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परमार्थ:मजदूरों के पलायन, दान घटने से देश की गौशालाएं संकट में

4 महीने पहलेलेखक: वेदप्रताप वैदिक
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  • काेरोना संकट का समय अहेतुक सेवा का यानी ऐसी सेवा जिसके पीछे कोई हेतु, कोई स्वार्थ, कोई गणित नहीं होता

कोरोना के इस संकट के दौरान मजदूरों और किसानों की दुर्दशा पर तो पूरे देश का ध्यान जा रहा है, लेकिन क्या हमें हमारे पशु-पक्षियों की भी कोई खबर है? टीवी चैनलों और अखबारों में प्रवासी मजदूरों की यंत्रणाएं देखकर हमारे रोंगटे खड़े हो जाते हैं, लेकिन जो पशु-पक्षी हमारी आंखों के सामने घूमते-घामते दिख जाते हैं, क्या हमें उनकी भी कोई परवाह है? उनकी परवाह हम क्यों करें? उनके बारे में कोई नेता एक शब्द भी नहीं बोलता, कोई टीवी चैनल या अखबार उनकी कोई खबर नहीं देता और ये पशु-पक्षी न प्रदर्शन करते हैं, न धरना देते हैं, न गालियां देते हैं, न पत्थर फेंकते हैं। वे तो भूख के मारे हड्डियों के ढांचे भर रह गए हैं। उनकी चाल-ढाल ढीली हो गई है और उनकी आवाज में एक खास तरह का मरियलपन आ गया है।
ज्यों-ज्यों गर्मी बढ़ रही है, पशु-पक्षियों की परेशानी भी बढ़ रही है। अब वे कड़ाके की धूप में बाहर नहीं निकल पाते। भोजन और पानी की तलाश में वे सुबह-शाम बस्तियों के घरों पर चक्कर लगाते रहते हैं। कोरोना संकट के पहले घरों के बाहर पड़ी हुई खाने-पीने की चीजों से उनका पेट भर जाता था। उससे भी ज्यादा जगह-जगह पर बने हुए ढाबों और ठेले वाले हलवाइयों के बचे-खुचे सामान पर वे अपनी मौज मना लेते थे। लेकिन वे अब क्या करें?
पहले सड़कों पर घूमते-फिरते लावारिस पशु रास्ते में उगी घास और छोटे-मोटे पेड़-पौधों से अपना पेट भर लेते थे, लेकिन गर्मी के कारण उनके लिए घास तो सूख ही रही है, उन पशुओं के लिए भी मुसीबत खड़ी हो गई है, जिन्हें कई पारमार्थिक संगठन चला रहे हैं। भारत में ऐसी हजारों गौशालाएं हैं, जिन्हें नागरिक अपने दान से चला रहे हैं। लेकिन, अब उनके मजदूर अपने-अपने गांव चले गए हैं और उनको जो दान मिलता था, वह भी बहुत घट गया है। मथुरा, वृंदावन, हरिद्वार, हरियाणा और मध्य प्रदेश की कई ऐसी गौशालाएं, जिनसे मेरा सीधा संपर्क है, आज बहुत संकट का सामना कर रही हैं। यहां सवाल सिर्फ संगठित गौशालाओं का ही नहीं है, प्रत्येक पशु का है। वह चाहे कुत्ता हो, बिल्ली हो, सूअर हो, बंदर हो या बकरी हो। हमारे देश में एक अनुमान के अनुसार 50 लाख लावारिस गाएं, 3 करोड़ लावारिस कुत्ते, 5 करोड़ बंदर, 2 करोड़ बिल्लियां और करोड़ों की संख्या में पक्षी हैं। जरूरी है कि हम लोग दिल खोलकर उनके लिए दान दें।
मुझे खुशी है कि दिल्ली और हरियाणा की कुछ संस्थाएं इस मामले में बहुत सक्रिय हैं, खास तौर से मेनका गांधी की संस्था! आर्य समाज के कुछ गुरुकुल, कुछ मंदिरों की गौशालाएं, कुछ अग्रवाल, जैन और महाजन संस्थाएं भी पशु रक्षा में कोई कसर नहीं रख रही हैं। लेकिन मैं भारत के करोड़ों नागरिकों से निवेदन करता हूं कि वे इस संकट के मौके पर अपनी प्राचीन परंपरा को याद करें। मुझे याद है कि हमारी मां खाना बनाते ही पहली रोटी गाय के लिए निकालती थी, थोड़ा अनाज पक्षियों के लिए मिट्टी के बर्तन में रख देती थी और बचपन में हम बच्चों की अंगुली पकड़कर इंदौर के जावरा कंपाउंड में बने ‘कीड़ी नगरे’ में ले जाती थी, जहां हम बच्चे चीटियों, मकोड़ों और मक्खियों के लिए आटा डालते थे। पशु-पक्षी गर्मी में प्यासे न मरें, इसलिए एक बड़े तगारे में पानी भरवाकर रख दिया जाता था। क्या इसी उदार भारतीय परंपरा को अपने शहरों और कस्बों में पूरे उत्साह से जीवित रखना हमारे लिए जरूरी नहीं है।
भारत सरकार और हमारी प्रादेशिक सरकारें प्रवासी मजदूरों और किसानों के लिए ऐसे इंतजाम जरूर कर रही हैं कि वे भूखे न मरें, लेकिन पशु-पक्षियों का जिम्मा कौन लेगा? पशु-पक्षी हमारे शुद्ध पर्यावरण के प्रतीक तो हैं ही, वे हमारी तरह ही जीवधारी भी हैं। जो हमारी जरूरतें होती हैं, वे उनकी भी होती हैं। इसलिए हमारे शास्त्रों में उनकी सेवा और रक्षा का पूरा विधान है। यजुर्वेद के पहले मंत्र में ही कहा गया है- ‘यजमानस्य पशून् पाहि।’ ऋग्वेद में भी चार पांववालों (चतुष्पद) और दो पांववालों (द्विपद) की रक्षा की बात कही गई है। पांच महायज्ञों में चौथा यज्ञ बलिवैश्वदेव यज्ञ कहलाता है। महर्षि दयानंद ने इस यज्ञ का विवेचन करते हुए कहा है कि इसका उद्देश्य कुत्तों, कंगालों, रोगियों, कौए आदि पक्षियों और चीटीं आदि कीड़े-मकोड़ों के लिए खाद्यान्न के छह भाग अलग-अलग बांटना और उनकी प्रसन्नता का ध्यान रखना है! इन सबका जिम्मा सरकार नहीं ले सकती। इसका जिम्मा हमें, आपको और सबको लेना होगा।
कोरोना संकट के इन दिनों में वे लोग भी उदासी में घिर गए हैं, जिनके घरों-दफ्तरों में दिनभर भीड़ लगी रहती थी। उनसे मेरा निवेदन है कि दिल को खुश रखने के लिए ध्यान, व्यायाम, संगीत, स्वाध्याय और बागवानी के अलावा मन को शांति और आनंद दिलाने के लिए पशु-पक्षियों की सेवा से बढ़कर कोई उपाय नहीं है। अहेतुक सेवा से बढ़कर कोई सेवा नहीं होती, ऐसी सेवा, जिसके पीछे कोई हेतु, कोई स्वार्थ, कोई गणित नहीं होता।
(यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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