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जयप्रकाश चौकसे का कॉलम:क्या वर्तमान समय सामूहिक याददाश्त खो जाने का समय है?

13 दिन पहले
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जयप्रकाश चौकसे, फिल्म समीक्षक

राज्यसभा में जया बच्चन ने बयान दिया है कि फिल्म उद्योग को गटर कहने वाले लोग ‘उसी थाली में छेद कर रहे हैं, जिसमें वे खाते हैं’। बॉलीवुड में कुछ लोग ड्रग्स का सेवन करते हैं, इस तरह की चर्चा भी हुई। शिक्षा परिसर में भी ड्रग्स ली जा रही है। भावी पीढ़ियों को बिगाड़ने का षड्यंत्र रचा गया है। वर्तमान में माता-पिता की जवाबदारी बढ़ गई है। उन्हें निगरानी भी करनी है कि उनकी संतान ड्रग्स का सेवन नहीं करें। सरकारी नारकोटिक्स विभाग में रिश्वतखोरी से ड्रग्स का कारोबार चल रहा है।

प्रांतीय नारकोटिक्स विभाग का एक काम सिनेमाघर में मनोरंजन कर की अदायगी पर निगरानी रखने का भी है। दरअसल विभाग का काम केवल अवैध नशीले पदार्थ बेचने वालों को पकड़ने का होना चाहिए। भारत एकमात्र देश है, जहां मनोरंजन कर है। हम खुशकिस्मत हैं कि अभी तक सांस लेने पर कोई टैक्स नहीं लगा।

‘भाभी जी घर पर हैं’ हास्य कार्यक्रम के एक एपिसोड में बी.एस.टी टैक्स लगाए जाने का संवाद था। सरकारी अधिकारी एक मशीन से यह ज्ञात करता है कि कौन कितना बोल रहा है। इस वाचाल देश में सचमुच बीएसटी लागू हो जाए, तो प्रतिदिन करोड़ों रुपए की आय सरकार को हो सकती है। यह विचारणीय है कि देश की कोरोना व गिरती जीडीपी वाले गंभीर विषयों पर लोकसभा- राज्यसभा में विचार नहीं किया जा रहा है।

हमेशा चर्चा में बने रहने के घातक नशे से पीड़ित एक कलाकार की बकबक पर इतना ध्यान दिया जा रहा है। लाइमलाइट में बने रहना एक भयावह नशा है। मुंबई फिल्म उद्योग को पाकिस्तान कहने वाले को केंद्र सरकार सुरक्षा प्रदान कर रही है। 11 जवान उसकी रक्षा कर रहे हैं। हमारी सरहदों की रक्षा करने वाले वीर, केमिकल लोचे से ग्रस्त कलाकार की रक्षा कर रहे हैं ! यह उनके प्रशिक्षण और साहस का अपमान है।

कुछ वर्ष पूर्व मराठी भाषा में बनी फिल्म ‘कोर्ट’ के निर्देशक चैतन्य तम्हाने की आयु उसे बनाते समय मात्र 25 वर्ष की थी। कथासार इस तरह है कि एक लोकप्रिय जन गायक पर मुकदमा कायम किया जाता है। जनता का कवि और नुक्कड़ गायक दलित नारायण कामले पर आरोप लगाया जाता है कि उसके जन जागरण के गीतों के प्रभाव में आकर एक गटर सफाई कर्मी ने आत्महत्या की है। सच्चाई यह है कि गटर साफ करने वाले कर्मचारी को दस्ताने और मास्क नहीं दिए गए थे।

गटर साफ करते समय गटर की ज़हरीली गैस के कारण उसकी मृत्यु हुई। उसकी मृत्यु का दोष दलित गायक पर लगाकर व्यवस्था एक तीर से दो शिकार कर रही है। दलित जन गायक की लोकप्रियता से व्यवस्था डरने लगी है। उन्हें भय था कि भ्रष्टाचार के खिलाफ यह कोई ऐसा आंदोलन खड़ा कर सकता है कि सरकार गिर सकती है। गटर साफ करने वालों की सुरक्षा नहीं करने के अपराध बोध से भी सरकार बचना चाहती है।

एक खबर के मुताबिक औसतन हर पांचवें दिन किसी न किसी महानगर में एक गटर सफाई कर्मी की मृत्यु ज़हरीली गैस से हो जाती है। यह भयावह यथार्थ है। गटर कर्मचारी को दस्ताने और ऑक्सीजन मास्क दिए जाने पर इस तरह की दुर्घटना टाली जा सकती है। संभव है कि सुरक्षा किट खरीदने का बजट पास किया गया है परंतु वह धन नेताओं की जेब में जा रहा है।

एक ऐनिमेशन फिल्म मे जानवरों की एक सभा का दृश्य प्रस्तुत करता है कि जानवर इस नतीजे पर पहुंचते हैं कि अपने को सुधारने के विकास पथ पर चलते हुए वह कमजोर और परजीवी हो गए हैं। यह सच है कि आदिम काल में वे एक दूसरे से लड़ते थे परंतु भाईचारे के भाव से संचालित होते-होते उनकी मारक शक्ति क्षीण हो गई है। वे अपने पुराने दिनों में लौटना चाहते हैं। यह बात हमें फिल्मकार सईद अख्तर मिर्जा की किताब ‘मेमोरी इन द एज ऑफ एम्नेशिया’ की याद दिलाती है। क्या वर्तमान समय सामूहिक याददाश्त खो जाने का समय है?

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