जाने का कोई भय नहीं है।

वर्तमान में आम आदमी की पीठ पर बेताल कोरोना के रूप में बैठा है और सही उत्तर की तलाश में है। संक्रमितों की संख्या निरंतर बढ़ रही है। अमेरिका, ब्राजील और भारत में महामारी व्यापक रूप से फैली है। व्यवस्था हमेशा अपनी पीठ पर अपना सिंहासन लेकर चलने का भरम उत्पन्न करने में सफल हो गई है। रेत में सिर छुपाने से क्या तूफान बिना हानि पहुंचाए गुजर जाता है। हमें तूफान के गुजर जाने 
का गुमां सुविधाजनक लगता है। बेताल हमारा ‘हमसफर, हमजाद और आत्मा है।’ 

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