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  • Despite The Adverse Circumstances, The Contribution That Farmers Have Made In The Country Is Similar To The Unpaid Debt.

बलदेव कृष्ण शर्मा का कॉलम:विपरीत परिस्थितियों के बावजूद देश में किसानों ने जो योगदान दिया है, वह चुकाए न जाने वाले कर्ज के समान है

3 दिन पहले
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बलदेव कृष्ण शर्मा, स्टेट एडिटर, दैनिक भास्कर हरियाणा और पंजाब

हरियाणा और पंजाब सहित कई राज्यों के किसान केंद्र सरकार द्वारा लाए गए तीन कृषि अध्यादेशों के खिलाफ आंदोलित हैं। ये वही किसान हैं, जो भीषण संकट में भी देश को भूखा नहीं सोने देते। देश की जीडीपी माइनस में चली जाती है, लेकिन इन किसानों की बदौलत एकमात्र कृषि क्षेत्र उम्मीदों पर खरा उतरता है और 3.4 प्रतिशत की पॉजिटिव ग्रोथ देता है।

लॉकडाउन से घबराए मजदूर जब शहरों से घरों की ओर निकले तो किसान उनके लिए बड़ा सहारा बने और उनको काम दिया। ऐसे में क्या कारण हैं कि सड़कों पर उतरे किसानों को कोरोना से भी ज्यादा बड़ा डर इन अध्यादेशों से लगता है, जो सुधार की दिशा में बताए जा रहे हैं। दरअसल, इस भय के पीछे वे भ्रम हैं, जो सरकारें पैदा करती हैं। एक-दूसरे पर भरोसा तो मानाे अब रह ही नहीं गया है।

आजकल सरकारें कॉरपोरेट की तरह फैसले लेने लगी हैं और कॉरपोरेट की भाषा सीधे-सादे किसानों को समझ नहीं आती। इसी भोलेपन का फायदा कई राजनीतिक पार्टियां उठाने लगती हैं और किसान उनको वोटों की फसल दिखने लगते हैं।

मौजूदा अध्यादेशों को लेकर भी यही बहस है। जो किसान पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही आढ़त की व्यवस्था को ‘बैंक’ समझता हो, जिसे यह लगता हो कि उसे जब भी पैसे की जरूरत पड़ती है, आढ़ती उसकी मदद करता है। तब वह सिर्फ मदद को याद रखता है, भले इसके बदले में वह ब्याज चुकाता है। एक प्रकार से किसान और आढ़ती के बीच सोशल-इकोनॉमिक मैकेनिज्म का रिश्ता बना हुआ है।

किसानों की बड़ी मजबूरी यह भी है कि उसकी जो भी कमाई होती है, वह साल में दो बार ही होती है और उसके खर्चे सालभर के होते हैं। घर में शादी हो या कोई अन्य आयोजन, उसको सबसे पहले यही ‘बैंक’ दिखाई देता है। किसान की आशंका यहीं से शुरू होती है, क्योंकि सरकारों की तरफ से उसे कोई वैकल्पिक मैकेनिज्म नहीं मिलता। ऐसा नहीं है कि उसे डायरेक्ट पेमेंट नहीं चाहिए, लेकिन जरूरत के समय वह अपनी पूर्ति कहां से करेगा, ऐसी कोई बड़ी स्कीम उसके लिए नहीं है।

यही कारण है कि बरसों से चल रहे सिस्टम में बदलाव को स्वीकार करने से पहले उन्हें आशंकाएं घेर लेती हैं और दूरगामी फायदा हो भी रहा हो तो भी उन्हें दिखाई नहीं देता। वह तो सबसे पहले अपनी फसल का सुनिश्चित दाम चाहते हैं। यहां दायित्व सरकार का बनता है कि वह अपनी मंशा स्पष्ट करे और किसानों को समझाए। जब तक सरकार समझाने की सोचती है, तब तक किसानों का सब्र टूट जाता है। वह अज्ञात भय के साथ जीने लगता है।

एक समय ऐसा भी था, जब किसान नेता ही देश चलाया करते थे, तब सरकारें भी उन्हें भरोसे में लेती थीं। बड़ी संख्या में किसान नेता सदन में होते थे। मौजूदा समय में विश्वास की कमी के कारण बेहतरी के लिए उठाए गए कदम भी लड़खड़ाते दिखाई देते हैं।

सरकार को यह समझना होगा कि यह किसानों के लिए जीवन-यापन का मुद्दा है। वह निश्चित ही अपना बाजार बड़ा करना चाहता है। वह बिचौलियों और शोषण से भी मुक्ति चाहता है, लेकिन कोई भी ‘किंतु-परंतु’ उसे रास नहीं आता। जब तक किसानों और सरकारों के बीच संवाद का रिश्ता नहीं बनेगा, तब तक वह आशंकाओं से घिरा रहेगा। आशंकाओं से उपजे आंदोलन में फिर वह न लाठी से डरता है और न कोरोना से।

अन्नदाता का आक्रोशित होना न देश के लिए अच्छा है और न राजनीतिक दलों के लिए। मौजूदा वक्त में तो बिलकुल नहीं। विपरीत परिस्थितियों के बावजूद देश में किसानों ने जो योगदान दिया है, वह चुकाए न जाने वाले कर्ज के समान है। ये बात अलग है कि सरकारें किसानों को कर्ज मुक्त नहीं कर पाईं।

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