रीतिका खेड़ा का कॉलम:जो भारत हमें रोजमर्रा की जिंदगी में दिखता है या दिखाया जाता है, उसमें लगभग 80% लोग गायब हैं

2 वर्ष पहले
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रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं - Dainik Bhaskar
रीतिका खेड़ा, अर्थशास्त्री दिल्ली आईआईटी में पढ़ाती हैं

मध्यम वर्ग। जिसे पूछो वही अपने आपको मध्यम वर्ग का समझता है। जिसके पास गाड़ी है, घर में एसी है, स्मार्टफोन तो है लेकिन सबसे नया आई-फोन नहीं है, जो नौकरीशुदा है, जिसकी सरकारी नौकरी है, इत्यादि।

वास्तविकता क्या है? शहरी क्षेत्रों में केवल 11% घरों में कार है। एक अनुमान के अनुसार केवल 17% के पास स्मार्टफोन है (अन्य अनुमान के अनुसार एक तिहाई के पास है)। एसी भी केवल एक तिहाई शहरी क्षेत्र के परिवारों के पास है। पुरुष कामगारों में प्रति माह रु. 10,000 से ज्यादा कमाने वालों का हिस्सा केवल 17% है। ये सब आंकड़े सरकारी सूत्रों से लिए गए हैं और पिछले पांच सालों के हैं। आप खुद से पूछिए- यदि देश की पूरी जनसंख्या में इतने छोटे अनुपात के पास जो सुविधाएं हैं, क्या उन्हें मध्यमवर्गीय माना जा सकता है? यह आम बात है कि जिनके पास गाड़ी/कार है, स्मार्टफोन इत्यादि है, वह अपने आपको मध्यम वर्ग में समझते हैं।

इस तरह के कई आंकड़े उपलब्ध हैं। उदाहरण के लिए इंटरनेट या कम्प्यूटर की सुविधा। मुख्यधारा की मीडिया को देखें को ऐसा प्रतीत होता है कि आज हर कोई हाथ में स्मार्टफोन लेकर चल रहा है और उसके पास इंटरनेट की सुविधा भी है। लेकिन नेशनल सैंपल सर्वे के आंकड़ों के अनुसार 2017-18 में, इंटरनेट की सुविधा शहर के 42% घरों को उपलब्ध थी, और ग्रामीण इलाकों के तो केवल 15% परिवारों को। ग्रामीण क्षेत्रों में केवल 4% और शहरों में 23% के पास कम्प्यूटर था।

आर्थिक दृष्टिकोण से मध्यम वर्ग की अलग-अलग परिभाषा है, लेकिन किसी भी तरह परिभाषित करें, जो सुविधा केवल 10%-20% के पास हो, उस वर्ग को, उस संदर्भ में, मध्यम कहना असंगत होगा। जो भारत हमें अपनी रोजमर्रा की जिंदगी में दिखता है या दिखाया जाता है, उसमें लगभग 80% लोग गायब हैं।

उच्च वर्ग का अपने आपको मध्यम वर्ग समझने व महसूस करने की प्रवृत्ति केवल भारत में ही नहीं है। अमेरिका में डेमोक्रेटिक पार्टी के राष्ट्रपति पद के उम्मीदवार बाइडेन के ज़हन में 4 लाख डॉलर सालाना कमाने वाले मध्यमवर्गीय हैं। हालांकि 4 लाख डॉलर कमाने वाले अमेरिका में सबसे अमीर 5% में आते हैं। अमेरिका में मध्यमवर्ग की औसत कमाई करीब 68,000 डॉलर है।

इस गलतफहमी का नतीजा समाज और देश के लिए हानिकारक है। यदि जो वास्तव में आय की सीढ़ी में सबसे ऊपर हैं, वे यह समझें कि वे बीच में हैं तो उन्हें यह लगेगा की उनसे जो कर-वसूली हो रही है, वह अन्यायपूर्ण है और उससे बचने के लिए हर कोई उपाय खोजेंगे। चाहे जितनी कर-बचत हो, उतना पैसा टैक्स विशेषज्ञ की फीस पर ही क्यों न खर्च हो जाए।

दूसरी ओर, उन्हें यह महसूस होगा कि सरकार जो खर्च कर रही है, वह उनकी ओर आना चाहिए। हालांकि उनसे ज्यादा जरूरतमंद लोग बहुत बड़ी संख्या में हैं। जो अपने आप को मध्यम वर्ग समझते हैं, उनकी अवधारणा है कि सब टैक्स वही भरते हैं और सरकारी खर्च का कोई लाभ उन पर केंद्रित नहीं है। यह दोनों अवधारणाएं गलत हैं। आयकर के अलावा सरकार उत्पाद और बिक्री पर भी कर लगाती है, जो देश की पूरी आबादी भरती है। दूसरी ओर यह ‘मध्यम वर्ग’ ही है, जिसे सरकार की ओर से घर पर नलके में पानी की सुविधा है, जिनके घरों से सीवेज का प्रबंधन है। पाठकों को जानकर शायद आश्चर्य होगा कि देश की पूरी आबादी में केवल 8% घरों में निजी शौचालय है, जो सीवर लाइन से जुड़ा है। (शहरी क्षेत्रों में इसका अनुपात 20% तक पहुंचता है।)

इतने तथ्यों और आंकड़ों में डुबाने का उद्देश्य यह है कि देश में हम अपनी वास्तविक स्तिथि को समझें। यदि हम देश को सच्चे मन से विश्वगुरु बनाना चाहते हैं तो हमें उस 80-90% पर नज़र रखनी होगी, जिनके पास न तो गाड़ी है, न इंटरनेट वाला स्मार्टफोन, न घर में सीवर लाइन की सुविधा। इस वर्ग को देश के लोकतंत्र में अपनी जगह देने की जिम्मेदारी हमारी भी है। अगली बार जब आप अपने मन में अपने आपको बोझिल मध्यमवर्गीय समझें तो इन आंकड़ों को जरूर याद करें। (ये लेखिका के अपने विचार हैं)

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