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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:पढ़ने-लिखने से मुझे निर्मल आनंद प्राप्त होता है; लेखन का मुआवजा स्तंभ लेखन के आनंद में निहित है

6 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक। - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक।

आज का लेख इस स्तंभ के प्रकाशन के 26वें वर्ष का पहला लेख है। पाठकों और प्रकाशक को धन्यवाद देता हूं। विगत वर्षों में मेरी 5 शल्य चिकित्सा हुईं और कुछ लेख अस्पताल से लिखे गए हैं। पढ़ना-लिखना मेरे जीवन का उद्देश्य रहा है। मेरे परिवार ने पूरा सहयोग दिया है। 1985 में दैनिक भास्कर का इंदौर संस्करण प्रकाशित हुआ। कुछ वर्षों तक साप्ताहिक कॉलम लिखा।

3 वर्ष तक नवरंग का संपादन भी किया। इसके बाद श्री सुधीर अग्रवाल ने मुझे दैनिक लेख लिखने के लिए कहा। उस समय देश के किसी भी अखबार में फिल्म पर प्रतिदिन कॉलम नहीं लिखा जाता था। तब तक भारत कृषि प्रधान देश था और आज की तरह फिल्ममय नहीं हुआ था। यह संभव है कि अन्याय व असमानता आधारित व्यवस्था में क्रिकेट और फिल्म पलायन के लिए सुविधाजनक मान लिए गए हों।

तूफान आने के समय शुतुरमुर्ग अपनी गर्दन रेत में घुसाकर यह भरम पालता है कि तूफान गुजर गया। हमारी व्यवस्था भी यह मान रही है कि महामारी का तूफान गुजर गया जबकि आज भी लगभग हजार व्यक्ति प्रतिदिन मर रहे हैं। देश की राजधानी दिल्ली में संक्रमण सबसे अधिक है।

क्या यह प्रतीकात्मक है?
किसी भी व्यक्ति के लिखने के ढंग या उसकी सृजन प्रक्रिया को समझने से अधिक जरूरी यह है कि पाठकों पर उसका कितना प्रभाव पड़ता है। क्या पाठक पढ़ने का आनंद मात्र लेता है और उसकी विचार प्रक्रिया में इससे कोई अंतर पैदा नहीं होता? कुछ दिन पूर्व ही 23सितंबर को महाराष्ट्र से एक महिला का फोन आया कि मेरे किफायत और बचत के महत्व को रेखांकित करने वाले लेख को पढ़कर उसने अनावश्यक वस्तुओं की खरीदी छोड़ दी है।

कुछ वर्ष पूर्व राजस्थान में पति-पत्नी के बीच निरंतर मतभेद होने के कारण, उन्होंने तलाक की अर्जी दी थी। नियमानुसार उन्हें 6 महीने साथ रहकर पुनर्विचार करना था। घर के भीतर दो अलग-अलग भागों में वे रहने लगे परंतु दैनिक भास्कर की एक ही प्रति आती थी।

अत: साथ बैठकर कॉलम पढ़ने लगे। कुछ ही दिनों में उनके मतभेद कम हो गए और तलाक के विचार को उन्होंने त्याग दिया। इस तरह के प्रकरण अत्यंत कम हुए हैं। लेखन की सार्थकता दूध के बर्तन से दूध निकालने के बाद बर्तन के निचले हिस्से में जमा दूध की खुरचन की तरह ही होती है। दुखद यह है कि संकीर्णता के हामी-उन्मादी लोग फोन पर अपशब्द कहते हैं।

ऐसे ही एक प्रकरण की शिकायत मैंने इंदौर के एम.आई.जी थाने में की थी परंतु व्यवस्था में व्यस्त तथा आए दिन इंदौर आते नेताओं की सुरक्षा में व्यस्त पुलिस विभाग ने इस प्रकरण पर कोई ध्यान नहीं दिया। उन्हें दोष भी नहीं दिया जा सकता क्योंकि महामारी, आर्थिक मंदी और उनींदी व्यवस्था के कारण अपराध बढ़ रहे हैं और पुलिस विभाग अत्यंत व्यस्त है। पुलिस विभाग में वेतन इतने कम हैं कि उन्हें घर चलाने में भी परेशानी आ रही है।

जाने क्यों नेता को अपनी जनता से खतरा लगता है। क्या वे नहीं जानते कि सुरक्षा के सारे जतन असफल हो जाते हैं। महात्मा गांधी, जे.एफ.कैनेडी, इंदिरा एवं राजीव गांधी को भी बचाया नहीं जा सका। राजीव गांधी की हत्या पर ‘मद्रास कैफे’ दस्तावेज सा महत्व रखती है। ऑलिवर स्टोन की फिल्म ‘जे.एफ.के’ भी सर्वकालिक महान फिल्म है।

विगत 25 सालों में 5 शल्य चिकित्सा की गईं और दो बार कैंसर ग्रस्त रहा हूं परंतु लेख-लिखने में एक दिन भी नहीं चूका हूं। कारण यह है कि पढ़ने-लिखने से मुझे निर्मल आनंद प्राप्त होता है। लेखन का मुआवजा स्तंभ लेखन के आनंद में निहित है। यह मामला कुछ हद तक उपन्यास ‘अल्केमिस्ट’ की तरह है।

ग्रीक लीजेंड है कि यूलिसिस विश्व यात्रा करके लौटा तो उसकी मां ने कहा कि अब अपने द्वारा पराजित देशों की यात्रा एक आम आदमी की तरह करके मनुष्य को समझने की प्रक्रिया में स्वयं को समझने का काम करो। मेरा लेखन भी ऐसी ही यात्रा है।

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