सवाल / कोरोना का सामना करने में पूरी तरह असफल ‘गुजरात मॉडल’

'Gujarat model' completely failed to face Corona
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'Gujarat model' completely failed to face Corona

  • कोरोना संकट से गुजरात मॉडल के वे स्याह पक्ष भी सामने आ रहे हैं, जो अब तक प्रोपेगंडा मशीन छुपाए रही

राजदीप सरदेसाई

राजदीप सरदेसाई

May 22, 2020, 08:21 AM IST

जिस ‘गुजरात मॉडल’ का बहुत ढिंढोरा पीटा जाता है, वह कोरोना के समय में अस्त-व्यस्त हो गया है। कुछ मामलों को देखिए: 
गुजरात न केवल सबसे ज्यादा कोरोना मामलों वाले राज्यों में शामिल है, बल्कि यहां मृत्यु दर भी राष्ट्रीय औसत से ज्यादा है। अहमदाबाद के म्यूनिसिपल कमिश्नर को अचानक हटा दिया क्योंकि स्थानीय मीडिया रिपोर्ट्स के मुताबिक सरकार को लगा कि वे ‘बहुत ज्यादा टेस्ट’ कर रहे थे। सूरत में एक महीने में करीब तीन बार प्रवासी मजदूरों और पुलिस के बीच हिंसक झड़पें हुईं। राजकोट में प्रवासी मजदूरों की भीड़ ट्रेन रद्द होने पर भड़क गई और गुस्सा स्थानीय मीडिया पर उतरा। इसमें एक टीवी पत्रकार बुरी तरह घायल हो गया। पुलिस मूकदर्शक बनी रही। एक पत्रकार को देशद्रोह के आरोप में गिरफ्तार कर लिया गया, क्योंकि उसने यह खबर दी थी कि मुख्यमंत्री विजय रुपाणी और बीजेपी हाईकमान में मतभेद चल रहे थे। 
तो उस राज्य में अचानक क्या गड़बड़ हो गया, जिसे 21वीं सदी के भारत के लिए ‘मॉडल’ की तरह पेश किया गया, जिसके तेज ‘विकास’ को नरेंद्र मोदी की राष्ट्रीय स्तर पर पहचान बनाने और अंतत: प्रधानमंत्री बनने का आधार माना गया। सच्चाई यह है कि ‘गुजरात मॉडल’ कभी वैसा शानदार था ही नहीं, जैसा प्रोपेगंडा मशीन ने उसे 2001 से 2014 तक, एक दशक से भी ज्यादा समय में बताया था। ‘वाइब्रेंट गुजरात’ की छवि के तहत शीर्ष उद्यमियों और राज्य सरकार के बीच हुए सैकड़ों एमओयू कहानी का एक पहलू दिखाते थे। जहां राज्य ने बिजनेस फ्रेंडली छवि बनाई, सड़कें, पोत, बिजली उत्पादन जैसे इंफ्रास्ट्रक्चर बनाकर प्रभावित किया और कृषि विकास दर बेहतर की, वहीं स्याह पक्ष छिपे ही रहे और उन पर न ही दब्बू मीडिया और न ही हीरो को पूजने वाले नागरिकों ने सवाल उठाए। अब जन स्वास्थ्य तथा शासन का सामाजिक रूप से समावेशी तंत्र बनाने में इसकी असफलता ऐसा ही एक स्याह पक्ष है जो गुजरात मॉडल को डरा रहा है।
गुजरात में 1000 की आबादी पर 0.33 हॉस्पिटल बेड हैं, जबकि राष्ट्रीय अनुपात 0.55 है। रिजर्व बैंक की रिपोर्ट बताती है कि गुजरात सामाजिक सेक्टर में निवेश में बहुत पिछड़ा हुआ है। प्रति व्यक्ति स्वास्थ्य खर्च के मामले में गुजरात 1999-200 की चौथी रैंक से फिसलकर 2009-10 में 11वीं रैंक पर आ गया। वहीं, राज्य के सकल घरेलू उत्पाद में स्वास्थ्य खर्च की दर 0.87% से घटकर 0.73% पर आ गई। शिशु मृत्यु दर भी चिंताजनक रूप से ज्यादा है। टाटा इंस्टीट्यूट ऑफ सोशल साइंसेस के शोधकर्ता संजीव कुमार ने खुलासा किया कि गुजरात में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्रों की संख्या बिहार से भी कम है। कई सरकारी अस्पताल निजी क्षेत्र की कंपनियों को दे दिए गए हैं। 
राज्य में गुणवत्तापूर्ण शिक्षा में सरकार के निवेश में भी गिरावट देखी गई। गुजरात अपनी आय का दो फीसदी से भी कम शिक्षा पर खर्च करता है और उसकी आधे से ज्यादा वर्कफोर्स या तो अशिक्षित है या केवल पांचवीं कक्षा तक ही पढ़ी है। अर्थशास्त्र की प्रोफेसर इंदिरा हिरवे ने बताया कि गुजरात में अनौपचारिक और पारंपरिक क्षेत्रों में काम कर रहे 90% से ज्यादा कामगारों की आय और सामाजिक सुरक्षा कम है। ऐसे में क्या सूरत के इस दलदल में काम कर रहे प्रवासी मजदूरों की चिंता पर हमें आश्चर्य होना चाहिए? इस बात पर भी आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि जिन्होंने सुधार की मांग की या राजनीतिक अधिकार को चुनौती दी, उनकी आवाज दबा दी गई या राजद्रोह के आरोप लगाए गए। ऐसा पहली बार नहीं हुआ है कि राज्य में सरकार की आलोचना पर पत्रकारों पर देशद्रोह के आरोप लगे हों। जब मोदी मुख्यमंत्री थे, तब उन्होंने अपनी ऐसी विशाल छवि तैयार की थी कि उसके सामने सभी विरोधी छोटे लगने लगे। उनके उत्तराधिकारियों में मोदी जैसा आकर्षण नहीं रहा, लेकिन उन्होंने फैसले लेने में स्वेच्छाचारी मानसिकता को ही अपनाया। 
मुख्यमंत्री रुपाणी द्वारा कोरोना फैलने के लिए तब्लीगियों को जिम्मेदार ठहराना काफी हद तक अपेक्षित था। कई वर्षों में गुजरात के राजनीतिक संस्थान में अल्पसंख्यक समूहों के लिए नापसंदगी को बढ़ावा दिया गया है। हिंदू-मुस्लिम के बीच अदृश्य भौगोलिक सीमाएं पिछले कुछ वर्षों में गहराती नजर आई हैं। ऐसे में वायरस के फैलाव को रोकने में संघर्ष कर रही राज्य सरकार को तब्लीगियों ने बहाना दे दिया। 
जहां गुजरात एक तरफ ‘नियो-मिडिल क्लास’ सपनों और आंत्रप्रेन्योरशिप के उत्साह से भरा है, वहीं जातिगत व सामुदायिक बंटवारा और बढ़ती आय असमानता का अभिशाप भी झेल रहा है। ऐसे में कोरोना संकट चेतावनी की तरह है। इसने गुजरात को सहानुभूति के गांधीवादी मूल्यों को पुनर्जीवित करने का अवसर दिया है। एक ऐसे समावेशी समुदाय की भावना जो पक्षपात की चिंता से ऊपर हो, जिसे सिर्फ बढ़ते पूंजी निवेश पर ही नहीं, बल्कि मानव विकास को बेहतर बनाने पर भी गर्व हो। यही वह सच्चा गुजरात मॉडल होगा जिसके लिए प्रयास करने चाहिए।
(यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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