विडंबना / बड़ी योजनाएं छोटे लोगों की मदद नहीं कर पातीं

Big plans do not help small people
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Big plans do not help small people

  • उनकी मदद कौन करेगा, जो अकेले हैं, जिनके पास जाने के लिए कोई जगह नहीं है

प्रीतीश नंदी

प्रीतीश नंदी

May 23, 2020, 05:47 AM IST

प्रवासी कौन है? कौन नहीं है? इस सवाल का जवाब शायद कभी न मिले, क्योंकि हजारों पुरुष, महिलाएं और बच्चे उन शहरों से घरों की ओर लौट रहे हैं, जहां वे काम करते थे। उनके लिए घर सैकड़ों किलोमीटर दूर है और ज्यादातर पैदल निकले हैं, कुछ साइकिल पर या लिफ्ट लेकर गए हैं। वे भूख और अभावों से बचने के लिए गांव लौट रहे हैं।

मुंबई लगभग मर चुका है। वे लोग आज जिन्हें हम प्रवासी कह रहे हैं, कल तक निर्माण मजदूर, कुरियर वाले, वेटर, कुक, माली, प्लंबर, इलेक्ट्रिशियन, रेहड़ी वाला, बढ़ई, मैकेनिक के नाम से जाने जाते थे। उनके पास पैसे नहीं बचे हैं। कुछ का पैसा रास्ते में लुट गया। जिन्होंने कहीं पहुंचाने का दावा कर पैसा लिया वे गायब हो गए। कुछ ऐसे हैं जो कंटेनर्स में मर गए, जिन्हें गैर कानूनी ढंग से ले जा रहे थे। कुछ को पुलिस ने पकड़ लिया। कुछ रास्ते में भूख और थकान से मर गए या किसी गाड़ी ने टक्कर मार दी। कुछ के ऊपर ट्रेन चढ़ गई, जो रात में पटरियों पर सो रहे थे।

जिन्होंने ट्रेन का इंतजार किया उनमें से कई भीड़ में दबकर जाने को मजबूर हैं। उन्हें वायरस की चिंता नहीं है, वे यह सोच रहे हैं कि क्या गांव वाले उन्हें गांव में घुसने देंगे? बेदिलों ने जिम्मेदारी ले ली है। उन्होंने पूरे भारत पर कब्जा कर लिया है, शहरों पर, गांवों पर। वे अपनी शक्ति का प्रदर्शन कर उनकी जिंदगी बदतर बना रहे हैं, जो उनसे लड़ नहीं सकते। 

हम महाशक्ति होने का दावा करते हैं। हमें दुनिया का सबसे बड़ा बाजार और ऐसी अर्थव्यस्था होने पर गर्व है, जो अमीर देशों में नाम शुमार करना चाहती है। लेकिन, जब महामारी की बात आती है, हमारे अहंकारी नेता सबसे पहले भागते हैं। आप उन्हें लोगों के बीच नहीं, टीवी पर मास्क लगाए सुरक्षित बैठा हुआ देखते हैं। बस आम नागरिक ही एक-दूसरे की तथा गरीबों की मदद कर रहे हैं और डॉक्टर, स्वास्थ्यकर्मी दूसरों को बचाने के लिए अपनी जिंदगी दांव पर लगा रहे हैं। वे कई दिन घर नहीं जा रहे। कई तो कारों में रह रहे हैं। कुछ हॉस्पिटल में रह रहे हैं, ताकि मृत्यु दर कम रहे। 

कुछ दिन पहले मैंने एक तस्वीर देखी, जिसमें मुझे नहीं पता क्यों पुलिसवाला डॉक्टर को पीट रहा है। मैं जानना भी नहीं चाहता, जानकर मुझे गुस्सा ही आएगा। मैंने पुलिसवालों को रेलवे स्टेशनों पर प्रवासियों को मारते देखा। मैंने सुना कि पुलिसवाले प्रवासियों से राज्यों की सीमाएं पार करवाने के लिए रिश्वत ले रहे हैं, लेकिन मैंने ऐसे पुलिसवाले भी देखे जो कंटेनमेंट क्षेत्रों में, झुग्गी-झोपड़ियों में लोगों को सुरक्षित रखने के लिए दिन-रात काम कर रहे हैं। उनमें कई संक्रमित भी हो गए। यही भारत का चमत्कार है। जहां भी देखें, कोई न कोई अच्छा व्यक्ति मौजूद है और मदद को तैयार है। 

इस बीच, फैक्टरी मालिक लोगों को नौकरी से निकाल रहे हैं। बिल्डर और ठेकेदार दैनिक मजदूरों का बकाया वेतन नहीं दे रहे। जो घर जा रहे हैं, उनमें से ज्यादातर को गांव के सूदखोर से फोन कर 10% प्रतिमाह की दर से पैसा लेना पड़ रहा है, ताकि वे कठिन सफर कर सकें या ट्रेन टिकट ले सकें। ऐसे समय में हमारे टैक्स का इस्तेमाल उन लोगों की मदद के लिए क्यों नहीं कर सकते, जो अपनी मदद खुद नहीं कर सकते? मैं नुक्कड़ों पर भूखे, बेघर, थके और बीमार लोगों को मौत का इंतजार करते देखता हूं। जब मैं उन्हें पैसे देता हूं तो वे रोते हैं।

इस लॉकडाउन में उन्हें पैसों से क्या मिलेगा? उन्हें खाना चाहिए। उनके कपड़े फट चुके हैं, गरिमा तार-तार हो रही है। उन्हें नहीं पता कि वे बीमार हैं या नहीं। उनकी जांच कौन करेगा? कौन उन्हें बड़े प्राइवेट अस्पतालों में आने देगा? सरकारी अस्पताल पहले ही भरे हुए हैं। बचने के लिए संघर्ष कर रहे मरीज के बगल में प्लास्टिक कवरों में बंद मृत शरीर इकट्‌ठे हो रहे हैं।

नहीं, मृत्यु में भी आत्मसम्मान नहीं है। आपके साथ कोई नहीं होता। मृत शरीर को बस निपटा देते हैं। बहुत से लोग छिपे हुए हैं। वे डरे हुए हैं कि क्या होगा अगर वे बीमार हों। हर तरफ भय है। उन लोगों के लिए आत्मा को कमजोर करता अकेलापन भी है, जिनके पास जाने को कोई जगह नहीं है। वे जानते हैं कि ऐसे समय में उनकी मदद करने के लिए कोई नहीं है। उस 20 लाख करोड़ में से एक रुपया भी उन तक नहीं पहुंचेगा। बड़ी योजानाएं, छोटे लोगों की मदद नहीं करतीं। उन्हें बस खाना, आश्रय और दवाएं चाहिए, जब वे बीमार हों। और सबसे ज्यादा जरूरी है नौकरी की सुरक्षा।

जो मुझे मेरे पहले प्रश्न पर वापस लाती है। प्रवासी कौन है? प्रवासी वह है जिसे परिस्थितियों ने घर छोड़ने और काम के लिए कहीं और जाने को मजबूर किया, ताकि वह परिवार पाल सके। जब आप उसे बर्बाद करते हैं, तो आप उसका परिवार बर्बाद करते हैं, उसकी बीवी, उसके बच्चे, उसके बुजुर्ग, बीमार माता-पिता। अगली बार जब आप विकास की, सैटेलाइट्स को अंतरिक्ष में भेजने की, हथियारों की फैक्टरियां, बंदरगाह या हाईवे बनाने की बात करें तो इसे याद रखें। भारत अस्पताल, अनाथालय और वृद्धाश्रम बनाकर ज्यादा बेहतर स्थिति में होगा। इस महामारी ने हमें यह सिखाया है।
(यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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