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बलदेव कृष्ण शर्मा का कॉलम:सुर्खियों से आगे: ऑनलाइन पढ़ाई आपदा में अवसर तलाशने का जरिया लेकिन इससे भविष्य में सामाजिक संकट का भी खतरा

15 दिन पहले
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बलदेव कृष्ण शर्मा, स्टेट एडिटर, दैनिक भास्कर हरियाणा और पंजाब

वैश्विक महामारी में रोजी-रोटी और सेहत के अलावा आम आदमी इस समय सबसे ज्यादा फिक्रमंद है तो वह अपने बच्चों के भविष्य को लेकर। चार महीने से बच्चे स्कूल नहीं जा पा रहे हैं। आने वाले महीनों में भी अनिश्चितता बनी हुई है। अभी दुनिया कोरोना वैक्सीन की खोज में जुटी है। छह महीने के भीतर वैक्सीन को मान्यता मिल भी जाए तो सवा सौ करोड़ से ज्यादा की आबादी वाले हमारे देश में निचले स्तर तक इसकी पहुंच हो पाना सबसे कठिन कार्य है।

इस प्रक्रिया में जितना समय लगेगा, वायरस तब तक किसी न किसी कोने में बना रहेगा। अभिभावकों को जब तक अपने बच्चों की सुरक्षा का यकीन नहीं हो जाता, तब तक वह आसानी से उन्हें बाहर भेजने का जोखिम नहीं लेंगे। ऐसे में ऑनलाइन पढ़ाई एकमात्र विकल्प के तौर पर आजमाई जा रही है।

यह आपदा में अवसर तलाशने का ही एक जरिया है, लेकिन जिस तरह से इसके दुष्परिणाम सामने आने लगे हैं, उससे भविष्य में सामाजिक संकट का भी खतरा है। यह खतरा केवल बच्चों के छोटी उम्र में मोबाइल फ्रेंडली होने, स्क्रीन टाइम बढ़ने या उनकी आंखों पर पड़ने वाले असर का ही नहीं है।

एक खतरा अभिभावकों और बच्चों में सामाजिक व आर्थिक हीनता पैदा होने का भी बढ़ गया है। अनेक राज्यों से खबरें आ रही हैं कि ऑनलाइन पढ़ाई के लिए अभिभावक अपने बच्चों को सस्ते से सस्ता स्मार्ट फोन भी नहीं दिला पा रहे। डेटा की चिंता अलग से है ही। ऐसे अभिभावकों की संख्या भी बहुत ज्यादा है, जो एक से ज्यादा बच्चों के लिए इंतजाम करने में सक्षम नहीं हैं। हिमाचल प्रदेश में एक व्यक्ति को अपने बच्चों के लिए फोन का इंतजाम गाय बेचकर करना पड़ा।

हरियाणा के रोहतक में मजबूर बच्ची लकवाग्रस्त पिता को अकेले छोड़कर सहेली के पास जाकर ऑनलाइन क्लास लेती है। घर में स्मार्टफोन नहीं है। ऐसे अनगिनत उदाहरण हैं, जो बच्चों में अमीरी-गरीबी की खाई को और ज्यादा गहरा कर रहे हैं। शिक्षा पर सबका अधिकार होता है, लेकिन बदली व्यवस्था में इस अधिकार को पाना मोबाइल ने दुष्कर कर दिया है। उन बच्चों के मानसिक विकास पर कितना असर पड़ सकता है, जिनके मन में मोबाइल न होने की कसक है। सरकारी ही नहीं निजी स्कूलों के भी बड़ी संख्या में बच्चे इस विकट परेशानी से गुजर रहे हैं।

जो सरकारें चुनाव के समय स्मार्ट फोन देने के वादे के साथ बनीं, वे भी बच्चों की इस जरूरत की तात्कालिक अहमियत को नहीं समझ पाईं। यदि इस समय बच्चों को स्मार्ट फोन बांटे जाते तो उनका सर्वाधिक उपयोग होता, लेकिन सरकारों की नींव तो सियासत पर टिकी होती है। सियासत तो महामारी में मुख्यमंत्री बदलने में व्यस्त है या फिर चुनाव-उपचुनाव के मुहूर्त के इंतजार में है।

बुधवार को जारी नई शिक्षा नीति में केंद्र सरकार ने तकनीक के इस्तेमाल को जगह दी है और भरोसा दिलाया है कि इसमें उन बच्चों का भी ध्यान रखा जाएगा, जो आर्थिक कारण से पीछे छूट जाते हैं। सरकार सभी बच्चों को साथ लेकर आगे बढ़ने का अपना संकल्प यदि पूरा कर पाती है तो यह कारगर कदम होगा।

मौजूदा परिस्थिति में जो कोई असहाय है, उसकी आखिरी उम्मीद सरकारों से ही है। सरकारें 9वीं से 12वीं के जरूरतमंद बच्चों को तो टैब या मोबाइल उपलब्ध करा ही सकती हैं। निजी कंपनियां भी कॉरपोरेट सोशल रिस्पांसिबिलिटी के रूप में अपना योगदान दे सकती हैं। सरकारों को इस बात को नजरअंदाज नहीं करना चाहिए कि हमारी 90% जनसंख्या के पास जो मोबाइल हैं, उनमें से 40% के पास फीचर फोन हैं। जब हम समृद्ध और आत्मनिर्भर भारत बना रहे हैं तो बच्चों को उसमें शामिल करने से कैसे छोड़ सकते हैं। बच्चे ही तो कल का भविष्य हैं और भविष्य की चिंता तो आज से ही करनी होगी।

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