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एन. रघुरामन:मैनेजमेंट फंडा: अपने बल पर सफल होने वाला व्यक्ति आंत्रप्रेन्योर संबंधी कौशलों और ग्राहक की मनोवैज्ञानिक समझ पर निर्भर रहता ह

10 महीने पहले
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सोमवार को सीबीएसई कक्षा बारहवीं के नतीजों ने कई बच्चों और स्कूलों को चौंका दिया। खासतौर पर मुंबई में इसे लेकर नाराजगी दिखी क्योंकि कई छात्रों को आंत्रप्रेन्योरशिप और मनोविज्ञान विषय में उम्मीद से कम अंक आए थे। मुंबई के शीर्ष स्कूलों में से एक आरएन पोद्दार स्कूल की प्राचार्य निकिता बजाज समेत कई दूसरे प्राचार्यों ने पुनर्मूल्यांकन की मंशा जाहिर की है।

जिन छात्रों को बाकी विषयों में 90-95 अंक आए हैं, उन्हें इन दो विषयों में 70 अंक ही मिले।  हालांकि पेशेवर बनाने के लिए सभी विषय महत्वपूर्ण हैं, लेकिन मेरा मानना है कि ये दो विषय किसी व्यक्ति को अपने बल पर सफलता पाने में ज्यादा योगदान देते हैं। मैं इस उदाहरण से अपनी बात रखता हूं। आज वे 60 साल से ज्यादा के हैं। लेकिन 1985 में बतौर 25 वर्षीय बीएससी बायोलॉजी ग्रैजुएट उन्होंने एक दवा कंपनी में नौकरी शुरू की तो वे कॅरिअर के सबसे निचले पायदान पर थे। 30 साल तक इसी कंपनी में काम करने के बाद 2015 में जोनल सेल्स मैनेजर के पद से रिटायर हुए। उनके काम में महीने के 23 दिन विदर्भ, मप्र और छत्तीसगढ़ में सफर करना शामिल था। उन यात्राओं में उन्होंने कई लोगों को विभिन्न चिंताओं से परेशान देखा, जिनमें एंग्जायटी या अवसाद भी शामिल हैं, जो लोगों के प्रदर्शन और जीवन की गुणवत्ता को प्रभावित कर रही थीं। चूंकि उन्हें अपने उत्पाद बेचने थे इसलिए वे मदद कर उनके दिल में उतर गए, उनका मनोबल बढ़ाया और उत्साहित महसूस करवाया। यही रणनीति वे टीम के सदस्यों के हताश होने पर अपनाते थे।  धीरे-धीरे उन्हें महसूस हुआ कि पेशेवर योग्यता के साथ वे न सिर्फ ग्राहकों की बल्कि अधीनस्थों और टीम के साथियों की बेहतर ढंग से मदद कर पाएंगे। चूंकि समाज इस बीमारी को कलंक की तरह देखता है इसलिए कई लोग खुलकर इसके बारे में बात नहीं करते। लेकिन बहुत समय मांगने वाले उनके सेल्स के पेशे ने उन्हें कभी पेशेवर योग्यता पाने का समय नहीं दिया। उन्होंने 30 साल बाद अचानक नौकरी छोड़ पंडित रविशंकर विश्वविद्यालय, रायपुर से क्लीनिकल सायकोलॉजी (इंसानों का भावनात्मक व्यवहार और सोच का अध्ययन) में एमए करने का फैसला लिया।  पढ़ाई चुनौतीपूर्ण थी। न सिर्फ उन्हें मनोविज्ञान की शब्दावली समझने में परेशानी हो रही थी, बल्कि साथ में कई घंटे काम और कॉर्पोरेट अस्पतालों के विभिन्न विभागों जैसे ‘पेशेंट केयर सर्विस’, ‘आईसीयू कॉर्डीनेटर’ और ‘मार्केटिंग ऑफ हॉस्पिटल’ में असाइनमेंट भी शामिल थे। काम का माहौल प्रतिकूल, बोरियत भरा, गैर-दोस्ताना और खतरनाक भी था। उस उम्र में वे ये सभी काम पहली बार कर रहे थे। हालांकि यह मानसिक और शारीरिक रूप से थकाने वाला था लेकिन वे अपनी उम्र के कारण युवा छात्रों के लिए प्रेरणा बन गए थे। पास होने के बाद उन्हें महसूस हुआ कि काउंसलिंग में बेहतर होने और मरीजों की मदद करने के लिए उन्हें पेशेवर मदद की जरूरत है। इसलिए 2017 में उन्होंने सागर (मप्र) के डॉ हरिसिंह गौर विश्वविद्यालय के ‘पीजी डिप्लोमा इन साइकोलॉजीकल काउंसलिंग’ में प्रवेश लिया। इसमें उत्तीर्ण होने के बाद अब वे नियमित छात्र के रूप में रिहैबिलिटेशन सायकोलॉजी में पीजी डिप्लोमा कर रहे हैं। उनकी परीक्षाएं लॉकडाउन की वजह से आगे बढ़ गईं हैं। उन्होंने पहले ही मेंटल हेल्थ से पीजी डिप्लोमा के लिए इग्नू, दिल्ली के अकादमिक वर्ष 2020-21 में प्रवेश ले लिया है।  मिलिए अमृत मजूमदार से, जो रायपुर में एक मनोरोग अस्पताल में बतौर क्लिनिकल सायकोलॉजिस्ट काम कर रहे हैं और प्राइवेट प्रैक्टिस भी करते हैं। उन्हें दूसरे कॅरिअर में पहले जितनी आय नहीं हो रही लेकिन वे खुश हैं क्योंकि वे लोगों की खुश और तनावमुक्त रहने में मदद करते हैं।

फंडा यह है कि  अपने बल पर सफल होने वाला व्यक्ति आंत्रप्रेन्योर संबंधी कौशलों और ग्राहक की मनोवैज्ञानिक समझ पर निर्भर रहता है, ताकि ये ग्राहक और व्यक्ति, दोनों के लिए फायदेमंद स्थिति हो।

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