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परदे के पीछे:‘...गालिब लोग कहते हैं कि बहार आई है’

4 महीने पहलेलेखक: जयप्रकाश चौकसे
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लॉ कडाउन में शूटिंग की इजाजत नहीं है। अत: प्राइवेट चैनल पुराने कार्यक्रम प्रसारित कर रहे हैं। दूरदर्शन भी पुराने कार्यक्रम प्रसारित कर रहा है। अंतर यह है कि प्राइवेट टेलीविजन के कार्यक्रम नीरस हैं और दोहराव के कारण असहनीय बन जाते हैं। मंडी हाउस स्थित दूरदर्शन के पुराने कार्यक्रमों में ऐसे जीवन मूल्य हैं कि समय का उन पर कोई असर नहीं पड़ा है। दूरदर्शन द्वारा प्रसारित मनोहर श्याम जोशी के ‘हम लोग’ और ‘बुनियाद’ आज भी देखने योग्य हैं। शरद जोशी का लिखा और कुंदन शाह का निर्देशित ‘यह जो है जिंदगी’ आज भी दर्शकों को गुदगुदाता है। इसके कलाकार सतीश शाह, शफी इनामदार और स्वरूप संपत आम जिंदगी से लिए पात्र अभिनीत कर रहे हैं। सबसे अधिक विविध भूमिकाएं सतीश शाह ने की हैं। शरद जोशी के संवाद इस कार्यक्रम की सबसे बड़ी ताकत हैं। पंकज कपूर अभिनीत कार्यक्रम ‘ऑफिस ऑफिस’ हमारे सरकारी दफ्तरों की लाल फीताशाही, कामचोरी और निर्णय टालने की नितांत मौलिक भारतीय नीति का पर्दाफाश करता है। एक पात्र पेंशन पाने के लिए अपने पहचान-पत्र का अनुमोदन करने आता है और दफ्तर वाले उसे अजन्मा साबित कर देते हैं। आज भी पेंशन पाने वालों को समय-समय पर यह सिद्ध करना होता है कि वे जीवित हैं। ज्ञातव्य है कि मंडी नामक छोटी रियासत के राजा जोगिंदर बहादुर सिंह ने मंडी हाउस का निर्माण किया था। 15 सितंबर 1959 को दूरदर्शन का दफ्तर खोला गया और वह आकाशवाणी का हिस्सा था। सन् 1976 में दूरदर्शन को स्वतंत्र विभाग बनाया गया था। सन् 1982 में प्रसारण को रंगीन बनाया गया। वह अवसर एशिया के टूर्नामेंट का था। इसी दौर में दूरदर्शन अत्यंत लोकप्रिय हुआ। प्राइवेट चैनल के आते ही कार्यक्रमों में लिजलिजाहट का प्रवेश हुआ। सतही भावुकता की गाढ़ी चाशनी में प्रेम की तितली के पंख उलझ गए। गुलशन नंदाई अति भावुकता के दौर में तर्क विस्थापित कर दिया गया। संभवत: इसी दौर से उस तर्कहीनता का सिलसिला प्रारंभ हुआ, जिसका शिखर दशकों बाद ‘बाहुबली’ के रूप में हमारे सामने आया। कुंदन शाह और अजीज मिर्जा का ‘नुक्कड़’ सबसे अधिक लोकप्रिय हुआ। आम आदमियों का यह खास कार्यक्रम बन गया। इसी दौर में गुलशेर खान शानी के महान उपन्यास ‘काला जल’ पर आधारित कार्यक्रम प्रदर्शित हुआ। श्रीलाल शुक्ला के ‘राग दरबारी’ से प्रेरित कार्यक्रम भी बना। आकाशवाणी और दूरदर्शन केंद्रों पर शास्त्रीय संगीत का खजाना है। वर्तमान में वह किस दशा में है, यह बताना कठिन है। खाकसार ने इंदौर आकाशवाणी के वाचनालय में ‘ट्राइबल कस्टम ऑफ वेस्टर्न इंडिया’ पढ़ी थी। कुछ वर्ष पश्चात वह किताब वहां नहीं मिली। हमारे आला अफसरों की यह आदत रही है कि वे वाचनालय की किताब अपनी पत्नी के लिए घर लाते हैं और तबादला होते समय किताब वापस करना भूल जाते हैं। सेवानिवृत्त होने पर कुछ अफसरों के व्यक्तिगत वाचनालय में वे सारी किताबें देखी जा सकती हैं।  राहुल बारपुते ने यह आयोजित किया था कि कुमार गंधर्व एलोरा की गुफा में शिवरंजनी गाएं। उस दौर में वहां नियुक्त अफसर को यह भय था कि गायन से गुफा को हानि पहुंच सकती है। दरअसल उस अफसर को कार्यक्रम का श्रेय नहीं मिल रहा था। राहुल बारपुते ने तत्कालीन प्रधानमंत्री से निवेदन किया और गायन की आज्ञा प्राप्त की। आज बताना कठिन है कि वह टेप कहां गया। भारतीय संगीत के सभी साधकों ने आकाशवाणी और दूरदर्शन के लिए काम किया है। हरिकृष्ण प्रेमी, से लीलाधर मंडलोई तक ने कमान संभाली है। लेखकों और कवियों के साक्षात्कार लिए गए। हमारी महान सांस्कृतिक धरोहर इन केंद्रों के पास है। कितनी सुरक्षित है, यह कहा नहीं जा सकता। वर्तमान दौर में मीडिया ‘हिज मास्टर्स वॉइस’ बना दिया गया है। अपेक्षाकृत रूप से दूरदर्शन आज भी तटस्थ बना हुआ है। कभी-कभी हुक्मरान दीये तले अंधेरे को देख नहीं पाते। ज्ञातव्य है कि दूरदर्शन पर खबर सुनाने वाली महिला को शृंगार की सामग्री विभाग प्रदान करता है। सुंदरता के प्रति हमारा आग्रह स्वाभाविक है। सत्यम शिवम अनदेखा रह जाता है। ज्ञातव्य है कि दूरदर्शन पर खबर प्रसारण में सलमा सुल्तान ने लंबी पारी खेली है। भारत के ए.एफ.एस. तल्यार खान ने क्रिकेट का आंखों देखा हाल सुनाने की विधा को इस कदर मांजा कि वे अकेले ही पांचों दिन का हाल सुनाते थे। गुरु रवींद्रनाथ टैगोर, मुंशी प्रेमचंद, शरत बाबू की रचनाओं से प्रेरित कार्यक्रम दूरदर्शन ने रचे हैं। आजकल मायथोलॉजी प्रेरित सीरियल दिखाए जा रहे हैं। मिथ मेकर के दौर में यह सुविधाजनक है। सुविधा सबसे बड़ा जीवन मूल्य प्रचारित कर दी गई है। बहार और खिजा भी आपके नजरिये पर आधारित है। मिर्जा गालिब का शेर है- ‘छाया है सज्जा दरो दीवार पर, गालिब लोग कहते हैं कि बहार आई है’।

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