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एन. रघुरामन का कॉलम:भले ही सुनने में यह देसी लगे, लेकिन पूर्वजों का आहार और इसे खाने का उनका कारण अपने बच्चों को बताएं

13 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु - Dainik Bhaskar
एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

इ स शुक्रवार भोपाल स्थित लैब ने हरियाणा में 4,37,000 मुर्गे-मुर्गियों की बर्ड फ्लू से मौत की पुष्टि की है। इसलिए केंद्र ने छह राज्यों से इन मौतों पर सतर्क रहने को कहा है, क्योंकि इन राज्यों में बीमारी की पुष्टि हो चुकी है। यहां तक कि अधिकांश राज्यों के अधिकारी हाई अलर्ट पर हैं, वहीं असम जैसे राज्यों ने दूसरे प्रदेश से पोल्ट्री उत्पादों की आवाजाही पर प्रतिबंध लगा दिया है।

हममें से अधिकांश लोग पौधों पर आधारित आहार पर ज्यादा चर्चा कर रहे हैं, जो न केवल पौष्टिक है, बल्कि पर्यावरण पर भी कम से कम प्रभाव छोड़ता है। हमारे पूर्वजों की जीवनशैली बताती है कि जैसे-जैसे जनसंख्या बढ़ती गई, हम क्षेत्र के आधार पर पौधों पर आधारित ‌विभिन्न तरह के आहार का उत्पादन बढ़ाते रहे।

यह उन्होंने तय किया कि किसे क्या खाना चाहिए और इसके पीछे तर्कपूर्ण कारण भी बताए। कृषि से गहरे जुड़े हमारे वैदिक लोगों ने कृषि कार्यों को बहुत महत्व दिया और ऐसे संदर्भ का जिक्र कई श्लोकों में हैं। एक ऋग्वेदिक श्लोक कहता है ‘खेती पर सिद्धि हासिल करके हम फल-फूल सकते हैं, ईश्वर हमें जड़ी-बूटियों के जरिए पोषण प्रदान करे, ईश्वर करे कि हम भूमि पर हल जोत सकें, खुशियों की बौछारों से भूमि पारजन्य (सिंचित) हो...’

वैदिक किसान मृदा उर्वरता बढ़ाने की तकनीक, तैत्तिरीय संहिता जानते थेे, जिसे हम फसल चक्रीकरण कहते हैं। भारतीय बॉटनी के जनक रॉक्सबर्ग ने कहा था ‘बुआई के तरीकों के लिए पश्चिम भारत का ऋणी है।’ वैदिक काल के बाद के दौर ने आजीविका के तीन साधनों को महत्व दिया- कृषि, पशुपालन और वाणिज्य। हालांकि इस समय तक चावल, गेंहू और जौ सबसे सिंचित फसल भोजन रहे।

सुव्यवस्थित सरकारों, इनमें गुप्त काल के दौरान गंगा बेसिन, मालवा, गुजरात और वाकाटक के काठियावाड़, दक्खिन में चालुक्य और दक्षिण में पल्लव पंश ने ‘खिला’ नाम से प्रचलित व्यर्थ भूमि में खेती के महत्व को महसूस किया और कम दामों पर लोगों को इसे खरीदकर फसल उत्पादन की पेशकश की।

धीरे-धीरे हम कई प्रकार के उत्पाद जैसे अदरक, सरसों, इमली, आम, खरबूज, नासपाती, बेर और खुबानी पैदा करने में सक्षम हो गए। उस समय भारत आया चीनी यात्री ह्यून त्सांग देश के अलग-अलग हिस्सों में पैदा होने वाले बागवानी उत्पादों का विस्तृत विवरण देता है।

मध्य युग में लंबी नहरें, हौज बनाने के प्रयास हुए। नहरें तो आज भी उत्तर पश्चिमी भाग व दक्षिण भारत में देखी जा सकती हैं। रोचक है कि सदियों तक भारत बीज बोने की मशीन की मातृभूमि रहा। 1930-31 में इंपीरियल एग्रीकल्चर रिसर्च इंस्टीट्यूट मेें निदेशक रहे बीए कीन का मत था कि भारत में मशीन से बुआई की परंपरा 18वीं सदी से रही है।

हमारे पूर्वजों ने आहार विज्ञान भी विस्तृत भागों में विकसित किया और इसे सात्विक (सब्जी, फल), तामसिक (मिर्च- मांसाहार) और राजसिक (घी, तेल)में बांटा। आज भोजन संरक्षण ने हमारी खाने की आदतें बदली हैं। इन दिनों हम सात्विक, तामसिक या राजसिक की परिभाषा जाने बिना खाना खा रहे हैं। शायद हमें पता होना चाहिए कि हम क्या और क्यों खाते हैं। संभवतः पूर्वजों द्वारा लिखित विज्ञान पर फिर से गौर कर हमें सामने खड़ी समस्याओं का समाधान निकालने में मदद मिले।

फंडा यह है कि भले ही सुनने में यह देसी लगे, लेकिन पूर्वजों का आहार और इसे खाने का उनका कारण अपने बच्चों को बताएं। परिपक्व होते ही जब उन्हें इसका अहसास होगा, तो वे आपको धन्यवाद देंगे।

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