कूटनीति / ताइवान के डब्ल्यूएचओ में प्रवेश को लेकर दुविधा में फंसा भारत

India caught in dilemma over Taiwan's entry into WHO
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India caught in dilemma over Taiwan's entry into WHO

  • कोरोना पर नियंत्रण करने वाले ताइवान को लेकर अमेरिका-चीन के मतभेदों में बीच उलझा भारत

हर्ष वी पंत

हर्ष वी पंत

May 23, 2020, 05:46 AM IST

जहां दुनिया वैश्विक महामारी से लड़ने की कोशिश कर रही है, वहीं अमेरिका और चीन के बीच बढ़ते तनाव ने स्वास्थ्य मुद्दे का राजनीतिकरण कर दिया है। दोनों देश चीन के वायरस की जानकारी देने में चुप्पी से लेकर अमेरिका द्वारा विश्व स्वास्थ्य संगठन (डब्ल्यूएचओ) को चीन की ‘पीआर एजेंसी’ कहे जाने तक पर झगड़ रहे हैं। डब्ल्यूएचओ की फैसले लेने वाली एक्जिक्यूटिव संस्था वर्ल्ड हेल्थ असेंबली (डब्ल्यूएचए) में ताइवान के शामिल होने के मुद्दे पर आग और भड़क गई है।

यह भारत के लिए भी चुनौती है, जो मई अंत में डब्ल्यूएचए का अध्यक्ष बनने वाला है। भारत बढ़ते वैश्विक दबाव और अमेरिका-चीन के बीच बढ़ती तल्खी से दुविधा में फंस सकता है। उसे फैसला लेना होगा कि क्या वह ताइवान की डब्ल्यूएचए में पर्यवेक्षक वाली स्थिति को बहाल करने की अमेरिकी मांग मानता है या नहीं। क्योंकि चीन तर्क दे सकता है कि यह नई दिल्ली की ‘वन-चाइना’ नीति के विरुद्ध होगा। हाल के हफ्तों में चीन और ताइवान दोनों ही अपने तरीकों से नई दिल्ली के संपर्क में हैं। ताइवान ने भारत की मदद करने के लिए 10 लाख सर्जिकल मास्क दान किए हैं। और भारत में चीनी दूतावास ने इस पर जोर दिया है कि भारत फैसला लेने से पहले ‘वन-चाइना’ नीति को ध्यान में रखे। 

कोविड-19 को लेकर ताइवान की प्रतिक्रिया की दुनियाभर में तारीफ हुई क्योंकि देश में केवल 380 कन्फर्म मामले और 5 मौतें हुईं, जो कि 2.36 करोड़ आबादी वाले देश के लिए चौंकाने वाला है। वह वैश्विक मिसाल बन गया। फिर भी वह चीन के साथ जटिल संबंधों के चलते डब्ल्यूएचओ की सदस्यता नहीं पा सका। डब्ल्यूएचओ को भी ताइवान से जुड़े सवालों से बचने पर पक्षपात के आरोप झेलने पड़े हैं। 
डब्ल्यूएचओ जैसे संस्थान के लिए ताइवान को बाहर रखने का कोई मतलब नहीं बनता, खासतौर पर तब जब उसने सफलतापूर्वक वायरस को रोका हो।

ताइवानी स्वास्थ्य मंत्री चेन शिह-चुंग ने हाल ही में टिप्पणी की- ‘डब्ल्यूएचओ यह समझ गया होगा कि महामारी की राष्ट्रीय सीमाएं नहीं होतीं, किसी को छोड़ा नहीं जा सकता, क्योंकि जिस देश को छोड़ दिया जाएगा, वह लूपहोल बन सकता है।’ वहीं चीनी विदेश मंत्रालय की प्रवक्ता हुआ चुनयिंग ने भी स्पष्ट किया कि ‘बीजिंग ने ताइवान के लिए स्थानीय या वैश्विक स्वास्थ्य आपदाओं का सामना करने के लिए ‘उचित व्यवस्थाएं’ कीं, लेकिन त्साई की डेमोक्रेटिक प्रोगेसिव पार्टी (डीपीपी) आजादी पर जोर दे रही थी।’ 

अंतरराष्ट्रीय समुदाय में भी सहमति बनती दिख रही है कि ताइवान को डब्ल्यूएचओ और अन्य बहुपक्षीय एजेंसियों की सदस्यता मिले। अमेरिका ने डब्ल्यूएचए समेत विभिन्न संस्थानों में ताइवान की ‘सार्थक भागीदारी’ का समर्थन किया है। मार्च 2020 में ट्रम्प प्रशासन ने ताइवान एलाइज इंटरनेशनल प्रोटेक्शन एंड इनहांसमेंट एक्ट लागू किया जिसका उद्देश्य ताइवान की अंतरराष्ट्रीय उपस्थिति का समर्थन करना था। वहां ‘ट्वीट फॉर ताइवान’ अभियान भी चला। यूरोपीय कमीशन के अध्यक्ष अर्सुला वॉन डेर लेयेन ने यूरोपीय संघ को मास्क दान करने के लिए ताइवान को सार्वजनिक रूप से धन्यवाद कहा, जो बहुत दुर्लभ है। 
यह अभी स्पष्ट नहीं है कि भारत सरकार ने ताइवान की बहाली को लेकर अमेरिका के कदम का समर्थन किया है या चीन की आपत्ति को स्वीकार किया है।

भारत के विदेश मंत्री एस. जयशंकर ने हाल ही में सात देशों के विदेश मंत्रियों की वर्चुअल मीटिंग में भाग लिया, जिसे यूएस सेक्रेटरी ऑफ स्टेट माइक पॉम्पिओ ने संचालित किया था। इसका उद्देश्य डब्ल्यूएचओ में बदलावों के लिए समर्थन जुटाना था। सात में से चार देश अमेरिका, जापान, ऑस्ट्रेलिया, न्यूजीलैंड के अलावा कनाडा, फ्रांस, जर्मनी व ब्रिटेन ताइवान को डब्ल्यूएचओ में बतौर पर्यवेक्षक प्रवेश देने के लिए डेमार्श (नीति परिवर्तन दस्तावेज) पर हस्ताक्षर कर चुके हैं। इससे भारत पर और दबाव बढ़ रहा है। 

भारत के सामने बीजिंग की तुलना में ताइवान के साथ अपने संबंधों का लाभ उठाने का अवसर है। भारत ताइवानी कॉर्पोरेट सेक्टर के लिए बिजनेस करना आसान बनाकर व्यापार संबंध बढ़ा सकता है। ऐसे कई क्षेत्र हैं, जो भारत के लिए टेक्नोलॉजी के अगले चरण में जाने के लिए जरूरी हैं, जैसे इलेक्ट्रॉनिक्स, सेमी कंडक्टर और 5जी, जिनमें ताइवान आगे है। ताइवान का हेल्थ सेक्टर सबसे आधुनिक में से एक है। वैश्विक महामारी को देखते हुए भारत ताइवान के हेल्थ सेक्टर के साथ काम कर सकता है।  

कोविड-19 से आई जटिल चुनौतियों का सामना करने के लिए अगर विदेश मंत्रालय चाहता है कि इंडो-पैसिफिक क्षेत्र में देशों के बीच विचारों और सर्वश्रेष्ठ तरीकों का आदान-प्रदान हो तो डब्ल्यूएचए में ताइवान के प्रवेश का समर्थन स्वागतयोग्य कदम होगा। भारत की विदेश नीति का दृष्टिकोण अब इतना विकसित हो चुका है, जहां मुद्दों पर आधारित गठबंधन सामान्य हो गए हैं। ताइवान के साथ उसके संबंध भी इसी तरह बढ़ने चाहिए।   (यह लेखक के अपने विचार हैं।)

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