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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:हर व्यक्ति को स्वयं को जान लेने का प्रयास करते रहना चाहिए, अपने मुखौटों से मुक्त होना चाहिए

11 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक।

पंडित जवाहरलाल नेहरू द्वारा स्थापित पूना फिल्म संस्थान के स्वर्ण-काल में प्रशिक्षित विधु विनोद चोपड़ा और सुधीर मिश्रा समकालीन फ़िल्मकार रहे हैं। सुधीर मिश्रा की ‘हजारों ख्वाहिशें ऐसी’ नामक फिल्म सराही गई थी। उनकी मित्र और फिल्म संपादक रेणु सलूजा काम में निपुण रहीं।

विधु विनोद चोपड़ा के साथ उनका विवाह हुआ था और तलाक के बाद सुधीर मिश्रा ने उन्हीं से विवाह किया था। कैंसर ने उनके प्राण ले लिए तो उनकी चिता को दोनों ने मुखाग्नि दी थी। उनका अपना कोई परिजन नहीं था।

बहरहाल सुधीर की फिल्म ‘सीरियस मैन’ चर्चित फिल्म है। मोज़ार्ट ने 8 वर्ष की उम्र में एक सिम्फनी की रचना की थी। उन्हें चाइल्ड प्रोडिजि माना गया, अर्थात ऐसा बालक जिसमें मौलिक और कालजई रचना की है। सुधीर मिश्रा की फिल्म में एक महत्वाकांक्षी पिता अपने 8 वर्ष के बेटे को चाइल्ड प्रोडिजि की छवि देना चाहता है जबकि बालक ने कोई मौलिक रचना नहीं रची है।

अक्षत दास ने बालक की भूमिका अभिनीत की है। प्रारंभ का गीत है, ‘रात है काला छाता, इसमें कितने सारे छेद’ पिता पुत्र की यात्रा में सुधीर मिश्रा ने वर्तमान सामाजिक और राजनीतिक हालात का भी वर्णन किया है। फिल्म में हमारी जाति -प्रथा और उसकी बेड़ियों को भी समाहित किया गया है। पिता गरीब है और जाति के ढांचे से निचले पायदान पर जन्मा है।

वह अपने बालक की सहायता से अपने जन्म और जाति की सतह से ऊपर उठना चाहता है। उसके द्वारा रचित नाटक को प्रारंभ में सफलता मिलती है परंतु एक दिन सत्य उजागर होता है कि बालक प्रतिभाहीन है। प्रतिभा रोपित नहीं की जा सकती परंतु वह जन्म से होती है, यह बात गले नहीं उतरती।

मोज़ार्ट एक अपवाद था। हमारे समाज में सफलता को जीवन मूल्य की तरह स्थापित किया है। फिल्म में वर्तमान की जुगाड़ राजनीति पर करारा व्यंग्य है। सुधीर मिश्रा ने टेलीविजन पर मिथ्या समाचार देने का भी खुलासा फिल्म में किया है। खबर कांड अभी खुला है लेकिन सुधीर की फिल्म पहले बनी है। सुधीर फिल्म द्वारा यह संदेश देते हैं कि हर व्यक्ति को स्वयं को जान लेने का प्रयास करते रहना चाहिए। अपने मुखौटों से मुक्त होना चाहिए।

नवाजुद्दीन सिद्दीकी ने पिता की भूमिका अभिनीत की है। इस तरह की फिल्म को ऑस्कर प्रतियोगिता में भेजा जाना चाहिए। इस फिल्म ने सुधीर को अपने फ़िल्मकार होने की सार्थकता प्रदान की है। लगता है कि उनकी हजारों ख्वाहिशें पूरी हो गईं। सत्यजीत रे की एक लघु फिल्म में अमीर घर का बालक अपने स्वचालित खिलौने खिड़की में लेकर खड़ा होता है।

माली का बेटा अपनी पतंग, कंचे और गिल्ली-डंडा उसे दिखाता है। बालकों की इस प्रतियोगिता में गरीब बालक विजयी होता है। अमीर व्यक्ति ने अपने बालक को सुरक्षा की खातिर घर में ही रखा। व्यस्त माता-पिता के पास बच्चे के लिए समय नहीं था। प्रतियोगिता में हारा हुआ अमीर बालक अपने सारे स्वचालित खिलौनों को चालू करके उनके बीच बैठ जाता है।

खिलौने उसके गिर्द नाच रहे हैं और माता-पिता के स्नेह से वंचित बच्चा रोने लगता है। एक कथा का सार यह है कि रेस खेलने का लतियड़ पिता अपने बालक को लकड़ी के रॉकिंग हॉर्स पर खेलता देखता है। बालक के मुंह से एक नंबर निकलता है। इसी नंबर के घोड़े पर दांव लगाकर पिता धन कमाता है।

यह सिलसिला जारी रहता है। बच्चा बार-बार रॉकिंग हार्स खेलने से तंग आ गया है। पिता उसे इस घुड़सवारी के लिए बाध्य करता है। अपनी इच्छा के विपरीत यह घुड़सवारी बच्चे को थका देती है और एक दिन वह रॉकिंग हॉर्स से गिरकर मर जाता है। स्मरण आता है कि शेखर कपूर की ‘मासूम’ में बच्चा रॉकिंग हार्स से खेलता है। गीत है ‘लकड़ी की काठी, काठी पे घोड़ा, घोड़े की दुम पे जो मारा हथौड़ा, दौड़ा दौड़ा, दौड़ा, घोड़ा दुम उठा के दौड़ा’।

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