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एन. रघुरामन का कॉलम:मैनेजमेंट फंडा: देश को आत्मनिर्भर बनाने के लिए एक गरीब बच्चे की शिक्षा पूरी करने की जिम्मेदारी उठाएं और फिर चमत्कार देखें

4 दिन पहले
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इ स शुक्रवार किए गए दो ट्वीट्स देखकर मेरा विश्वास मजबूत हो गया कि देश के बहुत से ग्रामीण इलाकों में ऐसे कई जादुई हाथ और चमत्कारिक दिमाग हैं, जिनके पास पूरी मानवता के लिए संकट बन रहीं समस्याओं का समाधान भी है और इलाज भी। और उन्हें सामने लाने का सिर्फ एक ही तरीका शिक्षा है।
पहला ट्वीट तेलंगाना जनजातीय-सामाजिक कल्याण संस्थान के सचिव आर एस प्रवीण कुमार का था। उन्होंने लिखा- ‘एनआईटी श्रीनगर में एमएससी केमिस्ट्री में प्रवेश लेने वाली नागालक्ष्मी समेत उन सब छात्रों को बधाई जिन्हें पीजी के लिए देश के प्रतिष्ठित संस्थानों जैसे अजीम प्रेमजी यूनिवर्सिटी में 18, टीआईएसएस-13, आईआईटी-3, एनआईटी-9, हैदराबाद यूनि.-2, केआईआईटी में 1 छात्र को प्रवेश मिला और...हमारा सर्वश्रेष्ठ अभी बाकी है।’ प्रवीण कुमार इसलिए इतने उत्साहित हैं क्योंकि ग्रामीण-आदिवासी क्षेत्रों के 46 छात्रों ने यह कारनामा कर दिखाया है। सारे छात्र सरकारी स्कूल में पढ़े हैं। मीडिया से बातचीत में अधिकांश का कहना था जो उन्होंने सपने देखे, अब वे पूरा करना चाहते हैं और कम भाग्यशाली लोगों की मदद करना चाहते हैं।
दूसरा ट्वीट कर्नाटक के पूर्व मुख्यमंत्री एचडी कुमारस्वामी का था, जिन्होंने एक वायरल वीडियो पर टिप्पणी करते हुए लिखा- ‘बच्चों की ऑनलाइन पढ़ाई के लिए टीवी खरीदने की खातिर अपना मंगलसूत्र गिरवी रखने वाली कस्तूरी की कहानी देखकर मेरी आंखें नम हो गईं।’
कुमारस्वामी उस वीडियो पर अपनी प्रतिक्रिया दे रहे थे, जिसमें कर्नाटक के राडेर नागानूर गांव की कस्तूरी चलवडी को 32 इंच का टीवी खरीदने के लिए 20 हजार रुपए की खातिर अपना मंगलसूत्र तक गिरवी रखना पड़ा, चूंकि घर मेंे टीवी नहीं थी ऐसे में आठवीं में पढ़ने वाली बेटी और सातवीं में बेटे को ऑनलाइन क्लास में मुश्किल हो रही थी। बच्चे टीवी में ऑनलाइन क्लास देखने पड़ोसी के घर जाते थे। अनपढ़ मां कस्तूरी ने देखा कि स्थानीय चैनल पर क्लास के प्रसारण के बाद जब टीचर फोन करके पूछते, तो बच्चों को संबंधित पाठ समझने में परेशानी हो रही है। और इसके कारण ही कस्तूरी को टीवी खरीदनी पड़ी।
सिर्फ कस्तूरी ही नहीं, मेरी मां से उम्र में बड़े मेरे मामा की पढ़ाई के लिए नानी ने भी अपना मंगलसूत्र गिरवी रख दिया था। उन्होंने 1950 में मेरी मां की पढ़ाई रोककर, आठवीं से आगे मामा की पढ़ाई जारी रखी। यही एक कारण था कि मैं जो भी पढ़ना चाहता था, उसमें मदद के लिए मेरे मामा आगे आए। गरीब रिश्तेदारों को पढ़ाने-लिखाने की यह विरासत और परंपरा हमारे परिवार में आज भी जारी है।
यह भी एक अलग कहानी है कि जैसे ही कस्तूरी की खबर फैली, बहुत सारी जगह से मदद मिलना शुरू हो गई और बढ़ते सामाजिक दबाव के चलते साहूकार को मंगलसूत्र लौटाना पड़ा। इन ट्वीट्स को पढ़ने के बाद मेरे दिमाग में सबसे पहले ख्यात कार्डियक सर्जन डॉ. दे‌वी शेट्‌टी के शब्द याद आए। वह चिकित्सा क्षेत्र में कई लोगों पर आरोप लगा चुके हैं कि मेडिकल एजुकेशन अब सिर्फ अमीरों के लिए ही रह गई है। इससे पहले एक इंटरव्यू में उन्होंने कहा था कि ‘गरीब परिवारों के बच्चे डॉक्टर बनने के सपने नहीं देख रहे हैं, इसके गंभीर परिणाम होंगे। पूरी दुनिया में अधिकांश अच्छे डॉक्टर्स कमजोर पृष्ठभूमि से आते हैं। सामान्य नियमों को बदलकर 24 घंटे तक काम करने के लिए तैयार रहते हैं।’
फंडा यह है कि देश को सही मायनों में आत्मनिर्भर बनाने के लिए कम से कम एक गरीब बच्चे की शिक्षा पूरी करने की जिम्मेदारी उठाएं और आने वाले सालों में इसका चमत्कार देखें।

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