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एन. रघुरामन का कॉलम:शिक्षा का मतलब निश्चितरूप से ज्ञान पाना है लेकिन इसका वास्तविक उद्देश्य तभी हासिल होगा जब यह दूसरों की समस्या सुलझाए

14 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

जब इटली में कोरोना संकट चरम पर था, तब वहां के एक इंजीनियरिंग स्टार्टअप ने थ्रीडी प्रिंटिंग से रेस्पिरेटर वॉल्व बनाकर कई जानें बचाईं। वहीं भारत के कई शैक्षणिक संस्थानों ने भी थ्रीडी प्रिंटिंग से मेडिकल और हाईजीन उपकरण बनाए, जिसका मतलब है कि उनकी कक्षाएं भले रुकी हों लेकिन व्यावहारिक ज्ञान से सीखना जारी है। बुधवार को कैबिनेट से मंजूरी प्राप्त नई शिक्षा नीति भी यही हासिल करना चाहती है। लंबे समय बाद शिक्षा को एक साधन के रूप में संपूर्णता के स्तर पर देखा जा रहा है, न कि सिर्फ ज्ञान देने वाले केंद्र के रूप में। दिल्ली के द्वारका में नेताजी सुभाष यूनिवर्सिटी ऑफ टेक्नोलॉजी के 18 छात्रों द्वारा चलाए जा रहे प्रोजेक्ट आहार का मामला ही ले लीजिए। इसके तहत पूर्वी दिल्ली के आसपास, यमुना-खादर क्षेत्रों में टिकाऊ कृषि पर ध्यान केंद्रित कर 14 छोटे किसानों की मदद की जा रही है। यह प्रोजेक्ट जून 2018 में शुरू हुए वैश्विक गैर-लाभकारी संस्थान इनेक्टस के संरक्षण में सोशल आंत्रप्रेन्योरशिप प्रोग्राम का हिस्सा है।

भारत की 80% ग्रामीण आबादी की आय का जरिया कृषि होने और इसके जीडीपी में 18% योगदान के बावजूद देश की कृषि अर्थव्यवस्था कई समस्याओं से ग्रसित है। और इस तरह किसान शायद ही कभी गरीबी के चक्र से निकल पाएं। यही कारण है कि कम्प्यूटर इंजीनियरिंग, इंस्ट्रूमेनटेशन और कंट्रोल इंजीनियरिंग समेत इंजीनियरिंग के अन्य क्षेत्रों के छात्र किसानों की समस्याओं का अध्ययन करने साथ आए।

उन्हें अहसास हुआ कि उत्पादक फसल चक्र की कमी किसानों की मुख्य समस्या है। सिंचाई, खाद और कीटनाशकों पर इतने खर्च के बावजूद फसल की गुणवत्ता खराब ही रहती है। इसलिए उन्होंने खेती का पोषण से भरा सीवीपी नाम का तरीका पेश किया। सीवीपी यानी कोको-पीट (नारियल के रेशे), वर्मीक्यूलाइट (एक प्रकार का खनिज जो गर्म करने पर फैलता है) और पर्लाइट (अक्रिस्टलीय वॉल्कैनिक ग्लास जिसमें पानी की मात्रा ज्यादा होती है) का मिश्रण। यह मिट्‌टी वाली पारंपरिक कृषि का विकल्प बनकर उभरा है। सीवीपी से न सिर्फ किसानों को डेढ़ गुना तक पैदावार बढ़ाने में मदद मिली है बल्कि इसमें पारंपरिक मिट्‌टी की तुलना में 5% पानी ही लगता है और कीटों का हमला भी नहीं होता। कृषि उत्पादों को सीधे डाइनिंग टेबल तक पहुंचाने के लिए छात्रों ने आस-पास की कई कॉलोनियों की अनुमति भी ली है।

एक और उदाहरण मलयालम अभिनेता जोजू जॉर्ज का है, जो तब सोशल मीडिया पर ट्रेंड हो गए जब उन्होंने बताया कि वे लॉकडाउन के दौरान पूरी तरह किसान बन गए हैं। उन्होंने अपनी छत पर फैले सब्जी के बगीचे का वीडियो शेयर किया। यह तिरुवनंतपुरम के मनोज एम नायर का पहला प्रोजेक्ट था जो ‘माय काड’ के संस्थापक हैं। ‘माय खाद’ के मुख्य समूह में पांच इंजीनियरिंग ग्रेजुएट हैं, ज्वेल बाबू, विष्णु वीकेटी, विष्णु बाबू, संदीप एमएम और श्रीजीत टी। ये पांचों जब इंजीनियरिंग के अंतिम वर्ष में थे, तब वे मनोज की बेकरी गए थे। यहीं पर मनोज ने ‘माय खाद’ का बिजनेस आइडिया साझा किया और पांचों उसका हिस्सा बन गए। टीम ने इस वेंचर की शुरुआत अपने घरों पर और फिर दोस्तों के घरों पर सब्जियों के बगीचे तैयार कर की। धीरे-धीरे उनके बारे में लोग जानने लगे और आज कई मलयालम एक्टर भी उनसे संपर्क कर रहे हैं।
फंडा यह है कि शिक्षा का मतलब निश्चितरूप से ज्ञान पाना है लेकिन इसका वास्तविक उद्देश्य तभी हासिल होगा जब यह दूसरों की समस्या सुलझाए।


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