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एन. रघुरामन का कॉलम:अवसरों को देखते हुए कम से कम अब किसी प्रोजेक्ट की योजना बनाएं

10 दिन पहले
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एन. रघुरामन, मैनेजमेंट गुरु

ये सवाल शायद आपको अजीब लगे! पर मैं आपको दोष नहीं देता। यह सुनकर पहला विचार यही होता क्योंकि हम सब नकारात्मक तरीके से गुंथे हुए हैं और लॉकडाउन में चारों ओर से नौकरी जाने, बिजनेस बंद होने जैसी नकारात्मक खबरें सुन रहे हैं। हालांकि ये सच्चाइयां हैं, पर कुछ ऐसे भी लोग हैं जो सिर्फ हाथ बांधकर कोरोना को दोष नहीं देते रहे। उन्होंने बिल्कुल कुछ अलग किया। यहां उनकी कहानी है।

पहली कहानी : 28 साल की उम्र में विधवा हो गईं अंबट कुंजीकुट्‌टी अम्मा ने केरल के पलक्कड़ स्थित अपने घर, जानकी निवास में बच्चों की परवरिश की। वह 1959 में गुज़र गईं। पर इस छोटे से गांव में पले इस बड़े परिवार ने अच्छी शिक्षा हासिल की, परिवार के सदस्य अलग-अलग शहरों और फिर अलग-अलग देशों में जाकर बस गए, शादी की और वहीं सेटल हो गए और अब सबका अपना-अपना परिवार है। कोरोना के दुनियाभर में फैलने से पहले ये लोग किसी अन्य परिवार की तरह आपस में जुड़े हुए थे।

अलग-अलग उपमहाद्वीपों में रहने के बावजूद भी लॉकडाउन सबके लिए कॉमन था। तब इस परिवार ने कई पीढ़ियों, महाद्वीपों और संस्कृतियों में फैली अपनी रेसिपीज़ और इससे जुड़ी भावनाओं को इकट्‌ठा किया और एक ई-बुक बनाई। पलक्कड़ का घर इसका मुख्य फोकस था और इसमें खानपान को सहेजा गया, जो उस समय कभी भी उबाऊ काम नहीं माना जाता था। घर की महिलाएं मानती थीं कि खाना अपने प्रियजनों के प्रति स्नेह प्रकट करने का तरीका है। किताब में मॉम्स सांभर, पप्पड़ा वड़ा, गुरखली चटनी और टौमेटो फ्राइड एग नाम केे 21 चैप्टर्स में 50 साल पुरानी यादों को सहेजा गया है। इसका संपादन और चित्रांकन घर की महिलाओं ने किया है।

अंबट परिवार का यह पहला लॉकडाउन प्रोजेक्ट नहीं है : इससे पहले मई-जून में, घर की महिलाओं ने अपना हुनर दिखाते हुए म्यूजिक-डांस वीडियो बनाकर वर्चुअली ही इन्हें इकट्‌ठा किया था। जहां खानपान से सीख की बात आती है, अंबट खानदान से जुड़े हर परिवार का अपना अलग अनुभव है, जिसे इस किताब में उनके अनुभवों से तैयार रेसिपी के जरिए सादगी से प्रस्तुत किया गया है। ई-बुक को मिली प्रतिक्रिया के बाद यह परिवार बहुत उत्साहित है और किताब को प्रकाशित करवाने का विचार कर रहा है।

दूसरी कहानी : बेंगलुरु की टेक कंपनी में काम करने वाले एक युवा वित्त विशेषज्ञ शिव कुमार हमेशा से ही शहर की भीड़भाड़ से दूर पहाड़ की तराई में अपना घर बनाना चाहते थे ताकि अपनी रिटायरमेंट वाली जिंदगी शांति से गुजार सकें। पर एक समय के बाद इस वित्त विशेषज्ञ को लगा कि वह स्वतंत्र घर कोई रिटर्न नहीं दे रहा है और उसकी बचत को निगल रहा है। पर कोरोनावायरस ने अचानक ही परिस्थितियों को बदल दिया।

आज वह अपना घर कोविड से प्रभावित उन परिवारों को किराए पर दे रहा है, जो कि स्वतंत्र घर और फार्महाउस में 15 दिन रुकना चाहते हैं। परिवार के लोगों के साथ संपर्क से बचने के लिए कई उच्च मध्यमवर्गीय और धनी परिवार के बिना लक्षणों वाले मरीज़ किराए के घरों में आइसोलेशन को तवज्जो दे रहे हैं।

कुछ लोग इसे छुटि्टयों की तरह बिता रहे हैं। हर महीने वह दो परिवारों को घर किराए पर देता है, जिसका किराया वह नहीं बताना चाहता। चल रही कीमत के अनुसार 15 दिन के फार्म हाउस का किराया 10 हजार से ज्यादा है, वहीं बगीचे के साथ स्वतंत्र घर का किराया 6 हजार रुपए है! उसने इसे कोरोना प्रोजेक्ट की तरह लिया है और वायरस खत्म होने के बाद भी अच्छे परिवारों को किराए पर देने के लिए कई खाली घरों को लंबे समय के लिए लीज पर लिया है।

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