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मोरारी बापू का कॉलम:जीवन विधाता के हाथ में है लेकिन सहजीवन हमारे हाथ है, हम संयुक्त हैं, सामूहिक साधना हमारे हाथ है

15 दिन पहले
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मोरारी बापू, आध्यात्मिक गुरु और राम कथाकार

रामचरित मानस में दशरथजी के मृत्यु के प्रसंग ‘मानस’ कार कहते हैं कि विलाप में ही रात बीत गई। और फिर महामुनि आए। यहां महामुनि के रूप में वशिष्ठजी की ओर संकेत है। वशिष्ठजी महामुनि है। इसे यूं भी समझ सकते हैं : समाज में जो विशिष्ट है, वो वशिष्ठ है। इतना ही नहीं, समाज में जो वरिष्ठ है वो वशिष्ठ है। समाज में जो वरिष्ठ हो, विशिष्ट हो उसको पहचानना थोड़ा मुश्किल हो सकता है। क्योंकि इसकी पहचान के लिए राग-द्वेषमुक्त आंखें चाहिए। राग होगा तो आसक्ति हो जाएगी। इसी तरह अगर द्वेष होगा तो शत्रुता पैदा हो जाएगी।

रामचरित मानस में दशरथजी की मृत्यु के पश्चात भरत को आश्वासन देते हुए वशिष्ठजी का एक दूसरा रूप हमारे सामने आता है, वहां वशिष्ठजी कैसे दिखते हैं ?

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ । हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ ।।

भरतजी बहुत रोए कि मेरे भाई और मेरे पिता चले गए। वशिष्ठजी ने भरत के कंधे पर हाथ रखा और प्राथमिक रूप से समझाया- हे भरत! छह वस्तु विधि के हाथ में है। हानि-लाभ, जीवन-मरन, यश-अपयश....। यह वशिष्ठजी का एक और रूप है। हालांकि, महामुनि होना तब सिद्ध होता है, जब हम भी इन छह वस्तुओं को किसी और दृष्टि से देखें। हानि विधाता के हाथ है, लेकिन कुछ भी हो ‘मैं ठानी’। यानी यह बात मैंने ठानी है। इसी सोच का होना महामुनि होना है। आपने कोई कार्य किया, और उसमें हानि हो गई। तो वो हानि चलेगी, लेकिन ग्लानि नहीं चलेगी। यानी आप अपने प्रयास में लगे रहिए।

आइंस्टीन एक प्रयोग में लगे हुए थे। बार-बार प्रयास के बाद भी विफल हो रहे थे। ऐसे में उनके सहयोगी ने कई बार कहा- अब इस प्रयोग को त्याग देना चाहिए। लेकिन आइंस्टीन ने कुछ तय किया हुआ था। उन्होंने अपने सहयोगी से इतना ही कहा- तुम्हारी उम्र अभी सिर्फ 20 साल की है। और तुम इतनी जल्दी बूढ़े हो गए। हानि भले ही विधाता के हाथ में हो सकती है, लेकिन हमारा कर्तव्य यही है कि हम कुछ ठानकर कार्य करते रहें ।

अब लाभ की बात। लाभ भी विधाता के हाथ में हो सकता है, लेकिन शुभ कार्य हमारे हाथ में है। हम लाभ के पीछे पड़े हैं। लेकिन हमें ध्यान रखना चाहिए कि प्रत्येक लाभ शुभ नहीं होता। प्रत्येक शुभ, लाभ जरूर होता है। लाभ भले ही हमारे हाथ में नहीं है। लेकिन शुभ तो हमारे हाथ में है।

जीवन विधाता के हाथ में है लेकिन सहजीवन हमारे हाथ है। संजीवनी हमारे हाथ में है। बिनोबा के सूत्र देखो, हम संयुक्त है, सामूहिक साधना हमारे हाथ है। मरण विधाता के हाथ में है। देह विलय तो प्रारब्ध के हाथ की वस्तु थी, लेकिन ‘विठ्ल विठ्ल’ तो तुकाराम के हाथ की वस्तु थी। ‘राम हरि’ बिनोबा के हाथ की वस्तु थी। ‘हे राम’ गांधीजी के हाथ की वस्तु थी।

इसी तरह देखिए- जय जयकार श्रीराम की हुई। लेकिन जैसे ही श्रीराम को यह यश मिला। उन्होंने तुरंत कहा- हे भालू! हे बंदर! ये यश मैं आपको देता हूं।’ आज स्थिति यह है कि हम दूसरों का यश भी छीन लेते हैं। भूल चाहे दूसरे की हो, लेकिन क्षमाशीलता के कारण यह अपयश हम अपने हाथ ले सकते हैं। हानि- लाभ, जन्म- मरण, यश-अपयश, ये भले ही विधाता के हाथ है, लेकिन उसके दूसरे पहलू हमारे हाथ में है। और ये जो हमारे हाथ में है, उसे कोई बिरले महापुरूष ही करके दिखाते हैं। जो यह कर पाते हैं। वे सब महामुनि हैं। महामुनि द्वारा सकारात्मक सोच जीवन के लिए बहुत बड़ा संबल बन सकती है।

तो पुन: रामचरित मानस की ओर लौटते हैं। वशिष्ठजी शोकमय वातावरण में जब आते हैं। तो सभी को ढांढस बंधाते हैं। सभी का शोक निवारण करते हैं। जिसको अपने ज्ञान का और विज्ञान का अनुभव है। जिसके जीवन में अध्यात्म और विज्ञान का सम्मिलन हुआ है। जो दूसरों से यह कह सके कि मत रो...। जो अपने ज्ञान से सभी का शोक हर ले। यही महामुनि के लक्षण हैं।

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