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लक्ष्मी प्रसाद पंत का कॉलम:सुर्खियों से आगे: क्या राजस्थान इस सियासी ड्रामे को माफ करेगा?

10 महीने पहले
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लक्ष्मी प्रसाद पंत, स्टेट एडिटर, दैनिक भास्कर राजस्थान - Dainik Bhaskar
लक्ष्मी प्रसाद पंत, स्टेट एडिटर, दैनिक भास्कर राजस्थान

शत्रुता, प्रतिस्पर्धा, दूरियां और घृणा नापने का अगर कोई मीटर होता तो मुख्यमंत्री अशोक गहलोत और उप मुख्यमंत्री सचिन पायलट के बीच की सियासी कड़वाहट नापते-नापते अब तक फट चुका होता। दरअसल,दो साल से दोनों के बीच सत्ता के संघर्ष की ककर्षतम आवाजें आज चरम पर हैं। अब यह सवाल उठता है कि क्या यह कांग्रेस के दो पीढ़ी के नेताओं के बीच का संघर्ष है जो अब विद्रोह के रूप में सामने आया है? या सचिन पायलट कांग्रेस में चल रही अस्थिरता और अनिश्चितता से बाहर निकलना चाहते हैं? या फिर वास्तव में कांग्रेस में अब युवा और बदलाव की आवाजेें अनसुनी की जा रही हैं?

इस वक्त कांग्रेस के गहलोत समर्थक विधायक होटल में हैं। हो सकता है जब भी राज्यपाल को संख्याबल दिखाने की जरूरत हो, गहलोत सरकार यह परीक्षा अासानी से पास कर ले। यह बिल्कुल अलग बात है। सवाल यह है कि यह संघर्ष शुरू ही क्यों हुआ? यह सवाल सिर्फ राजस्थान में उठा हो, ऐसा भी नहीं है। मध्यप्रदेश का ज्योतिरादित्य अध्याय अभी बिल्कुल ताजा है। कई और पुराने और नए चेहरे कांग्रेस पार्टी में खुद को गुमशुदा सा मानने लगे हैं। ऐसा नहीं है कि यह पहली बार हो रहा है। शरद पवार, पीए संगमा जैसे दिग्गज कांग्रेसी पार्टी से केवल लीडरशिप का विरोध करने पर ही निकाले गए थे। लेकिन अब बेचैनी का स्तर एकदम अलग है। पहले की कांग्रेस के सामने कोई मजबूत विपक्ष नहीं था। आज भाजपा ऐसी स्थिति में है कि जहां वह सत्ता में है, पूरी ताकत से है। जहां विपक्ष में है, वहां सरकार से भी ताकतवर है। राजनीति जब ऐसे रंग में हो तो कांग्रेस पार्टी के महत्वाकांक्षी और सपने देखने वाले लीडरों की छटपटाहट हम समझ सकते हैं। सचिन पायलट तो सिर्फ एक प्रतीक हैं।

उधर भाजपा एक अलग मोड में है। राजस्थान के इस घमासान में प्रदेश भाजपा ने अपना कोई सरोकार न होने का दावा किया है। लेकिन इस समय भाजपा का स्वभाव और कृत्य ऐसा है कि पूरी संख्या लेकर सदन में आए कांग्रेसी मुख्यमंत्री भी रात को चैन की नींद नहीं सोते होंगे। यह कांग्रेस की बड़ी चिंता है। चिंतित होने का स्तर क्या है? गौर करें। एक महीना पहले राजस्थान में तीन सीटों के लिए हुए राज्यसभा चुनाव हुए। साफ था कि तीन में से दो सीटें कांग्रेस और एक भाजपा जीतेगी। आखिरी मौके पर भाजपा ने बस यूं ही एक और उम्मीदवार को खड़ा कर दिया। लेकिन इतने में कांग्रेस की जमीन ऐसी हिली कि चुनाव से 12 दिन पहले सरकार को अपने विधायकों-मंत्रियों की होटल में बाड़ेबंदी करनी पड़ी। परिणाम वही आया। कांग्रेस-दो, बीजेपी-एक। लेकिन परिणाम से बड़ी कांग्रेस की वह बेचैनी निकली जो विधायकों में तोड़फोड़ के डर से उपजी थी।     

फिर वही होटल, वही बाड़ेबंदी है। कांग्रेस का मौजूदा संकट बाहरी नहीं, अंदरूनी है। संगठन और सरकार में अविश्वास का कोरोना वास कर चुका है। हालांकि मुख्यमंत्री गहलोत नंबरों के बल पर आश्वस्त हैं कि सरकार बचा लेंगे। उनको ऐसी सियासी मैनेजमेंट का लंबा अनुभव है। आखिर वे जादूगर यूं ही नहीं कहलाते। उधर सचिन शांत है। उनका अगला कदम ही तय करेगा कि अब प्रदेश की सियासत का रंग कैसा होगा? लेकिन राजस्थान फिलहाल इस सियासी महाभारत के लिए बिल्कुल तैयार नहीं है। यहां रोज कोरोना संक्रमितों और माैत के रिकार्ड बन रहे हैं। आप ही सोचिए। इस भयानक आपदा के समय होटल में बंद सरकार लोगों को कोरोना से बचाएगी या खुद को भितरघात से? विरोध करना, अपना हक मांगना, राजनीति करना सबका अधिकार है लेकिन इस सियासी ड्रामे के लिए यह सही वक्त कतई नहीं है।

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