एन. रघुरामन का कॉलम / मैनेजमेंट फंडा: चैरिटी को भी अब लग्जरी का टैग मिल रहा है

Management Funda: Charity is also getting luxury tag now
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Management Funda: Charity is also getting luxury tag now

दैनिक भास्कर

Jun 30, 2020, 07:20 AM IST

शिक्षा के क्षेत्र में बदलाव पहले ही शुरू हो गए हैं। एलएफएच (लर्न फ्रॉम होम) न सिर्फ सीखने के तरीके, बल्कि शिक्षण को भी बदल रहा है। स्कूल की यूनिफॉर्म पहनकर, अपनी मां को चूमकर बाय कहते हुए बच्ची का बगल वाले कमरे में चले जाना, जैसे वो कक्षा में जा रही हो, अब न्यू नॉर्मल हो जाएगा। टेक कंपनियां भी आखिरकार बोरियत खत्म करने के लिए नए आइडिया पेश करने लगेंगी क्योंकि बच्चों के पास कोई बात करने के लिए, यहां तक कि आंखें मिलाने तक के लिए कोई नहीं होता क्योंकि वे पूरे समय कम्प्यूटर की ओर देखते रहते हैं। घर के पालतू कुत्तों को भी एलएफएच और डब्ल्यूएफएच (वर्क फ्रॉम होम) के दौरान शांत रहना सिखाया जा रहा है। 

अगर कई शहरों की समृद्ध कॉलोनियों की यह स्थिति है तो हमारे देश में लाखों ऐसे छात्र भी हैं जिनकी पूरी तरह से स्कूल छोड़ने की आशंका है, क्योंकि उनकी डिजिटल माध्यमों तक पहुंच कम है। लैपटॉप तो छोड़िए, उनके माता-पिता के पास स्मार्टफोन तक नहीं है। मानें या न मानें, इस एलएफएच के दौर में कम आय समूह के छात्रों की शिक्षा को खतरा है। खासतौर पर म्युनिसिपल और जिला पंचायत स्कूलों में पढ़ने वाले बच्चे असुरक्षित श्रेणी में हैं। इन लोगों की समस्याओं के समाधान पर सोचते हुए मुझे पुणे की दो पहलों के बारे में पता चला। पहली एक नेक इंसान द्वारा और दूसरी खुद एक सरकारी स्कूल द्वारा। 

नेक इंसान की कहानी: टाटा मोटर्स से रिटायर हुए 63 वर्षीय विकास पाटिल ने एलएफएच समस्या के लिए कुछ करने का फैसला लिया। जिले की पर्यावरण संरक्षण समिति के विशेषज्ञ सदस्य के होने के नाते विकास ने आस-पास की हाउसिंग सोसायटीज से ई-वेस्ट इकट्‌ठा करना शुरू किया है। अब वे पुराने लैपटॉप सुधारकर स्कूलों और बच्चों में बांट रहे हैं। रिटायरमेंट के बाद पाटिल ने एंवायरमेंटल कंजर्वेशन एसोसिएशन नाम का पर्यावरण प्रेमियों का खुद का एक समूह बनाया। उन्होंने कई हाउसिंग सोसायटीज से ई-वेस्ट दान करने की अपील की। 

उन्होंने पुणे के सर्विस सेंटर्स से संपर्क किया और लैपटॉप सुधरवाए। बाद में उन्होंने स्कूलों के प्रमुखों को इन्हें दे दिया, जिन्होंने छात्रों में इन्हें इस तरह बांटा कि हर हार्डवेयर को एक ही इलाके में रह रहे, एक ही कक्षा में पढ़ने वाले 4-5 बच्चों का समूह इस्तेमाल कर पाए। मार्च से अबतक 375 लैपटॉप बांटे जा चुके हैं। और 500 लैपटॉप अभी पुणे के विभिन्न सेंटर्स पर सुधर रहे हैं। 

संस्था की पहल: कर्वेनगर स्थित नूतन बाल विकास मंदिर स्कूल का प्रबंधन जानता है कि कक्षा पहली से दसवीं तक के 700 छात्रों में करीब 20% की पहुंच स्मार्टफोन्स तक नहीं है क्योंकि उनके माता-पिता के पास ये नहीं हैं। चूंकि एक जुलाई से ऑनलाइन क्लासेस शुरू हो रही हैं, इसलिए स्कूल ने इस शनिवार लोगों से सोशल मीडिया पर अपने पुराने या अतिरिक्त स्मार्टफोन्स को ऐसे बच्चों को देने की अपील की, जिनके माता-पिता ये डिवाइस खरीद या सुधरवा नहीं सकते। इस रविवार तक करीब आधा दर्जन लोगों ने रुचि दिखाई थी।

पुराने जमाने में हम इसी तरह किताबों की जुगाड़ करते थे, उनका कवर बदलकर सालभर सावधानी से इस्तेमाल करते थे, ताकि आगे किसी और जरूरतमंद को दे सकें। वह दौर आ गया है जहां हमें ऐसा ही परोपकार करने की जरूरत है लेकिन अब गैजेट्स के रूप में। 
फंडा यह है कि जैसे ज़िंदगी में हर चीज़ आगे बढ़ती है, वैसे ही चैरिटी ने भी प्रगति की और इसमें हाल ही में लग्जरी जुड़ गई है।

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