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संजय कुमार का कॉलम:कुछ प्रमाणों के आधार पर क्या हम कह सकते हैं कि एंटी-इनकंबेंसी भारतीय चुनावों का नियम है? बिल्कुल नहीं

2 महीने पहले
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संजय कुमार, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएडीएस) में प्रोफेसर और राजनीतिक टिप्पणीकार। - Dainik Bhaskar
संजय कुमार, सेंटर फॉर स्टडी ऑफ डेवलपिंग सोसायटीज (सीएडीएस) में प्रोफेसर और राजनीतिक टिप्पणीकार।

अगर बिहार विधानसभा चुनाव 2020 में एनडीए हार जाता तो भाजपा और जद(यू) एंटी-इनकंबेंसी यानी सत्ता-विरोधी लहर का स्पष्टीकरण दे रहे होते, लेकिन वे जीत को एनडीए सरकार के पिछले 5 वर्षों में किए गए अच्छे कार्यों का नतीजा मान रहे हैं।

एंटी-इनकंबेंसी के तर्क का राजनीतिक पार्टियां हार के स्पष्टीकरण में वैसे ही इस्तेमाल करती रही हैं, जैसे कोरोना के खतरे का प्रतिबंध लगाने में इस्तेमाल हो रहा है। जब बिहार चुनाव में बड़ी रैलियां हुईं, तब लग रहा था कि कोरोना का कोई खतरा नहीं है। लेकिन खतरा अचानक फिर सामने आ गया और सामाजिक आयोजनों पर रोक लगने लगी।

स्पष्ट रूप से राजनीतिक पार्टियों की जरूरत के आधार पर अलग-अलग रोक लगाई जा रही हैं, जिनका जमीनी हकीकत से शायद वास्ता नहीं है। ऐसे ही एंटी-इनकंबेंसी के तर्क का इस्तेमाल भी राजनीतिक पार्टी की जरूरत के मुताबिक होता है।

भारत में सत्तारूढ़ पार्टी एंटी-इनकंबेंसी शब्द का संदर्भ खासतौर पर चुनाव हारने के बाद ऐसे देती है, जैसे यह भारतीय चुनाव का सामान्य नियम हो। अक्सर सत्तारूढ़ पार्टी या गठबंधन हार का कारण अपने बुरे प्रदर्शन को नहीं बताते, बल्कि एंटी-इनकंबेंसी को बताते हैं, जैसे कि भारतीय मतदाता सरकार के विरुद्ध वोट करने का आदि हो।

इसी से जुड़ा मुद्दा टर्नआउट यानी मतदान प्रतिशत है। ज्यादा टर्नआउट को हमेशा एंटी-इनकंबेंसी का संकेत कहा जाता है। लेकिन विभिन्न लोकसभा और विधानसभा चुनावों के आंकड़े ऐसा कोई पैटर्न नहीं बताते। कम टर्नआउट पर भी सरकारें हारी हैं और ज्यादा टर्नआउट पर भी सरकारें बनी रही हैं।

वर्ष 1952 के बाद से हुए 17 लोकसभा चुनावों के नतीजे बताते हैं कि केंद्र सरकार के फिर चुने जाने और हारने पर पिछले चुनावों की तुलना में टर्नआउट में बदलाव का कोई असर नहीं रहा। इन 17 चुनावों में टर्नआउट घटने या बढ़ने, दोनों ही परिस्थितियों में सरकार 8 बार बदली और इतनी ही बार दोबारा चुनी गई। जैसे 1984 लोस चुनावों में टर्नआउट 7% बढ़ा, लेकिन कांग्रेस फिर चुनी गई।

वहीं 1980 लोस चुनाव में टर्नआउट, 1977 चुनावों की तुलना में 3% घटा, लेकिन जनता पार्टी 1980 में हार गई। ऐसे ही 2014 लोस चुनाव में टर्नआउट 8% बढ़ा और यूपीए सरकार हार गई, फिर 2019 में टर्नआउट एक फीसदी और बढ़ा लेकिन भाजपा और बड़े अंतर से जीती। क्या हम टर्नआउट और चुनाव नतीजे में कोई संबंध स्थापित कर सकते हैं। शायद नहीं। क्या हम कह सकते हैं कि एंटी-इनकंबेंसी भारतीय चुनाव का नियम है, शायद नहीं।

राज्य स्तर पर भी यही पैटर्न है। ऐसे राज्य हैं, जिन्होंने पिछले कुछ दशकों में कभी भी, किसी सरकार को दोबारा नहीं चुना। ऐसे राज्य भी हैं जिन्होंने कुछ ही बार सरकार दोबारा चुनी है, जबकि ऐसे राज्य भी हैं जिन्होंने दशकों तक एक ही सरकार को चुना।

यह ध्यान देने योग्य है कि सत्तारूढ़ सरकारों के चुने जाने का वोटर टर्नआउट के ज्यादा या कम होने से संबंध नहीं रहा। ऐसे प्रमाण भी हैं, जो बताते हैं कि पार्टियों और गठबंधनों की जीत-हार काफी हद तक सरकारों के प्रदर्शन पर निर्भर करती है, एक चुनाव से किसी अन्य चुनाव में गठबंधन बदलने का भी चुनाव नतीजों पर असर होता है और कभी-कभी सत्तारूढ़ सरकार अच्छे काम के बावजूद हार जाती है।

अगर हम केरल और राजस्थान को देखें तो हमें लगेगा की एंटी-इनकंबेंसी भारतीय चुनावों का नियम है क्योंकि इन दो राज्यों में शायद ही कभी कोई सरकार दोबारा चुनी गई। केरल में 1977 और राजस्थान में 1993 के बाद से हर चुनाव में सरकार बदली।

जहां केरल में वोटर टर्नआउट के घटने-बढ़ने का सरकार बदलने पर असर नहीं दिखा, वहीं राजस्थान में केवल 2018 को छोड़कर बाकी चुनावों में टर्नआउट बढ़ने के साथ सरकार बदली है। कुछ राज्यों में एक-दो अपवादों को छोड़कर हर चुनाव के बाद सरकार बदली। पंजाब इसका अच्छा उदाहरण है। लेकिन पंजाब में भी सरकार के बदलने का टर्नआउट बदलने से कोई संबंध नहीं रहा।

कुछ अन्य राज्यों में तस्वीर बिल्कुल उल्टी है। यहां पिछले कुछ दशकों में सरकारें कई बार दोबारा चुनी गईं, कुछ मामलों में तो 25-30 वर्षों तक। पश्चिम बंगाल, सिक्किम, त्रिपुरा, इस मॉडल में फिट बैठते हैं। यहां भी यह ध्यान देने योग्य है कि टर्नआउट के घटने-बढ़ने का सरकार बदलने पर कोई असर नहीं हुआ और साथ ही इन राज्यों में वोट शेयर घटने या बढ़ने के बावजूद सरकार कई बार दोबारा चुनी गई।

गुजरात में तो 25 वर्षों से सरकार नहीं बदली, यहां भाजपा 1995 में सत्ता में आने के बाद से कोई चुनाव नहीं हारी है।

ऐसे राज्य भी हैं जो मिश्रित तस्वीर पेश करते हैं, जहां सत्तारूढ़ पार्टी कई बार चुनाव जीती और हारी, फिर टर्नआउट जो भी रहा हो। 1951-1966 की अवधि मजबूत प्रो-इनकंबेंसी की रही, जबकि 1999-2003 की अवधि ने मजबूत इनकंबेंसी देखी, जहां 61% सत्तारूढ़ सरकारें चुनाव हारीं।

बाकी के दशकों ने लगभग बराबर संख्या में राज्य सरकारों को दोबारा चुने जाते या हारते हुए देखा। इन प्रमाणों के आधार पर क्या हम कह सकते हैं कि एंटी-इनकंबेंसी भारतीय चुनावों का नियम है? बिल्कुल नहीं।

(ये लेखक के अपने विचार हैं)

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