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शमिका रवि का कॉलम:टीके को राष्ट्रवाद से मत जोड़िए; इसके डेटा और असर को वैज्ञानिक तौर पर क्रॉस चेक होना चाहिए

2 महीने पहले
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शमिका रवि, प्रधानमंत्री की इकोनॉमिक एडवायजरी काउंसिल की पूर्व सदस्य। - Dainik Bhaskar
शमिका रवि, प्रधानमंत्री की इकोनॉमिक एडवायजरी काउंसिल की पूर्व सदस्य।

एक बार फिर से देश में कोरोनावायरस के सक्रिय मामले लगातार बढ़ने लगे हैं। इस परेशानी का सबसे बड़ा संकट यह है कि यह हमारे हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्चर के लिए ठीक नहीं है। इससे पहले पिछले दो महीनों से देश में कोरोना संक्रमण के एक्टिव केस लगातार घट रहे थे। लेकिन अब जो संकट आया है उसमें अगर एक फीसदी मरीज को भी अस्पतालों में भर्ती करना पड़ा, तो इसका बहुत बड़ा असर हमारे अस्पतालों के इंफ्रास्ट्रक्चर पर पड़ेगा।

आंकड़े बता रहे हैं कि पिछले तीन दिनों से देश में एक्टिव केस बढ़ रहे हैं। रोज कोरोना के नए मामले करीब 45 हजार हैं, लेकिन हमारी रिकवरी यानी मरीजों के ठीक होने की दर घट रही है। इसके अलावा मरीजों का अस्पताल में भर्ती रहने का समय भी बढ़ा है।

हालांकि इसका कोई डेटा हमारे पास नहीं उपलब्ध है, लेकिन अस्पतालों से आ रहे डेटा यह बता रहे हैं कि देश में कोरोना संक्रमित मरीजों का ‘एवरेज लेंथ ऑफ स्टे’ यानी अस्पताल में भर्ती रहने की औसत अवधि बढ़ी है। इसका मतलब यह है कि हमारे हेल्थ इंफ्रास्ट्रक्टर यानी अस्पतालों आदि की क्षमता पर भार बढ़ेगा।

हालांकि अच्छी बात यह है कि आज भी देश में कोरोना रोजाना होने वाली मौतों की औसत संख्या 500 के नीचे ही है। यूरोपीय देशों में भी अभी प्रति 10 लाख जनसंख्या पर, फ्रांस, इटली, यूके, जर्मनी, अमेरिका आदि में कोरोना के नए मामले अभी भी बहुत ज्यादा हैं। साथ ही इन देशों में मौतें भी ज्यादा हो रही हैं।

देश में कोरोना के बढ़ते मामलों की अगर बात करें तो अभी भी ऐसा नहीं कहा जा सकता कि देश में कोरोना की दूसरी लहर आ गई है। हां, कुछ राज्यों में दूसरी लहर जरूरी आई है, लेकिन देश के मामले में अभी ऐसा नहीं है।

अभी दो-तीन दिन से कोरोना के मामले बढ़े हैं, लेकिन अगर देशभर में अगले 14-15 दिनों तक ऐसी ही स्थिति बनी रहती है, तो फिर इसे दूसरी लहर माना जाएगा। अभी दिल्ली के अलावा गुजरात, राजस्थान, हिमाचल प्रदेश आदि राज्यों में तेजी से कोरोना के मामले बढ़ रहे हैं। अब सरकार को इन जगहों पर नई रणनीति के साथ ध्यान देने की जरूरत है।

एक चर्चा इसे लेकर भी है कि अगर मामले बढ़ रहे हैं, तो क्या हमें फिर से लॉकडाउन जैसा कदम उठाने की जरूरत पड़ेगी? हमारा जब पीक, यानी वह स्थिति आई थी, जिसके बाद मामले घटने लगे थे, तब देश में राेजाना 90,000-95000 हजार तक केस आने लगे थे। हमारी इंफ्रास्ट्रक्चर की तैयारी इस हिसाब से थी। इसलिए अब लॉकडाउन की स्थिति नहीं होनी चाहिए।

फिर बात आती है, टेस्टिंग की। टेस्टिंग बढ़ी तो है, लेकिन फिक्र की बात यह भी है कि हमारे रोजाना के टेस्ट में एंटीजन और आरटी-पीसीआर टेस्ट दोनों शामिल होते हैं। शुरुआत में मार्च, अप्रैल और मई में हमें एंटीजन टेस्ट बढ़ाने थे क्योंकि तब हमारी आरटी-पीसीआर टेस्ट की क्षमता इतनी ज्यादा नहीं थी।

अब कोरोना को आए करीब 8 माह हो चुके हैं। अब हमें पता है कि एंटीजन टेस्ट के करीब 40 फीसदी तक रिजल्ट गलत हो सकते हैं, ऐसे में हमें अब आरटी-पीसीआर टेस्ट बढ़ाना चाहिए। टेस्टिंग का प्रोटोकॉल कहता है कि अगर एंटीजन में निगेटिव आ गया तो इसका मतलब यह नहीं है कि आप इसकी आरटी-पीसीआर से जांच न करें।

इसलिए कई जगह अगर प्रोटोकॉल फॉलो नहीं हो रहा है, तो वहां संक्रमण पकड़ में नहीं आ रहे हैं। दरअसल इतनी जल्दी और बड़े पैमाने पर पूरी दुनिया में ही सिर्फ एंटीजन टेस्ट ही होते हैं। इसलिए इन्हें पूरी तरह बंद तो नहीं किया जा सकता है, लेकिन हमें आरटी-पीसीआर टेस्ट के अनुपात को बढ़ाना होगा।

यह तो आईसीएमआर की ही गाइडलाइन है कि आप भले ही एंटीजन टेस्ट करवाइए, लेकिन रिपोर्ट अगर निगेटिव आए तो आरटी-पीसीआर टेस्ट से फॉलोअप जरूर करिए। लेकिन इसपर अभी कई राज्य पूरी तरह से अमल नहीं कर पा रहे हैं। इसलिए उनका एंटीजन का अनुपात बहुत ज्यादा है।

दूसरी तरफ अब देश में वैक्सीन की चर्चा बहुत तेज हो गई है। लेकिन इन्हें बना रही कंपनियां अपने डेवलपमेंट के बारे में प्रेस रिलीज से बता रही हैं। पूरी दुनिया में सबसे पहले वैक्सीन बनाने की होड़ लगी हुई है। सब बता रहे हैं कि सबसे असरदार वैक्सीन हमारी है। दुनियाभर में वैक्सीन राष्ट्रवाद चल रहा है।

लेकिन वैक्सीन के विज्ञान में मनुष्य को डोज देने के बाद भी शरीर को कुछ समय चाहिए होता है। यह कोई मैकेनिकल प्रक्रिया नहीं है। सभी अपनी वैक्सीन (चार बड़े कैंडिडेट) की एफीकेसी (प्रभाव) 90% से ज्यादा बता रहे हैं। बाद में एस्ट्राजेनेका की एफीकेसी बदली। और यह सब प्रेस रिलीज के माध्यम से हो रहा है।

जबकि यह वैश्विक समस्या है। इसलिए डब्ल्यूएचओ और गावी (वैक्सीन अलाएंस) को एक ग्लोबल रेगुलेटरी फ्रेमवर्क के तहत इन वैक्सीन को देखना होगा। हर वैक्सीन का पियर रिव्यू (पूर्व समीक्षा) होना चाहिए। यानी इनके डेटा और असर को वैज्ञानिक तौर पर क्रॉस चेक होना चाहिए। हमारे यहां अभी पियर रिव्यू पर कम बात हो रही है।
(ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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