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बलदेव कृष्ण शर्मा का कॉलम:पराली की समस्या को नियंत्रित नहीं किया तो यह कोरोना का खतरा 20% तक बढ़ा सकती है

12 दिन पहले
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बलदेव कृष्ण शर्मा, स्टेट एडिटर, दैनिक भास्कर पंजाब और हरियाणा

लॉकडाउन के दौरान यदि कोई एक खबर सबसे ज्यादा हमें सुखद लगी तो वह थी पर्यावरण का अचानक बेहतर हो जाना। कोरोना की कैद में घरों में बैठे-बैठे सबसे ज्यादा हम प्रकृति को याद कर रहे थे। मानो हम तमाम भूलों का प्रायश्चित कर रहे हों। प्रकृति का महत्व हमें शायद ही इससे पहले कभी इतना समझ आया हो। समय बीतता गया और हम घरों से जैसे ही बाहर आए हमारा सामना दोबारा हकीकत से होने लगा। वही समस्याएं हमारे सामने आकर खड़ी हो गईं, जिनका समाधान बरसों से नहीं निकला। इनमें से खेतों में जलती पराली एक ऐसी समस्या है जो हमें हर साल डराती है, लेकिन इस बार उसके कारण हालात भयावह हो सकते हैं।

हालिया कई रिपोर्ट्स में बताया गया है कि इस बार हमने इसे नियंत्रित नहीं किया तो यह कोरोना का खतरा 20 प्रतिशत तक बढ़ा सकती है। कोरोना भी सबसे ज्यादा श्वसन तंत्र को नुकसान करता है और धुएं का भी सीधा संबंध फेफड़ों से है। पंजाब, हरियाणा और दिल्ली जैसे राज्यों को कोरोना के खिलाफ लड़ाई के साथ-साथ इस खतरे को टालने के लिए भी लड़ना होगा। बशर्ते यह लड़ाई सियासी न हो। अमूमन राज्यों में ऐसे मुद्दों पर सियासी धुंध छा जाती है। एक-दूसरे पर दोषारोपण शुरू हो जाता है।

प्रदर्शनकारी किसान चाहे ट्रेनें रोकें या हाइवे, वहां सियासत का चेहरा बदल जाता है और पराली जलाने पर मुकदमे दर्ज कर इस ‘उपलब्धि’ की बाकायदा जरूरत पड़ने पर सूची सुप्रीम कोर्ट तक दी जाती है। किसान इस ‘सियासी बुद्धि’ के नफा-नुकसान को समझने में मात खा जाते हैं। सरकारें अब तक यह नहीं बता पाई हैं कि उन्होंने पराली का क्या समाधान किसानों को दिया, जिसको वे आजमा नहीं रहे। प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड जुर्माने की ‘रेड लाइन’ खींचता है। लेकिन कृषि महकमों और कृषि विश्वविद्यालयों ने क्या इस समस्या के निदान को युद्ध स्तर पर लिया? क्या बाहर के देशों के प्रयोगों को समझा? क्या धान के पौधे की लंबाई कम करने की किस्म तैयार करने की संभावना तलाशी गई?

कृषि देश की अर्थव्यवस्था की मजबूत धुरी है। पैदावार बढ़ाने के लिए हमने अनेक क्रांतियां शुरू कीं। कृषि में हो रहे बदलावों के लिए भी तो नई तकनीक की क्रांति की जरूरत है। ऐसी क्रांति के लिए यही सही समय है। हमें ‘आज की सोच’ से ज्यादा आगे की सोच पर काम करने की जरूरत है। यह सच है कि किसानों में जागरूकता बढ़ी है और जो किसान तकनीक का इस्तेमाल करने में सक्षम हैं, उन्होंने पर्यावरण संरक्षण में योगदान दिया है। लेकिन अब भी लाखों ऐसे किसान हैं, जो महंगी तकनीक को इस्तेमाल नहीं कर सकते। मुआवजे की आदत डालना समाधान नहीं है। न ही अदालतों के सामने कार्रवाई का रिपोर्ट कार्ड देने से काम चलेगा।

राज्यों और केंद्र सरकार दोनों को अपने सर्वश्रेष्ठ संसाधनों का इस्तेमाल करते हुए किफायती तकनीक और विकल्प देने होंगे। सरकारों का करोड़ों रुपया अनुदान और मुआवजे में खर्च हो रहा है। इसके बावजूद हर साल यह समस्या जस की तस बनी हुई है और यह तब तक रहेगी जब तक ठोस वैज्ञानिक समाधान नहीं निकलेगा। जब कोई समस्या हमारा दम ही घोंटने लगे तो उसके समाधान के लिए क्रांति क्यों नहीं होनी चाहिए? स्वास्थ्य की अहमियत कोरोना महामारी में हम भली-भांति समझ गए हैं। अच्छा स्वास्थ्य अच्छे पर्यावरण के बिना संभव नहीं है।

पर्यावरण का दोहन करके हम जितनी चाहें प्रगति कर लें, एक वायरस हमारी पूरी अर्थव्यवस्था को चौपट कर सकता है। शास्त्रों में हवा को गुरु, पानी को पिता और धरती को माता कहा गया है। इस सच को हमारे अन्नदाताओं से ज्यादा कौन समझ सकता है। जब तक स्थायी समाधान नहीं निकलता, तब तक पर्यावरण को बचाने की जिम्मेदारी भी अन्नदाताओं को ही निभानी पड़ेगी।

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