पाएं अपने शहर की ताज़ा ख़बरें और फ्री ई-पेपर

Install App

एन. रघुरामन का कॉलम:निश्चित तौर पर कोविड ने हमें यह सोचने के लिए प्रेरित किया है कि कई गलत चीज़ों के सही जवाब तकनीक के पास हैं

15 दिन पहले
  • कॉपी लिंक
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

या द करें, कितनी ही बार हम शहर के किसी कोने में कार पार्क करने के दौरान इस चीज़ को भुगत चुके हैं। कोई लड़का हाथ में पर्ची लिए अचानक कहीं से प्रकट हो जाता है, नगर पालिका की पार्किंग स्लिप कहकर पैसे की मांग करता है। अगर आप इसका विरोध करते हैं, तो बिना कुछ कहे वह चला जाता है। पर जब आप वापस आते हैं, तो वह लड़का गायब और आपकी कार में डेंट पड़ा हुआ दिखता है! चूंकि उस लड़के को ढूंढने के लिए हम यहां-वहां नहीं भाग सकते, इसलिए अपने भाग्य को कोसते हुए चुपचाप वहां से चले जाते हैं।

अब कल्पना करें, आप शहर का या नगर निगम का कोई एप डाउनलोड करते हैं और उसकी मदद से नजदीकी पे एंड पार्क सुविधा का पता लगाकर ऑनलाइन स्लॉट बुक करने के साथ ही भुगतान भी ऑनलाइन कर देते हैं। जैसे ही आप उस जगह पहुंचते हैं, एप आपको सही स्लॉट तक पहुंचने के लिए गाइड भी करता है। वहां आपको ना पैसा देना होता है और ना ही पैसे मांगने के लिए कोई सामने आता है! नहीं ये कोई हॉलीवुड फिल्म का दृश्य नहीं है।

अहमदाबाद नगर निगम ने ‘अमदापार्क’ एप लॉन्च किया है, इसी साल अगस्त में इसे 6 फ्लाइओवर के नीचे बनी पे एंड पार्क सुविधाओं के लिए शुरू किया गया है और जल्दी ही बाकी की 113 पार्किंग में शुरू किया जाएगा! हालांकि भारत में यह सुविधा अभी लोग संचालित कर रहे हैं, विदेशों में यह क्यूआर कोड से मैनेज होती है, जिसके बिना कोई भी पार्किंग में नहीं जा सकता, भुगतान के बाद ही कार मालिक को क्यूआर कोड मिलता है।

तकनीक ने एक बार में ही फर्जी पार्किंग में खड़े लड़कों को हटा दिया है, जो अधिकांश शहरों में रैकेट चला रहे हैं। स्मार्ट सिटी प्रोजेक्ट के तहत शुरू इस सुविधा में 70:30 का अनुपात रखा गया है, जहां 30% पार्किंग ऑनलाइन के लिए आरक्षित रखी जाएगी। जैसे ही इसकी स्वीकार्यता बढ़ेगी, इसे अंतरराष्ट्रीय मानकों के हिसाब से होने में समय नहीं लगेगा।

ऑनलाइन शिक्षा का एक और मामला लें, जो इन दिनों काफी लोकप्रिय है। अच्छे शिक्षक आदिवासी इलाकों में नहीं जाते, जहां उनकी ज्यादा जरूरत होती है। पर तकनीक ने एक बार में ही इस अंतर को भर दिया। ‘मालापंड्रम’ जनजाति का उदाहरण लें, केरल में बांस व प्लास्टिक की शीट से बने घरों में रहने वाले इन लोगों के बच्चों के लिए ऑनलाइन क्लास में शामिल होने का सवाल ही नहीं था।

महामारी के कारण कई किलोमीटर चलकर जाने का भी विकल्प उनके पास नहीं था, ऐसे में बाल अधिकारों के क्षेत्र में काम करने वाले एनजीओ ‘राइट्स’ ने एक अस्थायी स्कूल बनाया, जहां इन बच्चों के लिए डिश टीवी व एंटीना लगाया, ताकि स्कूल में पढ़ने का उनका सपना पूरा हो सके। इस पहल से कक्षा पहली से आठवीं के 22 बच्चे लाभान्वित हो रहे हैं।

10 हजार से ज्यादा बच्चों ने एनजीओ का यूट्यूब चैनल सब्सक्राइव किया है, जहां वे लैक्चर अपलोड करते हैं और अब तक 3.2 लाख व्यूज़ आ चुके हैं। चैनल तक उनकी वेबसाइट ‘bhimonlineclassroom.in’ से भी पहुंचा जा सकता है। वे राज्य के सुदूर अंचलों तक पहुंचना चाहते हैं, जहां कक्षाएं बिजली से लेकर शिक्षकों की उपलब्धता जैसे कई कारणों से नहीं हो रहींं। अब मेरा सवाल है कि अनुभवहीन शिक्षकों को ऑनलाइन प्रशिक्षण देने से हमें कौन सी चीज़ रोक रही है, जिससे वे अपने गांव के सबसे अच्छे शिक्षक बन सकें? इसका फायदा यह है कि स्थानीय शिक्षक स्थानीय बोली-भाषा के साथ वहां की आदतों को अच्छी तरह समझते हैं और बेहतर तरीके से शिक्षा दे सकते हैं।

फंडा यह है कि निश्चित तौर पर कोविड ने हमें यह सोचने के लिए प्रेरित किया है कि कई गलत चीज़ों के सही जवाब तकनीक के पास हैं!

आज का राशिफल

मेष
Rashi - मेष|Aries - Dainik Bhaskar
मेष|Aries

पॉजिटिव- अगर आप कुछ समय से स्थान परिवर्तन की योजना बना रहे हैं या किसी प्रॉपर्टी से संबंधित कार्य करने से पहले उस पर दोबारा विचार विमर्श कर लें। आपको अवश्य ही सफलता प्राप्त होगी। संतान की तरफ से भी को...

और पढ़ें