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जयप्रकाश चौकसे:फिल्में हमेशा समाज के दस्तावेज की तरह रही हैं, इतिहास अध्ययन में ‘बाकी इतिहास’ शामिल रहता है

13 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

सा माजिक समस्याओं और परिवर्तन पर फिल्में बनती रही हैं। स्वतंत्रता के लिए संघर्ष के दिनों ब्रिटिश सेंसरशिप से बचने के लिए माइथोलॉजिकल फिल्में बनाई गईं परंतु उनमें स्वतंत्रता संग्राम के संकेत चतुराई से गूंथे गए। सन् 1918 में प्रदर्शित महाभारत के प्रसंग से प्रेरित फिल्म में विधुर का पात्र गांधी जी जैसा प्रस्तुत किया गया। वह चश्मा भी पहनता है।

यह फिल्म द्वारका दास संपत ने बनाई थी। एक फिल्म में संदेश दिया कि वह शिक्षा प्रणाली मृत समान है जो दिन-प्रतिदिन की समस्याओं के निदान के तरीके नहीं सिखाएं और आदर्श जीवन मूल्यों के प्रति उदासीन हो। सच तो यह है कि वर्तमान समय में भी शिक्षा बेहतर मनुष्य नहीं बना रही है। शिक्षा संस्थान से पैसे बनाने वाली मशीन में निकल रही है। राजकुमार हीरानी की फिल्म ‘थ्री ईडियट्स’ संदेश देती है कि गुणवत्ता प्राप्त करो तो सफलता आपके पीछे भागेगी।

राजनीतिक स्वतंत्रता मिलने के पश्चात भी सामाजिक सोद्देश्यता की फिल्में बनाई गईं। मेहबूब खान ने 1939 में बनाई ‘औरत’ को 1956 में ‘मदर इंडिया’ के नाम से बनाया। बिमल रॉय की बलराज साहनी अभिनीत ‘दो बीघा जमीन’ भी किसान समस्या प्रेरित फिल्म है। सन् 2001 में प्रदर्शित आमिर खान की आशुतोष गोवारिकर की ‘लगान’ भी किसान जीवन से प्रेरित फिल्म है।

विचारणीय है कि वर्तमान में चल रहे किसान आंदोलन पर फिल्म बनाना और संसद से प्रमाण पत्र लेना असंभव लगता है। अष्टपद की गिरफ्त बड़ी व्यापक और मजबूत है। किसान संघर्ष और व्यथा गाथा पर किसी नागरिक की आंख नम नहीं हुई है। आंसुओं पर किसने कब्जा किया हुआ है? याद आते हैं मध्य प्रदेश के बड़नगर में जन्मे कवि प्रदीप की पंक्ति ‘जरा आंख में भर लो पानी’

कोरोना महामारी के कारण शूटिंग नहीं की जा रही है। जहां सिनेमाघर खोलने की इजाजत मिली, वहां बमुश्किल एक दर्जन दर्शक भी नहीं आए। वेब सीरीज बनाई जा रही हैं। केवल न्यूजीलैंड में शूटिंग की जा रही है। व्यवस्थाएं प्रयास कर रही हैं कि वेब पर प्रदर्शित फिल्में भी सेंसर की जाएं। सक्रिय फिल्मकार न्यूजीलैंड में शूटिंग करके वहीं से फिल्में वेब के लिए भेज देंगे। बंदिशें जितनी बढ़ती हैं उतने रास्ते भी खोज लिए जाते हैं। अंधेरे बढ़ाने के बाद भी अनारकली की आरजुएं बढ़ती जाती हैं।

मोबाइल पर बनाई गई फिल्में भी वायरल की जाती हैं। इनके भी अंतरराष्ट्रीय उत्सव आयोजित होते हैं। चुनाव जीते हुए लोग विधानसभा में अपने मोबाइल पर अश्लील फिल्में देखते हुए पाए गए हैं। स्मिता पाटिल अभिनीत फिल्म के संवाद का आशय यह था कि सारा खेल कमर के ऊपर और नीचे चंद इंच के फैसले पर केंद्रित है। एक ओर भूख है, दूसरी ओर इच्छाएं हैं। दोनों ही इतिहास के दो नाम है। एक बुझाए नहीं बुझती तो दूजी सुलाए हुए नहीं सोती।

गुलामी के दौर में अंग्रेजों ने कुछ शिक्षा संस्थानों का निर्माण किया था, जहां केवल राजा महाराजाओं की संतान शिक्षा पाने की हकदार थीं। अंग्रेजों के अपने भारत में जन्में बालकों की शिक्षा के लिए ही इन संस्थाओं का निर्माण हुआ था। देहरादून का दून स्कूल, उटकमंड का लव डेल स्कूल और इंदौर का द डेली कॉलेज भी उसी श्रृंखला का हिस्सा था। इंदौर के जिस द डेली कॉलेज परिसर में आम आदमी का प्रवेश प्रतिबंधित था, उस कॉलेज के परिसर में मरे हुए कव्वे पाए गए। जब हालात सामान्य होंगे तब पूरे परिसर पर कीटनाशक दवा का छिड़काव किया जाएगा।

महामारी के संकट के जाने के बाद वैश्विक आर्थिक मंदी का दौर प्रारंभ होगा। कहते हैं कि हर 90 वर्ष पश्चात वैश्विक आर्थिक मंदी का दौर आता है। आर्थिक मंदी का दौर सन 1929 से प्रारंभ हुआ था। 21वीं सदी का दौर और अधिक भयावह हो सकता है। अपने को अपराजेय मानने वाला चीन भी उस दौर से बच नहीं पाएगा। चीन के आवाम में असंतोष लंबे समय से धीमे-धीमे सुलग रहा है। चीन में रोटी, कपड़ा और मकान सबको उपलब्ध है, परंतु मनुष्य अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता चाहता है।

मौज-मस्ती की इजाजत चाहता है। मस्ती मंत्र की अनुगूंज मध्यम में सुनाई पड़ रही है। 19वीं सदी के मंदी के दौर के समय भी कुछ अमीरों के जलसाघर में रक्स जारी रहा है, जिस पर एक फिल्म भी बनी थी। फिल्में हमेशा समाज के दस्तावेज की तरह रही हैं। इतिहास अध्ययन में ‘बाकी इतिहास’ शामिल रहता है।

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