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नजरिया:कोरोना से सिविल सेवाओं की समस्याएं भी सामने आई हैं

4 महीने पहलेलेखक: चेतन भगत
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  • सिविल सेवकों की बदलाव के प्रति अनिच्छा पूरे सिस्टम के लिए घातक साबित हो सकती है

हाल ही में मैंने हल्के-फुल्के अंदाज में गृह मंत्रालय के जटिल सर्कुलरों के बारे में ट्वीट किया- ‘अगर आप गृह मंत्रालय के सर्कुलर समझ सकते हैं, तो कैट या दुनिया की कोई भी प्रवेश परीक्षा के ‘डेटा एनालिसिस और कॉम्प्रिहेंशन’ विषय में पास हो जाएंगे।’ ज्यादातर लोगों को हंसी आई। हालांकि, कुछ को यह पसंद नहीं आया। एक युवा आईएएस अधिकारी ने जवाब दिया, ‘दुनिया में सिविल सेवा परीक्षाएं सबसे कठिन में से एक हैं। धैर्य के साथ आदेशों/सर्कुलरों को आसानी से समझा जा सकता है।’ ठीक है। मुझे अपनी जगह याद दिला दी गई। मैं भूल गया था कि ये आदेश हमसे श्रेष्ठ लोगों ने लिखे थे। इसलिए मुझे आदेश समझ नहीं आया तो इसमें दोष मेरा है। 
यह अकेला उदाहरण ही बताता है कि हमारे कई सिविल सेवकों में श्रेष्ठता का दंभ, अहंकार और बदलने की अनिच्छा का रवैया कितना बढ़ चुका है। वे इतने शानदार हैं तो फिर ब्यूरोक्रेट्स को भारत की समस्या की तरह क्यों देखा जाता है, समाधान की तरह क्यों नहीं? उन्हें भारत में बिजनेस करने में मुश्किल का कारण क्यों माना जाता है? लोग कह रहे हैं कि कोरोना से भारत को फायदा होगा, क्योंकि कंपनियां मैन्यूफैक्चरिंग को चीन से बाहर निकालेंगी। लेकिन ऐसा नहीं होगा। चीन पहले ही वापसी कर चुका है, जबकि भारत नहीं। वहां फैक्टरियां चल रही हैं, यहां नहीं। वैश्विक कंपनियां वहां खुश हैं। वे भारतीय बाबुओं को झेलने की बजाय नई महामारी का जोखिम उठा लेंगी। 
बाबू ऐसे क्यों हैं? इसकी शुरुआत प्रवेश परीक्षा से ही हो जाती है। दो प्रिलिम, नौ मुख्य विषयों के पेपर और फिर इंटरव्यू। सरकारी कर्मचारी बनने की क्षमता जांचने के लिए 11 परीक्षाओं की जरूरत नहीं है। इसमें एक विषय है, ‘एथिक्स, सत्यनिष्ठा और अभिवृत्ति’। इसमें ऐसे प्यारे सवाल हैं- ‘एक सरकारी कर्मचारी से क्या उम्मीद होती है? और ‘विवेक या अंतरात्मा के संकट की व्याख्या कीजिए।’ कोई सोचेगा कि भारत दुनिया में सबसे ईमानदार सेवाएं चलाता है। काश कि केवल उत्तर याद कर ईमानदारी पा सकते। बेशक प्रतियोगी पाठ्यक्रम के इन सवालों पर प्रश्न नहीं उठाते। वे बस अनुकरण करते हैं। दस लाख से ज्यादा आवेदनों पर एक हजार चुने जाते हैं। आधी सीटें आरक्षित होती हैं। पाठ्यक्रम और चयन दर दोनों हास्यास्पद हैं। नौकरी के जरूरी कौशलों की कभी परीक्षा नहीं ली जाती। दिमाग को सुन्न कर देने वाली इस परीक्षा की तैयारी में खर्च किए गए दो वर्ष, प्रतियोगी की रचनात्मकता, आत्मा और उद्यमशीलता सोख लेते हैं। जो इसमें सफल होते हैं वे खुद को इसका हकदार मान लेते हैं, जैसे वे सबसे श्रेष्ठ हैं और अब उन्हें कुछ महान मिलना चाहिए। फिर वे ‘द ग्रेट इंडियन सरकारी सिस्टम’ में प्रवेश करते है। डेस्क पर बैठो, फाइल साइन करते रहो और पदोन्नति होती जाएगी। यह दु:खद है कि इतने सक्षम लोग इस तंत्र में अपना जीवन बर्बाद कर देते हैं, जिसमें पूरी तरह से उनका दोष नहीं है। 
हालांकि, जहां इस तंत्र (और राजनेताओं) में सैकड़ों गड़बड़ हैं, कुछ खामियां तो सिविल सेवा समुदाय में भी है। समुदाय अपने अंदर झांके तो पाएगा कि वह पुराना हो चुका है, बाधा बन रहा है। आसान भाषा का इस्तेमाल और पेज को ज्यादा आधुनिक स्वरूप देना कितना मुश्किल है? आपको ऐसा करने पर पदोन्नति न मिले, लेकिन क्या इसमें काम में संतुष्टि नहीं है, जो चीजों को सुधारकर मिलती है? यह केवल सर्कुलरों के बारे में नहीं है। हर सरकारी प्रक्रिया के बारे में है कि वहां चीजें बेहतर बनाने के लिए उत्साह क्यों नहीं है? सरकारी चीज को बोझिल, अप्रभावी होना जरूरी क्यों है?
बेशक, बदलाव जोखिम के बिना नहीं आता। हाल ही में उत्साही आईआरएस अधिकारियों ने दुस्साहस किया था। उन्होंने संकट के समय में रेवेन्यू बढ़ाने की योजना बनाई थी, जिसके लिए उन्हें काफी आलोचना झेलनी पड़ी। उन लोगों के खिलाफ हुई कार्रवाई कठोर थी (शायद इसलिए भी, क्योंकि दस्तावेज सार्वजनिक करने का तरीका ठीक नहीं था)। हालांकि, उस दस्तावेज में भी समस्याएं थीं, क्योंकि इसके कुछ सुझाव अराजक थे। जबकि दस्तावेज बनाने में पहल नजर आई, लेकिन इसकी विषय वस्तु में पुरानी मानसिकता दिखी। अपना दिमाग खुला रखें। देखें कि बाकी एशियाई अर्थव्यवस्थाएं क्या कर रही हैं? देखें कि अमेरिका के फेडरल और रेवेन्यू विभाग वृद्धि को वापस लाने के लिए क्या कर रहे हैं? कोई भी सिविल सेवकों से अतिरिक्त रचनात्मकता की उम्मीद नहीं कर रहा है। हम बस उन्हें खुले दिमाग से काम करने, अपडेट रहने और चीजों को सुधारने को कह रहे हैं। और हां, कम से कम वे सर्कुलर तो बेहतर कर ही दें। (यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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