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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:क्या सहकारी बाजार पर खुशी उपलब्ध है और होम डिलीवरी हो सकती है?

2 महीने पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक - Dainik Bhaskar
जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

सा हित्य में काल्पनिक भू-खंड को रूरीटेनिया कहा जाता है। वर्तमान का घटनाक्रम हमें आभास देता है कि मानो हम किसी आभासी दुनिया में जी रहे हों। रूरीटेनियानुमा एक प्रदेश में खुशी का एक विभाग बनाया गया है। कुछ लोगों को प्रशिक्षित किया जाएगा कि किस तरह आम आदमी की खुशी का नाप-तोल किया जाए।

क्या यह संभव है कि दुकानों पर आधा किलो खुशी की कीमत 5 रुपए बारह आना होगी और 5 किलो खरीदने वाले को एक पाव खुशी मुफ्त में दी जाएगी। प्रशिक्षित लोगों को ‘आनंदयक्ष’ नाम से पुकारा जाएगा। पाठ्यक्रम का नाम ‘अलोह’ रखा गया है। दरअसल पाठ्यक्रम तो 1924 में लिखा गया था। उसमें दो पंक्तियों के बीच गहरे रहस्य अनलिखे रहे परंतु हर शपथबद्ध व्यक्ति उन्हें जानता है।

होठों के 3 सेंटीमीटर फैलने का अर्थ होगा कि व्यक्ति अधिक खुश नहीं है। मुस्कान कम से कम 2 इंच तो होनी ही चाहिए। लगातार मुस्कुराने से चेहरे की मांसपेशियां थक जाती हैं। इस जकड़न से आभास होता है कि खुशी उसके चेहरे पर फेविकोल द्वारा जड़ दी गई है। आदत हो जाने के कारण इस तरह का व्यक्ति शव यात्रा में भी मुस्कुराता हुआ प्रतीत होता है। उसकी इस चस्पा की गई मुस्कान देखकर मुर्दे में भी जान आ सकती है।

शायद इसी कारण इसे यक्ष का नाम दिया गया है। ज्ञातव्य है कि महाभारत में युधिष्ठिर, यक्ष संवाद में बड़ी दार्शनिक बातें सामने आती हैं। मसलन शरीर नश्वर है परंतु विचार कभी नहीं मरते। यह बात अलग है कि विचारों में मिलावट की जाती है। इस तरह से असली घी के साथ डालडा भी शामिल हो जाता है। आज तो शुद्ध डालडा भी नहीं मिलता।

भोपाल की रितु शर्मा और उनका परिवार एक संस्था संचालित करता है, जिसका उद्देश्य जीवन में खुशी लाना है। आम आदमी के हालात पर फिर सुबह होगी के लिए साहिर लिखते हैं, ‘आसमां पे है खुदा और जमीं पे हम, आजकल वो इस तरफ देखता है कम।’ जैसे खुशी की तलाश बाहर की जाती है, वह खुशी व्यक्ति की विचार शैली में वैसे ही विद्यमान है जैसे हिरण की नाभि में कस्तूरी होती है और वह गंध का पीछा करता रहता है।

खुशी विचार शैली की एक दशा है जो स्थाई नहीं होती। यह पल-पल बदलती है। अपने प्रारंभिक दौर में दिलीप कुमार ने लगातार दु:खांत फिल्मों में अभिनय किया और वे ट्रेजेडी किंग कहलाने लगे। नैरश्य उनकी विचार शैली में प्रवेश कर गया। डॉक्टर ने पूरी बात जानने के बाद उन्हें सलाह दी कि वे कुछ कॉमेडी फिल्में करें। उन्होंने ‘आजाद’ और ‘राम और श्याम’ अभिनीत कीं। मीना कुमारी ट्रेजेडी क्वीन कहलाती थीं। उनके द्वारा अभिनीत हास्य फिल्म ‘मिस मैरी’ सफल नहीं रही।

शराबी का अभिनय करने वाले बदरुद्दीन जॉनी वॉकर कहलाए। कॉमेडी फिल्में देखने से नैरश्य दूर होता है। किशोर कुमार की ‘चलती का नाम गाड़ी’ महमूद और किशोर कुमार अभिनीत ‘पड़ोसन’ और गुलजार की संजीव कुमार, मौसमी चटर्जी और देवेन वर्मा अभिनीत ‘अंगूर’ लाजवाब कॉमेडी है। देवेंद्र वर्मा ऐसे हास्य कलाकार थे जिन्होंने कभी शारीरिक हरकतों में अतिरेक नहीं किया। उनके अभिनय का मूल्यांकन ही नहीं हुआ। यह जानना दिलचस्प होगा कि क्या अमेज़न पर खुशी उपलब्ध है और होम डिलीवरी हो सकती है?

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