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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:साहित्य के इतिहास में कभी कोई रचना अश्लीलता के आरोप के कारण प्रतिबंधित नहीं हुई

12 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

आदित्य चोपड़ा के साथ 40 फ़िल्मकारों ने दिल्ली की अदालत में अपील दर्ज की है कि टीवी पर फिल्म वालों के खिलाफ असत्य और अफ़वाहें फैलाने वालों की वेबसाइट से भी उनके द्वारा भेजा गया कचरा हटाया जाए। इस समय व्यवस्था दुविधा में है कि वे इन अफ़वाह फैलाने वालों की रक्षा करे या अदालत के निर्णय को बेमन से ही सही स्वीकार करे। व्यवस्था का प्रश्रय इन्हीं लोगों को प्राप्त था ‘जिन्होंने छीन लीना दुपट्टा फ़िल्मकारों का’! दरअसल अवाम भी चटखारे लेकर अफ़वाहों का मजा लेता रहा है।

ज्ञातव्य है कि हेड्डा हॉपर नामक पत्रकार ने हॉलीवुड में गॉसिप लिखना प्रारंभ किया। राजेश खन्ना के दौर में देवयानी चौबल गॉसिप क्वीन थीं और राजेश खन्ना के दरबार में उन्हें ऊंचा स्थान दिया गया था। देवयानी का जन्म ग्वालियर के किसी बड़े सामंतवादी घराने में हुआ था। वह मुंबई में एक क्लब में कमरा लेकर रहती थीं।

इसी तरह रेडियो पर क्रिकेट का आंखों देखा हाल सुनाने का शुभारंभ करने वाले ए.एफ.एस ताल्यरखान भी ताउम्र क्लब में रहे। वे अकेले ही पांचों दिनों का हाल रेडियो पर सुनाते थे। उनका अंदाज़-ए-बयां ऐसा था कि रेडियो पर उनका विवरण सुनकर श्रोता की आंख के सामने मैदान आ जाता था। उसे आभास होता था कि जैसे मैच उसी के अहाते में ही खेला जा रहा हो।

एक बार देवयानी ने एक लेख लिखा ‘फिल्म संसार में खानदान और पानदान’ उनके निशाने पर कपूर खानदान था। उन्हें बड़ी निराशा हुई कि कपूर परिवार की ओर से कोई प्रतिक्रिया ही नहीं हुई। बेचैन देवयानी ने राज कपूर से साक्षात्कार का समय मांगा। देवयानी से राज कपूर बड़ी गर्मजोशी से मिले। बातचीत में उन्होंने उस विवादास्पद कालम का संकेत तक नहीं दिया। देवयानी को एहसास हुआ मानो वे खुद एक पानदान या कहें पीकदान बन कर रह गई। पहली बार उसका सामना खानदानी लोगों से हुआ था।

पीत पत्रकारिता और गॉसिप अलग-अलग नजरिए हैं। पीत पत्रकारिता बीमार है, गॉसिप जीजा-साली की छेड़छाड़ की तरह होनी चाहिए। अभी तक जिन पत्रकारों पर आरोप है वे सभी वेतन भोगी कठपुतलियां हैं। विष वमन उनका पेशा है। ये तवायफों के मुकाबले गली में रेंगने वाले बिलबिलाते प्राणी हैं। कुछ हद तक इन्हें कॉकरोच माना जा सकता है जिनके शरीर में रक्त की जगह मावाद बहता है।

इसी कारण आणविक विकिरण का प्रभाव भी इन पर नहीं पड़ता। अब नाम में गोस्वामी लिखने से कोई तुलसी दास तो नहीं हो सकता। इन बेचारों को इनकी अपनी कुंठाओं में ही डूब जाने दिया जाना चाहिए। फिल्म पत्रकारिता के एक दौर में बाबूराव पटेल का बड़ा दबदबा था। उन्होंने फ़िल्मकारों को सबक सिखाने के लिए एक फिल्म बनाई जिसे सिनेमाघरों में पहले खाली शो के कारण हटा दिया गया।

आदित्य चोपड़ा शांत स्वभाव के व्यक्ति हैं। उन्हें बस अपने काम में ही रुचि रहती है। उनका रवैया यह रहा है कि हाथी को भौंकते हुए कुत्तों को अनदेखा करना चाहिए परंतु इस बार उन्होंने तीव्र प्रतिक्रिया व्यक्त की है। हर व्यक्ति की मूर्खता को सहने की एक सीमा होती है।

बुद्धिमानी की सड़क पर व्यवस्था ने जगह-जगह स्पीड ब्रेकर बनाए हैं परंतु मूर्खता के सरपट भागने के लिए समानांतर सड़क बनाई गई है जो सीधे दिल्ली पहुंचती है। जैसे साहित्य और सिनेमा में अश्लीलता का आरोप लगाया जाता है तो मामला अदालत में जाता है। जेम्स जॉयस की ‘यूलीसिस’ पर मुकदमा कायम हुआ था ।

जस्टिस वूल्जे ने फैसला दिया कि लेखक की नीयत को परखना चाहिए। क्या उसने मात्र सनसनी फैलाने और पैसा कमाने के लिए इसे रचा है या अपने विषय को गहराई देने के उद्देश्य से रचा। किसी भी रचना के छोटे से भाग को उसके व्यापक संदर्भ में काट कर देखना और परखना गलत है, साहित्य के इतिहास में कभी कोई रचना अश्लीलता के आरोप के कारण प्रतिबंधित नहीं हुई। ‘लोलिता’ और ‘पोर्टनायस कम्पलेंट’ भी साफ-सुथरी करार दी गई हैं।

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