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रीतिका खेड़ा का कॉलम:स्वास्थ्य और पोषण: कोरोना के बाद मॉल और सिनेमाघर खुले, लेकिन आंगनबाड़ियां अब तक बंद हैं

एक वर्ष पहले
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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं

गुजरात और बिहार की तुलना करना शायद आपको अजीब लगेगा, लेकिन हाल ही में जारी हुए नेशनल फैमिली हेल्थ सर्वे-5 (NFHS-5) के परिणामों में यह दिलचस्प पहलू है। स्वास्थ्य और पोषण के मुद्दों पर नजर रखनेवालों KA इस सर्वेक्षण के परिणामों का बेसब्री से इंतजार रहता है। 1992 से NFHS स्वास्थ्य और पोषण से जुड़े सूचक के लिए सबसे विश्वसनीय सूत्र रहा है। दिसंबर में NFHS-5 (2019-20) से दस प्रमुख राज्यों के परिणाम जारी हुए। कई मायनों में जो तस्वीर उभरकर सामने आती है, वह उत्साहजनक नहीं है।

स्वास्थ्य व पोषण की हमारे जीवन में कितनी अहमियत है, यह 2020 में किसी को समझाने की ज़रूरत नहीं। कोरोना ने यह सबक सिखा दिया है। दुनिया की कल्पना में अमेरिका को उसकी तथाकथित अमीरी की वजह से मॉडल माना जाता था। लेकिन, कोरोना के हमाम में अमेरिका और उसके जैसे अन्य देश सब नंगे हैं। दुनिया में सबसे अधिक कोरोना मौतें अमेरिका में हुई हैं।

कुछ अमेरिका जैसी ही दशा गुजरात की NFHS-5 में दिखाई दे रही है। एक वर्ग ने गुजरात को मॉडल के रूप में दिखाने की कोशिश की है। टिप्पणी करने वालों में विकास की परिभाषा स्पष्ट नहीं है। उनके नजरिए में विकास का अर्थ कुल GDP की बढ़ोतरी तक सीमित है, प्रति व्यक्ति GDP से भी मतलब नहीं। इसलिए 5 ट्रिलियन डॉलर की इकोनॉमी’पर जोर दिया जाता है। यदि यह केवल 100 लोगों के हाथों में केंद्रित हो, तो बाकी देशवासियों को ऐसी उपलब्धि से क्या मिलेगा?

इससे भी बड़ी भूल है GDP पर रुक जाना। यह भूल जाना कि अच्छे जीवन में स्वास्थ्य, पोषण और शिक्षा की क्या अहमियत है। NFHS-5 के परिणाम से हम लोगों के जीवन की गुणवत्ता के बारे में जानकारी मिलती है। कोरोना से अमेरिकी माडल की कमजोरियां उभरकर आईं, NFHS-5 में गुजरात मॉडल की।

इस संदर्भ में बिहार और गुजरात की तुलना दिलचस्प है। 127 संकेतकों में से जहां परिणामों को बेहतर या बदतर में बांटा जा सकता है। गुजरात ने उनमें से 81 पर बिहार से बेहतर प्रदर्शन किया। उदाहरण के लिए, गुजरात में सार्वजनिक स्वास्थ्य सेवाएं बेहतर हैं, संस्थागत प्रसव सबके लिए उपलब्ध है और शिशुओं की मृत्युदर कम है।

इसके बावजूद, कई संकेतकों पर गुजरात और बिहार समान हैं। जैसे, कुपोषित या खून की कमी (एनीमिया) वाले बच्चों का अनुपात, पूर्ण टीकाकरण दर, कम BMI वाली महिलाएं। महिलाओं की स्थिति के कई संकेतकों पर बिहार बेहतर है। वहां ज्यादा महिलाओं को संपत्ति का अधिकार या मोबाइल फोन के खुद उपयोग की सुविधा है। पांच साल से कम उम्र के बच्चों में एनीमिया आनेवाले समय का संकेत है। उसमें गुजराती बच्चे, बिहारी बच्चों से पीछे हैं।

बिहार और गुजरात की तुलना से पता चलता है कि गुजरात और किसी मापदंड पर मॉडल राज्य हो सकता है, लेकिन महिलाओं व बच्चों के लिए जीवन की गुणवत्ता के लिए वह मॉडल नहीं है।

आर्थिक विकास के बावजूद, हम इन संकेतकों पर इतनी कम प्रगति क्यों देखते हैं? आंगनबाड़ी, महिलाओं और बच्चों के लिए समयबद्ध स्वास्थ्य और पोषण सेवाएं (जैसे टीकाकरण, पौष्टिक खाना) प्रदान करती है। बच्चों की योजनाओं पर (आंगनबाड़ी या प्रधानमंत्री मातृ वंदना योजना) GDP का महज 0.1% खर्च होता है। बजट में कंजूसी की समस्या का बड़ा कारण है। कागजी कार्रवाई अलग बाधा डालती है।

सरकार और यूनीसेफ जैसी संस्थाएं, बिल और मेलिंडा गेट्स (BMGF) के कॉर्पोरेट धन को जुटाने में लगी हैं। कॉर्पोरेट धन से संसाधनों की उपलब्धता बढ़ती है, लेकिन पैसे किस पर खर्च होंगे? उदाहरण के लिए, सरकार के पोषण अभियान का 70% खर्च, BMGF के बनाए सॉफ्टवेयर व स्मार्टफोन पर हुआ। यह खर्च अंडों और आंगनबाड़ी कार्यकर्ताओं पर नहीं हुआ, जिनका फायदा तय माना जाता है।

हमें ऐसे मॉडल की जरूरत है, जिसमें बच्चों को प्राथमिकता दी जाए, GDP को नहीं। देश में बच्चों की कितनी पूछ है, यह इससे स्पष्ट है कि कोरोना लॉकडाउन के बाद मॉल और सिनेमा तो खुल गए, लेकिन आंगनबाडिय़ों को खोलने के बारे में चर्चा भी नहीं हो रही।

(ये लेखिका के अपने विचार हैं)